Fuel Price Hike Impact: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हाल के दिनों में नरमी देखने को मिली है, लेकिन भारत में पेट्रोल, डीजल और CNG के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। यही वजह है कि आम लोगों के मन में बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब दुनिया में तेल सस्ता हो रहा है तो भारत में ईंधन की कीमतें आखिर क्यों बढ़ रही हैं? बीते 11 दिनों में सरकारी तेल कंपनियों ने चौथी बार पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए हैं, जबकि दिल्ली में CNG भी 12 दिनों के भीतर चार बार महंगी हो चुकी है। इससे लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है।
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11 दिनों में चौथी बार बढ़े दाम| Fuel Price Hike Impact
सरकारी तेल कंपनियों ने मध्यपूर्व में जारी तनाव और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता को देखते हुए चरणबद्ध तरीके से कीमतें बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। इसी के तहत पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बार-बार बढ़ोतरी की जा रही है। वहीं इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) ने भी CNG के दामों में लगातार इजाफा किया है। दिल्ली में CNG अब 6 रुपये प्रति किलो तक महंगी हो चुकी है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए गए, उसी दिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 5 प्रतिशत गिरकर 92 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसके पीछे अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर आई खबरें थीं। लेकिन इसके बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिली।
आज का तेल, आज नहीं आता
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार का पूरा सिस्टम काफी जटिल है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि आज अगर कच्चा तेल सस्ता हुआ तो पेट्रोल-डीजल भी तुरंत सस्ता हो जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता। तेल कंपनियां कच्चा तेल पहले से तय अनुबंधों यानी फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए खरीदती हैं। इसका मतलब यह है कि आज जो पेट्रोल आपकी गाड़ी में डल रहा है, वह कई हफ्ते या महीनों पहले खरीदे गए कच्चे तेल से तैयार हुआ है। तेल जहाजों के जरिए भारत पहुंचता है, फिर रिफाइनरियों में प्रोसेस होता है और उसके बाद बाजार तक आता है। इसलिए आज की खुदरा कीमतें मौजूदा अंतरराष्ट्रीय दरों से नहीं, बल्कि पुराने खरीद मूल्य से तय होती हैं।
क्या है ‘इंडियन बास्केट’ का खेल?
भारत अपनी जरूरत का तेल सिर्फ एक देश से नहीं खरीदता। देश कई तरह के क्रूड ऑयल का मिश्रण इस्तेमाल करता है, जिसे ‘इंडियन बास्केट’ कहा जाता है। इसमें ब्रेंट क्रूड जैसे स्वीट ग्रेड तेल के साथ ओमान और दुबई के सोर ग्रेड तेल भी शामिल होते हैं। भारत रूस, यूएई, अमेरिका, वेनेजुएला समेत कई देशों से तेल खरीदता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड की कीमत कम होने के बावजूद भारत के लिए तेल की औसत लागत ज्यादा हो सकती है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, जब वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, तब भारतीय बास्केट की कीमत 106 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा चल रही थी। यानी भारत को वास्तविक खरीद में ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही थी।
तेल कंपनियों पर बढ़ रहा घाटा
मध्यपूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने भारत के आयात बिल को काफी बढ़ा दिया है। सरकारी तेल कंपनियों का कहना है कि वे लंबे समय से घाटे में चल रही हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, कीमतें बढ़ाने से पहले कंपनियों को हर दिन करीब 1,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा था।
अब दाम बढ़ने के बाद यह घाटा कुछ कम होकर लगभग 600 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया है। इसमें पेट्रोल, डीजल और LPG के आयात की लागत शामिल है। ऐसे में कंपनियां तुरंत कीमतें घटाने की स्थिति में नहीं हैं।
आम आदमी पर बढ़ा बोझ
ईंधन महंगा होने का असर सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ती है, जिसका असर सब्जियों, दूध, राशन और रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर भी पड़ता है। वहीं CNG महंगी होने से ऑटो, टैक्सी और कमर्शियल वाहनों का किराया भी बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय हालात पूरी तरह स्थिर नहीं होते और तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी कम नहीं होती, तब तक भारतीय उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलने की संभावना कम है। फिलहाल आम लोगों के लिए महंगे ईंधन का बोझ आने वाले दिनों में भी चिंता का कारण बना रह सकता है।





























