Ghaziabad: सफाई व्यवस्था बदहाल, करोड़ों का बजट फिर भी खोड़ा बना कूड़े का डंपयार्ड! गाजियाबाद की खोड़ा-मकनपुर नगर पालिका (Khoda Makanpur Nagar Palika) में करोड़ों रुपये का बजट खर्च होने के बाद भी सफाई व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन ठप है, और मुख्य सड़कें कचरे के पहाड़ों में तब्दील हो चुकी हैं।
करीब 12 लाख की आबादी आज बुनियादी स्वच्छता के लिए तरस रही है और जगह-जगह लगे कचरे के ढेरों के बीच नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। कागजी दावों और जमीनी हकीकत के इस बड़े अंतर ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर जनता के टैक्स का करोड़ों रुपया जा कहाँ रहा है? प्रशासन इस गंभीर लापरवाही पर कब जागेगा?
क्या है पूरा मामला
मीडिया द्वारा मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि गाजियाबाद की खोड़ा-मकनपुर नगर पालिका (Ghaziabad Khoda Makanpur Nagar Palika) में करोड़ों रुपये का बजट खर्च होने के बावजूद सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है, जिससे दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार यहाँ की करीब 12 लाख की आबादी गंदगी और भयंकर दुर्गंध के बीच रहने को मजबूर है।
स्थानीय निवासियों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि बजट और कागजी दावों के बाद भी जमीनी स्तर पर हालात बदहाल बने हुए हैं। नियमित रूप से कूड़ा न उठने के कारण मुख्य मार्गों, रिहायशी इलाकों के खाली प्लॉटों और बाजारों के पास कूड़े के विशाल पहाड़ (अंबार) बन गए हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पूर्व में भी खोड़ा नगर पालिका को आवासीय क्षेत्रों के पास अवैध रूप से कचरा फेंकने पर फटकार लगाई है, लेकिन इसके बावजूद ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका है।
जनता को होने वाली परेशानियां
भीषण गर्मी और आने वाले मानसून के मौसम में इन ढेरों में सड़ रहे कचरे की वजह से संक्रामक बीमारियां, मच्छरों का प्रकोप और महामारी फैलने का खतरा लगातार बढ़ रहा है। सड़कों के किनारे जमा कचरे से उठने वाली बदबू के कारण स्थानीय निवासियों और राहगीरों का वहां से गुजरना मुश्किल हो गया है।
मुख्य सड़कों पर फैले कचरे और उसके पास आवारा पशुओं के जमावड़े की वजह से खोड़ा की तंग सड़कों पर अक्सर यातायात प्रभावित रहता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि नगर पालिका प्रशासन को केवल फाइलों में शहर चमकाने के बजाय जमीन पर उतरकर कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों की संख्या बढ़ानी चाहिए और कचरे के निस्तारण (Biomining/Processing) की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
Ghaziabad खोड़ा की यह बदहाली केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य और गरिमा के साथ खिलवाड़ है। केवल बजट पास करने या कागजों पर योजनाएं बनाने से खोड़ा की गलियां साफ नहीं होंगी। प्रशासन को तुरंत डोर-टू-डोर वाहनों की संख्या बढ़ानी होगी, सफाई कर्मचारियों की कमी को दूर करना होगा और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का कोई स्थायी समाधान ढूंढना होगा। जब तक जनता के पैसे का सही इस्तेमाल जमीन पर नहीं दिखेगा, तब तक ‘स्वच्छ भारत’ का सपना खोड़ा की इन बदहाल गलियों में दम तोड़ता रहेगा।





























