21 साल तक सीने में धधकती रही आग, Sardar Udham Singh ने ऐसे लिया जलियांवाला बाग का बदला

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 20 Jun 2026, 12:23 PM | Updated: 20 Jun 2026, 12:23 PM

Sardar Udham Singh: तारीख थी 13 मार्च 1940 की, लंदन के कैक्सटन हॉल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसाइटी की एक प्रमुख बैठक चल रही थी। बैठक में कई बाहरी लोग शामिल हुए थे, इस दौरान 40 साल की एस सिख शख्स भी एक खाली कुर्सी पर आकर बैठ गया, जिसमें अपनी पत्नी के नाम से टिकट ली थी.. बैठक सुचारू रूप से चल रही थी, लेकिन जैसे ही बैठक खत्म होने वाली थी, उस शख्स के हाथ में जो किताब था उस किताब को उसने खोला.. जिसमें पन्ने नहीं बल्कि थी एक रिवॉल्वर.. उस शख्स ने रिवॉल्वर निकाली और भाषण मंच  की तरफ बढ़ रहे एक अंग्रेजी अधिकारी माइकल ओ’डायर पर ताबड़तोड़ 2 गोलियां चलाई।

और पढ़े: क्या है रोहतक के गुरुद्वारा बंगला साहिब का गुरु तेग बहादुर जी से ऐतिहासिक संबंध? Gurdwara Bangla Sahib Rohtak

कौन थे शहीद-ए-आजम सरदार उधम सिंह?

जिसमें से एक गोली फेफड़ो और गुर्दो से होकर निकली, और माइकल ओ’डायर की मौके पर ही मौत हो गई.. मगर गोली चलाने वाला शख्स वहां से भागा नहीं। बल्कि उसने शहीदे आजम भगत सिंह के रास्ते को चुनकर आत्मसमर्पण कर दिया। ये हत्या नहीं सही मायने में बदले की वो कहानी थी जो कि करीब 21 साल पहले पंजाब के जलियावालां में शुरु हुई थी और गोली चलाने वाले शख्स थे शहीद-ए-आजम सरदार उधम सिंह । क्या है बदले की वो कहानी, जिसे 21 साल बाद उधम सिंह ने पूरा किया था। चलिये आपको ये बदले की कहानी बताते है।

1919 में भारत में रोलेट एक्ट लागू

बदले की ये कहानी शुरु हुआ 13 फरवरी 1919 के दिन.. ब्रिटिश हुकुमत ने मार्च 1919 में भारत में रोलेट एक्ट लागू कर दिया था, रोलेट एक्ट जिसका अधिकारिक नाम अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम, 1919 था, जिसके तहत राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने, किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकद्दमा चलाए उसे जेल में बंद करने, केस दर्ज करने वाले की पहचान छिपाने, किसी भी मुकद्दमे के फैसले के बाद किसी उच्च न्यायालय में अपील नहीं कर सकते थे,  बलपूर्वक प्रेस की स्वतंत्रता का अधिकार छीन लिया गया और किसी को भी बिना कारण जेल में डालने का नियम बनाया गया।

सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी

ये सीधे तौर पर भारतीयों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कुचलने के लिए ही एक्ट लागू किया गया था, ब्रिटिश हुकुमत की दमनकारी कानून को भारत के लोग किसी भी तरीके से मानने के लिए तैयार नहीं थे और उसके विरोध में पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में बैशाखी के मौके पर सिखों का हुजूम आया था, तो वहीं कुछ सिख संगठित होकर दो नेताओं सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी और उनके काली पानी की सजा दिये जाने को लेकर जलियांवाला बाग में रोलेट एक्ट के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे।

जनरल डायर ने निहत्थे भीड़ पर गोली चलवाई

जो श्रद्धालु गुरुद्वारा साहिब में आये थे, उनमें बहुत से बिना प्रदर्शन करने के इरादे से बस कार्यक्रम को देखने के लिए जमा हुए थे, मगर तभी अंग्रेजी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर बाद के मुख्य द्वार पर पहुंचा.. करीब 5,000 लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठे थे, जिसमें ज्यादातर तो केवल बैशाखी में खालसा पंथ की स्थापना की खुशियां मनाने पहुंचे थे, लेकिन ब्रिटिश सेना के आने के बाद भी भाषण दे रहे नेतांओं ने शांत रहने के लिए कहा मगर करीब 10 मिनट के बाद जनरल डायर ने निहत्थे भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया।

10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं… बाहर निकलने का एक ही रास्ता था.. बाग में कुआं था, कुछ ही देर में वो लाशो से भर से गया.. और इस नरसंहार को अपनी आंखो से देखा था 20 साल के सरदार उधम सिंह ने.. जो वहां लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे.. उधम सिंह उस गोलीबारी में बच गए थे, लेकिन उनके दिल में मासूम भारतीय की मौत का बदला लेने की आग धधकने लगी थी।

अमेरिका में लागू जॉनसन-रीड (आप्रवासन) अधिनियम

उधमसिंह ने 1924 में गदर पार्टी को जॉइन किया, और वो पहचान छिपा कर लंदन में रहने लगे थे, और भारतीय को सगंठित करने लगे। उन्होंने 1920 के दशक में एक मैक्सिकन महिला, लूपे हर्नांडेज़ से शादी की थी, और लेकिन वो 1927 में उन्हें 1924 में अमेरिका में लागू जॉनसन-रीड (आप्रवासन) अधिनियम के कारण परिवार को छोड़ कर भारत आना पड़ा था। वो भगत से काफी प्रभावित थे औऱ 1927 में, भगत सिंह के आदेश पर वे 25 साथियों के साथ-साथ रिवॉल्वर और गोला-बारूद लेकर भारत लौटे थे.. लेकिन बिना लाइसेंस की हथियार रखने के मामले में वो गिरफ्तार हो गए औऱ पांच साल मुकदमा चला, 1931 को वो रिहा हुए थे।

जिसके बाद कड़ी निगरानी के बाद भी वो पहले कश्मीर और फिर वहां से जर्मनी भाग गए, 1934 में उन्हें लंदन जाने का मौका मिला.. जहां वो अपने बदले को पूरा करने की योजना बनाने लगे। करीब 6 सा इंतजार करने के बाद उन्हें मौका मिला.. उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर एक टिकट बुक किया और 13 मार्च 1940 को कैक्सटन हॉल में उधमसिंह ने माइकल ओ’डायर की गोली मारकर हत्या कर दी। बहुत लोग माइकल ओ’डायर को जनरल डायर समझ लेते है लेकिन माइकल ओ’डायर वो शख्स है जो जलियावालां बाग हत्याकांड के समय लेफ्टिनेंट गर्वनर था, और उसके आदेश पर ही जनरल डायर ने मासूम निहत्थे लोगों का नरसंहार किया था।

अधम सिंह ने करीब 21 साल का लंबा इंतजार किया था, पंजाब के सैकड़ो लोगो के उस खून का.. जिससे जलियावाला बाग लाल हो गया था। उधम सिंह को हत्या करने के आरोप में 31 जुलाई 1940 को सिंह को पेंटनविले जेल में स्टेनली क्रॉस से फांसी दी गई थी, जिसे उन्होंने हंसते हंसते बिना किसी अफसोस के स्वीकार कर लिया था। उधमसिंह के अवश्ष आज भी अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में संरक्षित हैं.. हर साल 31 जुलाई को पजाब के सुनाम में शहीद दिवस मनाया जाता है, जो ऊधम सिंह की वीरता और साहस के सम्मान में मनाया जाता है। अधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली थी.. औऱ हमेशा के लिए एक अमर क्रांतिकारी बन गए।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds