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गुरु नानक जी ने क्यों दिया सिखों को "एक ओंकार सत नाम" का मूल मंत्र, जाने इसकी उत्पत्ति और अर्थ

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 इस सम्पूर्ण जगत का स्वामी एक ही है

“एक ओंकार सत नाम, करता पुरख, निरभऊ निरबैर, अकाल मूरत” एक ओमकार सतनाम करता पुरखु का हिंदी में अर्थ है की इस सम्पूर्ण जगत का स्वामी एक ही है और वह ही ब्रह्माण्ड का निर्माता है। उसका नाम सत्य है। वह भय से रहित और किसी के प्रति बैर भाव नहीं रखता है। वह जन्म मरण के बंधन से मुक्त है और स्वंय में ही परिपूर्ण है। पवित्र गुरु ग्रन्थ साहिब में सौ से अधिक बार इस मूल मन्त्र का जिक्र किया गया है, जिसे अत्यंत ही पवित्र और दिव्य माना जाता है। एक समय था जब समाज में हर तरह का भेदभाव भरा हुआ था, धर्म और जाति के आधार पे इंसानों को बांट दिया गया था। जाति और धर्म का अंतर तो था ही, साथ ही लिंग और वर्ग की असमानता भी थी। मंदिरों में निम्न जाति के लोगों का प्रवेश मना था। पाखंड के नाम पर महिलाओं और दलितों पर अत्याचार किया जा रहा था। उस समय इस पाखंड का विरोध करने के लिए सिखों के गुरु, गुरु नानक देव जी ने अपनी आवाज को बुलंद किया था।

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गुरु नानक के जन्म ने अंधेरे में प्रकाश का किया काम

ऐसे भेद और भय युक्त माहौल में गुरु नानक के जन्म ने अंधेरे में प्रकाश का काम किया था। गुरुनानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु थें। उन्होंने समाज में फैली कमियों का कड़ा विरोध किया था। उनका मानना था कि हम सभी ‘एक पिता एकस के हम बारिक’ हैं अर्थात ईश्वर सभी का अलग-अलग नहीं है बल्कि एक ही है जिसकी हम सभी संतानें हैं।

गुरु नानक देव जी ने गुरु मुखी लिपि में दिया था ये मंत्र

इस एक ओंकार शब्द की उत्पति गुरु नानक देव जी ने गुरु मुखी लिपि में की थी। जिसके बाद से ये शब्द सिखों का मूल प्रतीक भी बन गया। उन्होंने ‘ओम’ शब्द के आगे ‘एक’ और बाद में ‘कार’ लगाकर ‘एकोंकार’ शब्द बनाया। ये ‘ओंकार’ शब्द सिखों के हर मन्त्र का पहला शब्द है। इसका अर्थ है, ईश्वर एक है और वही सृष्टि का कर्ता है। हर एक जीव-जंतु में उसी ईश्वरीय शक्ति के कण बास्ते हैं। इस जादुई शब्द से उन्होंने सभी जाति, धर्म, वर्ण, लिंग और श्रेणी के लोगों को ईश्वर के ही बंदे बताकर एक जैसा बनाने की कोशिश की थी। उनका मानना था कि न कोई पराया है, न ही कोई दुश्मन। भेदभाव तो मनुष्यों ने पैदा किया है। अगर यह कहा जाए कि गुरु नानक देव जी ने सांप्रदायिकता, निरपेक्ष, और एक समान समाज की स्थापना करने का प्रयास किया, तो गलत नहीं होगा।

ये मूलमंत्र सिक्ख विचारधारा का है केन्द्र

यह ओंकार शब्द सिख धर्म में ईश्वर की एकता का प्रतीक है, और सभी धार्मिक ग्रंथों और गुरुद्वारों जैसे स्थानों पर पाया जाता है। ये शब्द गुरु ग्रंथ साहिब में उद्घाटन वाक्यांश के रूप में मौजूद है, और गुरु नानक की पहली रचना है। ओंकार शब्द सिखों की सुबह की प्रार्थना और जपजी साहिब का भी हिस्सा है। सिखों का ये मूल मन्त्र सिखों के आवश्यक पंथ और मूल विश्वास को बताती हैं। यह गुरु नानक देव जी द्वारा रचित एक मूल प्रार्थना है। “मूल मंत्र” ईश्वर के बारे में सिख मान्यताओं को बताता है, और इसे गुरु नानक की पहली शिक्षा कहा जाता है। इसे सिक्ख विचारधारा का केन्द्रक भी माना जाता है। मूल मंत्र बहुत ही संक्षिप्त और लयबद्ध है। सिख धर्म की सबसे मौलिक मान्यता मूल मंत्र के पहले तीन शब्दों में व्यक्त की गई है। जिसका अर्थ है की इस सम्पूर्ण जगत का स्वामी एक ही है और वह ब्रह्माण्ड का निर्माता भी है।

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