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Mukul Roy death: वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय ने 71 साल की उम्र में ली अंतिम सांस, जानिए उन्होंने कब की अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत

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Mukul Roy death: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के संस्थापक सदस्य और पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री मुकुल रॉय का सोमवार (23 फरवरी 2026) तड़के करीब 1:30 बजे कोलकाता के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके बेटे शुभ्रांशु रॉय ने पुष्टि की कि उन्होंने कार्डियक अरेस्ट के बाद अंतिम सांस ली। मुकुल रॉय लंबे समय से डिमेंशिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे।

ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे

मुकुल रॉय कोतृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में गिना जाता है और वह लंबे समय तक पार्टी सुप्रीमो व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जीके करीबी सहयोगी रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बंगाल में यूथ कांग्रेस से की थी। टीएमसी बनने के बाद रॉय पार्टी के महासचिव बने और दिल्ली की राजनीति में पार्टी का बड़ा चेहरा बनकर उभरे।

राजनीतिक सफर की शुरूआत – Beginning of the political journey

मुकुल रॉय ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत 1980 के दशक में एक युवा नेता के तौर पर की थी। उन्होंने युवा कांग्रेस (Youth Congress) से शुरुआत की, उन्होंने राजनीति का ककहरा Indian National Congress की युवा शाखा, ‘यूथ कांग्रेस’ से सीखा। इसी दौरान वे ममता बनर्जी के संपर्क में आए, जो उस समय स्वयं यूथ कांग्रेस की एक उभरती हुई नेता थीं।

1990 के दशक में जैसे-जैसे ममता बनर्जी का कद बढ़ा, मुकुल रॉय उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार बन गए। जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 1 जनवरी 1998 को All India Trinamool Congress (TMC) बनाई, तब मुकुल रॉय इसके संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। उन्होंने अपना पहला चुनावी कदम 2001 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में रखा। वे जगतदल (Jagatdal) निर्वाचन क्षेत्र से टीएमसी के टिकट पर मैदान में उतरे, हालांकि वे यह चुनाव हार गए थे। चुनावी हार के बावजूद संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत रही और 2006 में उन्हें पहली बार राज्यसभा भेजा गया, जहाँ से उनके राष्ट्रीय राजनीतिक करियर की वास्तविक शुरुआत हुई।

संसदीय राजनीति में अहम भूमिका

साल 2006 में मुकुल रॉय पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए और 2009 से 2012 तक उच्च सदन में टीएमसी के नेता रहे। 2011 में जब पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ और टीएमसी की सरकार बनी, तब संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का श्रेय मुकुल रॉय को ही दिया गया। उस दौर में विपक्षी दलों (सीपीएम और कांग्रेस) के कई बड़े नेताओं को टीएमसी में शामिल कराकर पार्टी का विस्तार करने में उनकी “चाणक्य” वाली भूमिका रही।

भाजपा में शामिल होना और घर वापसी

नवंबर 2017 में मुकुल रॉय ने टीएमसी से दूरियां बढ़ाते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया था। उनकी चुनावी रणनीति का ही परिणाम था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बंगाल में 18 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कृष्णनगर उत्तर सीट से भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की, लेकिन चुनाव के कुछ ही समय बाद (जून 2021) वे वापस अपनी पुरानी पार्टी टीएमसी में लौट आए।

विधायक पद और कानूनी विवाद

मुकुल रॉय का हालिया राजनीतिक जीवन कानूनी विवादों से भी घिरा रहा। 13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्य विधायक घोषित कर दिया था। हालांकि, उनके बेटे शुभ्रांशु रॉय ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद 16 जनवरी 2026 को शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिससे उनकी सदस्यता बरकरार रही थी।

बंगाल राजनीति का बड़ा चेहरा

मुकुल रॉय को पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक कुशल रणनीतिकार और प्रभावशाली नेता माना जाता था। उन्हें ‘बंगाल की राजनीति का चाणक्य’ भी कहा जाता था। उनके निधन से न केवल टीएमसी बल्कि राज्य की पूरी राजनीति में एक अहम और प्रभावशाली दौर का अंत माना जा रहा है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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