क्यों खास है गुरु अमरदास जी द्वारा निर्मित यह 84 सीढ़ी वाला कुआं जानें पूरी कहानी। Gurdwara Sri Baoli Sahib

Shikha Mishra | Nedrick News Punjab Published: 02 Apr 2026, 05:42 AM | Updated: 02 Apr 2026, 05:42 AM

Gurdwara Sri Baoli Sahib: पूरी दुनिया में सिख धर्म से जुड़ी अनगिनत निशानियां मिलेगी। पहले गुरु गुरु नानक देव जी की यात्रा से लेकर बाकि के 9 गुरुओं के अलग अलग स्थानों पर जाकर सिख धर्म का प्रचार प्रसार करना, उनके किए गए परोपकार के कार्य, धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने की कहानी हो.. उनके महान इतिहास की चर्चा होती ही है, लेकिन क्या आप ये जानते है कि सबसे पहले सिख पूजा स्थल कहां बना था.. कहां पर पहली बार सिख पहचान की ऐतिहासिक नींव रखी थी। जिसके द्वारा ही ये प्रमाणित हुआ कि सिख धर्म कोई छोटा मोटा धर्म नहीं बल्कि भविष्य में एक महान धर्म साबित होने वाला है।

अपने इस लेख मे हम सिख धर्म की पहली ऐतिहासिक इमारत की बात करेंगे.. जो आज भी सिक्खी के फलने फूलने की प्रमाण है.. ये इमारत है गुरुद्वारा श्री बावली साहिब.. एक ऐसा गुरूद्वारा, जिसमें मौजूद 84 सीढीयो का कुआं व्यक्ति को मृत्यु के 84 लाख चक्रों से मुक्ति दिलासा है। अपने इस वीडियो में हम गोइंदवाल साहिब में स्थित गुरूद्वारा श्री बावली साहिब के बारे में जानेंगे.. जो 16वी सदी के ऐसे ही सिक्खी की शान बन कर खड़ा है।

गुरुद्वारा श्री बावली साहिब का इतिहास

गुरूद्वारा श्री बावली साहिब जिसका निर्माण 16वी सदी में सिखों के तीसरे गुरु गुरु अमर दास जी ने बनवाया था। ये गुरुद्वारा अमृतसर से करीब 50 किलोमीटर दूर तरन तारन जिले के गोइंदवाल गांव में स्थित है। कहा जाता है कि तीसरे गुरु साहिब गुरु अमर दास गोइंदवाला में रहा करते थे, लेकिन उनके प्रवास के दौरान इस स्थान पर बुरी तरह से सूखा पड़ा था, उस सूखे की मार से लोगो को बचाने के लिए गुरु साहिब ने एक बाबली, यानि की कुआं बनवाना शुरु किया। जिसमें पानी तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़िया बनाई गई। ये एक अष्टकोणीय बावली है, ईंटों और चूने के गारे से बना ये कुआं लगभग 20 मीटर गहरा है।

बावली का गुबंद कमल के आकार में

इस बावली को ढकने के लिए एक गुबंद कमल के आकार के आकार का बना है, जिसके चारों तक सोने की परत वाले शिखर है। जो कि एक गुरुद्वारे की तरह ही नजर आता है। इसलिए लोग इस बाबली को बाबली साहिब कहते है। यहां आने वाले भक्तों को नुकीले मेहराबदार रास्ते से अंदर की तरफ जाना होता है, अंदर की तरफ दसो गुरुओ का चित्र है, वहीं बावली की दीवारों पर गुरु अमरदास के जीवन के जुड़े कई प्रसंग अंकित है।

ये गुरु साहिब के आशिर्वाद की ही देन है कि मौसम चाहे कोई भी हो इसका पानी एक ही स्तर पर रहता है। इस बावली में नीचे उतरने के लिए बनी 84 सीढ़िया असल में प्रतीक है व्यक्ति के 84 लाख जीवन मृत्यु से मुक्ति का.. कहा जाता है कि यहां आने वाले श्रद्धालु बावली में स्नान करके जपजी का पाठ करते है वो मृत्यु के चक्र से आजाद हो जाते है।

गुरुद्वारा गोइंदवाला – Gurdwara Goindwal

वहीं इस बाबली के पास ही एक गुरुद्वारा स्थित है, जो कि गुरु अमरदास जी को समर्पित है। कहा जाता है कि इस स्थान पर गुरु साहिब करीब 33 सालो तक रहे थे। इस गुरुद्वारे को गुरुद्वारा गोइंदवाला कहा जाता है, जिसमे एक बड़ा का आंगन है, जहां रोजाना गुरबाणी का पाठ सुनने के लिए सैकड़ो भक्त आते है.. ये गुरुद्वारा सुबह 3 बजे खुलता है और रात को 10 बजे बंद होता है। नवंबर से लेकर मार्च कर यहां आने का समय सबसे बेहतर माना जाता है। सिखों के पवित्र त्योहारों में यहां आप सिख संस्कृति को बेहद करीब से महसूस कर सकते है। आत्मिक शांति और सूकून के लिए ये स्थान सबसे बेहतर माना जाता है। इस पवित्र बावली में स्नान करने से आपकी मन की शांति मिलती है।

सिख धर्म के प्रतीक के रूप में बावली साहिब

सबसे हैरानी की बात है कि सिख धर्म के प्रतीक के रूप में बावली साहिब असल में पहली ईमारत है.. यह सिख धर्म का पहला केंद्र था.. गुरु साहिब ने 33 साल यहीं बिताये थे, और जात पात के बंधनो से उठ कर सामुदायिक सेवा और समानता को बढ़ावा देने का संदेश इसी स्थान पर दिया था। गुरुद्वारा गोइंदवाल औऱ गुरुद्वारा बावली साहिब केवल गुरु साहिब की महानता और सिखों की मजबूत नींव की ही प्रतीक नहीं है… बल्कि यहां की बावली हर सिख को ये अहसास दिलाती है कि क्यों सिख धर्म में जातपात का भेदभाव नहीं है।

ये बावली केवल पवित्रता का ही नही बल्कि आपसी भाईचारे का भी प्रतीक है.. जहां अमीर गरीब हर व्यक्ति पूरी श्रद्धा से आता है और सबको 84 सीढ़िया उतरनी होती है तभी वो बावली के पवित्र जल को छू सकते है… यानि की कोई कितना भी अमीर हो या गरीब.. उसे जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने के लिए 84 लाख जन्मों का सफर करना होता है.. और बावली साहिब का पवित्र जल उस चक्र से मुक्ति दिलाला है। आपको सिखों के पहले प्रतीक गुरुद्वारा बावली साहिब की कहानी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें. साथ ही क्या आप इस गुरुद्वारे में घूमे है तो कैसा रहा आपका एक्सपीरियंस हमसे शेयर करना न भूले।

 

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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