बंटवारे के समय इस पाकिस्तानी मुस्लिम ने दी थी हिंदू और सिखों को अपने घर में पनाह, पूर्वजों की तलाश में Pakistan पहुंचे सिख ने बताई पूरी कहानी

👤 vickynedrick@gmail.com | Nedrick News 🕒 Published: 02 नवम्बर 2024, 12:00 AM 🔄 Updated: 02 नवम्बर 2024, 12:00 AM
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1947 में भारत का विभाजन (1947 India Partition) भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की सबसे दर्दनाक और भयावह घटनाओं में से एक थी (Dr. Tarunjeet Singh Details)। विभाजन के कारण हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के बीच संघर्ष, हिंसा और दंगों की लहर चल पड़ी। लाखों लोग अपनी जान बचाने के लिए एक जगह से दूसरी जगह पलायन कर रहे थे। इस अराजकता, नफरत और हिंसा के बीच कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं, जिन्होंने इंसानियत की नई मिसाल कायम की। ऐसी ही एक घटना है एक मुस्लिम अधिकारी के बेटे की, जिसने एक सिख परिवार की जान बचाने के लिए कुरान की कसम खा ली।

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मुस्लिम सरकारी अधिकारी ने पेश की इंसानियत की मिसाल- Pakistani Muslims gave shelter to Sikhs

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, विभाजन के दौरान दंगे भड़कने पर लाहौर के निवासी एक मुस्लिम सरकारी अधिकारी और उनकी पत्नी ने एक सिख परिवार को दो महीने तक शरण दी थी। उस दौरान उन्हें पनाह देने वाले परिवार ने न सिर्फ खुद मुश्किलों का सामना किया बल्कि इंसानियत की एक मिसाल भी कायम की जिस पर डॉ. तरुणजीत सिंह बोटालिया ने न सिर्फ एक किताब लिखी है बल्कि उस परिवार को खोजने के लिए कई सालों तक कोशिश भी की है। दरअसल विभाजन के दौरान, इस मुस्लिम अधिकारी ने डॉ. तरुणजीत सिंह बोटालिया के परिवार को भी अपने घर में शरण दी थी।

शरण देने वाले परिवार से संपर्क का माध्यम बनी किताब- Dr. Tarunjeet Singh Details

डॉ. तरुणजीत सिंह बोतालिया (Tarunjit Singh Butalia) ने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में दावा किया कि उन्होंने अपने अध्ययन और अपने पूर्वजों से सुनी कहानियों के आधार पर एक किताब तैयार की है। वो कहते हैं कि, “इस किताब के लिए शोध के तहत मैं लाहौर, गुजरांवाला और बोटालिया में अपने पूर्वजों के घरों में भी गया। मुझे इस बात से बहुत खुशी हुई कि अब वहां लड़कियों का स्कूल है। मैंने अपनी किताब में अपने पूर्वजों से सुनी हुई कहानियाँ लिखी थीं। इस किताब को लाहौर में कैलाश नाम के एक प्रोफेसर ने पढ़ा था। प्रोफेसर कैलाश खुद एक इतिहासकार और शोधकर्ता हैं।”

Tarunjit Singh Butalia
Source: Google

ये था शरण देने वाला परिवार

डॉ. तरुणजीत सिंह बोतालिया आगे कहते हैं, ‘जब मैं उनसे मिला तो किताब में लिखी घटनाओं के आधार पर उन्होंने मुझे बताया कि यह परिवार मुस्लिम लीग के सांसद महमूद बशीर वर्क (Muslim League MP Mahmud Bashir Warq) का परिवार है।’ डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया ने कहा कि इसके बाद मैंने महमूद बशीर अहमद वर्क से संपर्क किया। उन्हें इस पूरी कहानी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी, सिवाय इसके कि उनके पूर्वजों ने भारत के विभाजन के दौरान कई हिंदुओं और सिखों की मदद करके उनकी जान बचाई थी।

महमूद बशीर वर्क के साथ हुई मुलाक़ात- Sikh met ancestors in Pakistan

महमूद बशीर वर्क के साथ अपनी मुलाकात का वर्णन करते हुए डॉ. तरुणजीत सिंह बोटालिया कहते हैं कि जब मैं उनके पास पहुंचा तो एक सांसद की विनम्रता पहली चीज थी जिसने मुझे प्रभावित किया।

डॉक्टर तरुणजीत सिंह ने कहा, “मैंने उनसे पूछा कि क्या उनके परिवार में कोई सरकारी अधिकारी था, तो उन्होंने कहा कि हां, उनके दादा सुबे खान भारत के विभाजन के बाद लाहौर में तहसीलदार थे। मेरी दादी ने मुझे यह भी बताया कि जिस परिवार ने उनके परिवार को शरण दी थी, उसका मुखिया कर विभाग में सरकारी कर्मचारी था।”

कुरान की खाई कसम  

डॉ. तरुणजीत सिंह बोतालिया कहते हैं कि मेरी दादी ने मुझे बताया कि सुबे खान हमारे पारिवारिक  दोस्त थे। दंगे शुरू होने पर सुबे खान और उनकी पत्नी ने बहुत ही अवसाद की स्थिति में हमें अपने लाहौर स्थित घर में शरण दी। उन्होंने आगे कहा कि मेरे दादा-दादी ने दो महीने सुबे खान के लाहौर स्थित सरकारी घर में छिपकर बिताए। जब ​​यह बात फैली कि सिखों या हिंदुओं ने सुबे खान के घर में शरण ली है, तो पास की मस्जिद के इमाम ने एक सरकारी अधिकारी के बेटे से पूछा: “कई दिनों से पड़ोस में अफवाह चल रही है कि तुमने अपने घर में किसी को शरण दी है।” कौन है वो?

तो जवाब मिला कि वह मेरा भाई और उसका परिवार है।

मस्जिद के इमाम को उसकी बातों पर शक हुआ और उसने कुरान मंगवाई और अधिकारी के बेटे से कहा कि वह कुरान की कसम खाकर बताए कि उसके घर में उसका भाई और उसका परिवार रह रहा है। इस पर सरकारी अधिकारी ने कुरान की कसम खाकर बताया कि जिस व्यक्ति को उसने अपने घर में पनाह दी है, वह उसका भाई है।

बोतालिया का कहना है कि, ‘सूबे खान ने कोई झूठी कसम नहीं खाई थी। उसने मेरे दादा को अपना भाई बनाया था। दो महीने तक उसने अपने भाइयों से ज़्यादा उनकी रक्षा की थी। उसने सिखों की धार्मिक परंपराओं का भी ख्याल रखा था। इसलिए जब मैं अपने रिश्तेदारों के गाँव में अपने पूर्वजों की कब्रों पर गया, तो मैंने वहाँ अपना सिर नहीं झुकाया, बल्कि उन महान लोगों की कब्रों को प्यार और श्रद्धा से चूमकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।’

Tarunjit Singh Butalia
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