Chandigarh History: भारत को राजधानी दिल्ली से करीब 265 किलोमीटर दूर 1948 में एक शहर बसाया गया था। आपको जानकर हैरानी होगी को यहां 13 नंबर स्ट्रीट नहीं है, न ही किसी बिल्डिंग में 13 नंबर का फ्लोर होता है, वजह, वजह इस शहर को बसाने वाले को 13 नंबर पसंद नहीं था। वैसे तो सिखो की नगरी पंजाब में बसी है लेकिन नाम पड़ा है एक हिंदू धर्म को देवी चंडी के नाम से, चंडीगढ़। आर्किटेक्चर और शानदार शहरी नियोजन यानी कि अर्बन प्लानिंग का बेहतरीन नमूना है चंडीगढ़। जो कि अलग अलग 60 सेक्टरों में बंटा है। लेकिन इस वक्त ये विवाद का सबसे बड़ा केंद्र है।
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चंडीगढ़ की ताकत और इसकी विशेषता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि ये न केवल दो राज्यों को राजधानी है बल्कि एक केंद्र शासित प्रदेश भी है। हालांकि इसका 60 प्रतिशत हिस्सा पंजाब के पास है और 40 प्रतिशत हरियाणा के पास, लेकिन अब जंग है इसे पूरा पाने की, वहीं केंद्र का अपना दावा,जिसके लिए स्थानीय नेता औऱ संगठन किसी कीमत पर राजी नहीं है.. ऐसे में ये विवाद कई दशक बीतने के बाद भी जारी है.. अपने इस लेख में जानेंगे कि आखिर क्यों चंडीगढ़ विवादों में घिरा रहा.. और क्यों अभी तक इसका निपटारा नही हो सका है।
चंडीगढ़ का इतिहास और उससे जुड़े बड़े विवाद
15 अगस्त 1947 को भारत को न केवल अंग्रेजी हुकुमत से आजादी मिली थी बल्कि भारत के दो टुकड़े भी हुए थे, लेकिन इस बंटवारे में किसे क्या मिला इसका खुलासा हुआ 17 अगस्त 1947 को.. जब रेडक्लिफ की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। जिसके कारण लाहौर जो कभी पंजाब की प्रशासनिक राजधानी हुआ करती थी, वो पाकिस्तान पंजाब के हिस्से में चली गई.. ऐसे में जरूरत थी कि भारतीय पंजाब के लिए भी एक राजधानी बसाई जाये और तब नेहरू के ख्वाबो का शहर बसाने की नींव रखी गई। आधुनिक सुविधाएं से परिपूर्ण, ग्रिड प्लान, सेक्टर्स, ग्रीन बेल्ट्स जैसी सुविधाओं के साथ स्विस-फ्रेंच आर्किटेक्ट ली कोर्बुज़िए, के साथ साथ ब्रिटिश आर्किटेक्ट डेम जेन ड्रू और मैक्सवेल फ्राई और भारतीय वास्तुकारों के मिलकर चंडीगढ़ की रूपरेखा तैयार की थी। इस शहर को बसाने की तैयारी काफी जोरो शोरो से की गई, क्योंकि ये तब के प्रधानमंत्री का ड्रीम शहर जो था।
इसके लिए मार्च 1948 में पंजाब के शिवालिक माउंटेन रेंज की घाटी में करीब 50 गावों को चुना गया.. जिसके लिए करीब 21 हजार लोगो को विस्थापित कराया गया था। चंडीगढ़ 114 वर्ग किलोमीटर में फैला है। साल 1952 में चंडीगढ़ की स्थापना की गई। तब तक हरियाणा और हिमाचल प्रदेश पंजाब का ही हिस्सा था तो किसी तरह का कोई विवाद उत्पन्न हुए बिना ही चंडीगढ़ को 7 अक्टूबर 1953 को पंजाब की राजधानी घोषित कर दिया गया। सबकुछ ठीक से चल रहा था, चंडीगढ़ में पंजाब का हाइकोर्ट मौजूद था.. लेकिन चंडीगढ़ को लेकर विवाद शुरु हुई 1966 में.. जब पंजाब फिर से तीन टुकड़ो में बंटा।
पंजाब और हरियाणा के बीच बंटा चंडीगढ़
भाषा और कल्चर के आधार पर पंजाब से अलग हुए हरियाणा और हिमाचल प्रदेश.. ऐसे में हिमाचल प्रदेश को शिमला राजधानी के रूप में मिली.. लेकिन चंडीगढ़ पंजाब हरियाणा के सीमा पर थी, तो विडंबना ये थी कि चंडीगढ़ किसे मिले.. तय हुआ कि वो दोनो राज्यों की संयुक्त राजधानी होगी, मगर जब राज्य नहीं माना तो केंद्र ने उसे राजधानी बनाने के साथ ही केंद्र शासित प्रदेश भी घोषित कर दिया, साथ ही 60 प्रतिशत अधिकार पंजाब को और 40 प्रतिशत अधिकार हरियाणा को दिया गया। लेकिन ये समाधान नहीं था, ये आगाज था एक नए विवाद का, जिसके कारण हरियाणा और पंजाब के बीच राजधानी के पूर्ण अधिकार को लेकर जंग शुरु हो गई… हैरानी की बात है कि एक केंद्र शासित प्रदेश होकर भी केंद्र के हस्तक्षेप को लेकर भी पंजाब के नेताओं का नजरिया काफी नकारात्मक है, तो भला वो हरियाणा को पूर्ण अधिकार कहां से लेने देंगे।
राजीव-लोंगोवाल समझौता
वहीं हमें राजीव-लोंगोवाल समझौता (1985) को नहीं भूलना चाहिए..जब 1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और अकाली दल के संत लोंगोवाल ने चंडीगढ़ पर पंजाब का पूर्ण अधिकार पाने के लिए ये समझौता किया था कि चंडीगढ़ भविष्य में अगर किसी राज्य की राजधानी होगी तो वो पंजाब होगा.. और हरियाणा को उतने मूल्य की जमीन दी जायेगी। इस समझौते को 26 जनवरी 1986 में लागू भी किया जाना था, समझौते में ये भी कहा गया कि हरियाणा को इसके बदले 400 गांव दिये जायेंगे, साथ ही अबोहर और फंगल के इलाके भी, लेकिन लागू होने का समय तो आ गया लेकिन गांव चिन्हित ही नहीं हो सकें, नतीजा ये समझौता अभी भी अधूरा है।
हरियाणा की अपनी प्रशासनिक जरूरतें और कानून
वहीं पंजाब का कहना है कि चंडीगढ़ को पंजाब की संस्कृति को ध्यान में रखकर बसाया गया, जहां के लोगो की भाषा, संस्कृति और जनसंख्या ज्यादातर पंजाबी ही है, चंडीगढ़ पंजाब इतिहास का प्रतीक है, इसलिए ये पंजाब का ही होना चाहिए। चुंकि हरियाणा को समान हक नहीं मिला.. जिसका हरियाणा दावा करता है। उनका कहना है कि हरियाणा की अपनी प्रशासनिक जरूरतें और कानून है.. लेकिन वो अक्सर पंजाब के हस्तक्षेप के कारण य़ा तो धीमी हो जाती है, या फिर उसमें व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। अक्सर पंजाब और हरियाणा दोनों विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित होते है कि चंडीगढ़ किसी एक राज्य को पूर्ण रूप से मिलना चाहिए, लेकिन कई दशक बीतने के बाद भी ये मसला अनसुलझा है।
चंडीगढ़ में केंद्र के नियम लागू कर दिये
2020 के बाद ये विवाद और ज्यादा बढ़ गया.. जब केंद्र सरकार ने कर्मचारियों की सेवा नियमावली में बड़ा बदलाव कर दिया..और केंद्र चंडीगड़ के प्रशानिक फैसलों में पूरा हस्तक्षेप करने लगा। 1 अप्रैल 2020 को फिर से आम आदमी पार्टी की नवनिर्वाचित सरकार ने फिर से विधानसभा में चंडीगढ़ को लेकर दावा ठोक दिया.. सीएम भगवंत मान ने उस वादे को भी याद दिलाया जिसके तहत चंडीगढ़ पंजाब का होना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार ने चंडीगढ़ में केंद्र के नियम लागू कर दिये, जिससे पंजाब सरकार को काफी नाराजगी हो गई।
उन्होंने सीधे आरोप लगाया कि केंद्र जानबूझ कर चंडीगढ़ को अपने अधीन लाना चाहती है ताकि पंजाब प्रशानिक रूप से कमजोर हो जायें। सभी जानते है कि बीजेपी पंजाब पर कभी राज नहीं कर सकी है तो वो अब चंडीगढ़ पर नियंत्रण करके सरकार के हाथ बांधना चाहती है। जिसके कारण ये विवाद जारी है। ऐसे में देखना ये होगा कि क्या चंडीगढ़ को लेकर कोई बड़ा फैसला होगा.. आपको क्या लगता है चंडीगढ़ किसके पास होना चाहिए।




























