क्या है रोहतक के गुरुद्वारा बंगला साहिब का गुरु तेग बहादुर जी से ऐतिहासिक संबंध? Gurdwara Bangla Sahib Rohtak

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 20 Jun 2026, 12:01 PM | Updated: 20 Jun 2026, 12:01 PM

Gurdwara Bangla Sahib Rohtak: आपने दिल्ली में फैमस सिख गुरुद्वारा बंग्ला साहिब के बारे में तो सुना ही होगा.. ये एक ऐसा गुरुद्वारा है जिसे आठवे गुरू गुरु हरकिशन साहिब के सम्मान में राजा जय सिंह ने अपने महल को गुरुद्वारे में तब्दील किया था, ये एक ऐसा गुरुद्वारा है, जो पूरी दिल्ली में सबसे ज्यादा आगंतुको द्वारा पसंद किया जाता है, लेकिन क्या आप ये जानते है कि केवल दिल्ली में ही नहीं बल्कि हरियाणा में भी एक गुरुद्वारा बंगला साहिब है.. जो नौवे गुरू तेगबहादुर की उस उदारता का प्रतीक है जो नौवे गुरु ने हमेशा मानवता को लेकर दिखाया है। अपने इस लेख में हम हरियाणा के रोहतक में मौजूद गुरुद्वारा बंगला साहिब के बारे में जानेंगे।

सिखों के लिए उनकी धार्मिक आस्था का प्रतीक गुरुद्वारा बंगला साहिब नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर के उस बलिदान का प्रतीक है, जिसने दर्शाया कि जब बात धर्म और मानवता की रक्षा की हो तो गुरु तेग बहादुर स्वयं आंगरों भरे रास्ते पर चलने के लिए तैयार थे। हरियाणा के रोहतक में बना गुरुद्वारा बंगला साहिब भी एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। ये गुरुद्वारा रोहतक रेलवे स्टेशन से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर गुरु जींद रोड पर माताजी गेट के पास बनाया गया है। यहां रोजाना लंगर की सुविधा है जो हर धर्म औऱ जाति के लोगो के लिए सदैव खुला रहता है।

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क्यों बनाया गया था गुरुद्वारा

ये बात 1675 की है, मुगल बादशाह औरंगजेब अपने शासनकाल के दौरान जबरन हिंदुओ को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया था, जिसके लिए उसने भारी कत्लेआम भी मचाया था, इसी दौरान उसकी गंदी नजर कश्मीरी पंडितो पर पड़ी.. उसने जब कश्मीर में भी धर्म परिवर्तन का खेल शुरु किया तब कश्मीरी पंडितों का एक जत्था पंडित कृपाराम की अगुवाई में गुरु तेग बहादुर से मिला और उनसे प्रार्थना की कि वो उनके धर्म की रक्षा करें। गुरु तेग बहादुर जो कि मानवता औऱ शांति के प्रतीक थे, वो जानते थे कि औरंगजेब को मनाना आसान नहीं है लेकिन उन्होंने तय किया कि वो खुद दिल्ली जायेंगे।

जब गुरु साहिब रोहतक के जंगलो में रुके

उन्होंने पंडितो से कहा कि वो औरंगजेब को संदेश भिजवा दें कि अगर उसने गुरु तेग बहादुर का धर्म परिवर्तन करवा दिया तो वो लोग भी अपना धर्म बदल लेंगे.. बस फिर क्या था, उन्होंने बरसात शुरु होने से पहले दिल्ली की तरफ कूच कर दिया.. मगर दिल्ली पहुंचने से पहले वो कई स्थानों पर रूके औऱ वहां कई धार्मिक कार्य किये, जिसमें से एक स्थान रोहतक भी है। सिख इतिहासकारों के अनुसार गुरु साहिब रोहतक के जंगलो में करीब 13 दिन तक रूके थे, इस स्थान पर ईमली और नीम के दो बड़े दरख्त थे।

जिसमे गुरु साहिब अपने घोड़े को बांधते औऱ उसकी छाया में आराम किया करते थे, इसी स्थान पर वो संगत को प्रवचन देते, औऱ धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते थे.. जब 13 दिनों तक यहां रहने के बाद गुरु साहिब ने दिल्ली की तरफ कूच किया तब उनके जाने के बाद संगतों ने इस स्थान को पवित्र स्थान करार दिया जहां गुरु साहिब के पांव पड़े थे, ये स्थान गुरु साहिब के दिये गए प्रवचनो से पवित्र और पावन हो गया था.. संगतो ने इस स्थान पर एक गुरुद्वारा बनवाने का फैसला कर लिया।

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औरंगजेब की यातनायें

गुरु साहिब जब दिल्ली पहुंचे तो औरंगजेब ने उन्हें काफी प्रताड़ित किया ताकि वो धर्म बदल लें, यहां तक के उनके तीन प्रिय शिष्यों भाई दयाला जी, भाई मतिदास और सतिदास को भी कैद कर लिया गया, गुरु साहिब और उनके शिष्यों को तोड़ने के लिए औरंगजेब ने हर संभंव यातनायें दे कर देख ली, लेकिन वो गुरु साहिब को छोड़िये, उनके शिष्यों तक को धर्म के मार्ग से नहीं भटका पाया.. जिसके कारण गुस्से में उसने गुरु साहिब के सामने ही तीनों शिष्यों का भी कत्ल करवा दिया, जिसमें एक को आरी से कटवा दिया, दूसरे को गर्म देग में बैठा दिया और तीसरे को रूई लपेटकर आग लगा कर जिंदा ही जला दिया।

पवित्र श्री गुरु साहिब का प्रकाश

औरंगजेब को लगा कि शायद शिष्यों की शहादत गुरु साहिब के हौसले को तोड़ देगी, मगर ऐसा नहीं हो सका। गुरु साहिब तब भी तट से मस नहीं हुएं, जिससे अंत में गुरु साहिब को 24 नवंबर 1675 को फांसी पर लटका दिया। 1924 तक पहले यहां उदासी पंरपरा को मानने वालों ने छोटा सा मंदिर बनवाया हुआ था, जिसे 1924 में स्थानीय सिख समिति ने अपने अधिकार में ले लिया और यहां पवित्र श्री गुरु साहिब का प्रकाश किया गया, जिसके बाद . हिंदू और सिख आस्था का प्रतीक बन गया, हालांकि आजादी के बाद 1950 के दशक में यहां गुरुद्वारे का विस्तार शुरु किया गया, यहां आज एक भव्य विशाल गुरुद्वारा है, जिसे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन समिति द्वारा स्चालित एक स्थानीय समिति प्रबंधित करती है।

गुरु साहिब केवल सिख धर्म की रक्षा के लिए ही तत्पर नहीं रहे बल्कि कश्मीरी पंडितों की शिखा, जनेऊ और तिलक को भी मिटने से बचा कर इस बात का प्रमाण दिया कि जब बात रक्षा की हो तो वो हर धर्म में सबसे पहले मानवता की रक्षा करेंगे। ये गुरुद्वारा केवल सिखों के लिए ही नहीं बल्कि हिंदूओं के लिए भी उनकी आस्था का प्रतीक है। गुरु साहिब को समर्पित ये गुरुद्वारा आज भी गुरू साहिब की उपस्थिति का भान कराता है। गुरु साहिब के बलिदान की गाथा का प्रतीक गुरीद्वारा बंगला साहिब लाखो करोड़ो लोगो की आस्था का प्रतीक है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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