WB: राजभवन में राज्यपाल के करीबियों की नियुक्ति! टीएमसी सांसद ने जारी की लिस्ट, मचा बवाल

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 07 जून 2021, 05:30 AM Updated: 07 जून 2021, 05:30 AM
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पश्चिम बंगाल की सियासत में पिछले कुछ सालों से आये दिन राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच जुबानी जंग देखने को मिल जाती हैं। कभी राज्यपाल प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर नाराजगी जताते हैं तो कभी राज्य सरकार अपने काम में कथित तौर पर अडंगा लगाने को लेकर राज्यपाल को निशाने पर लेती है। इसी बीच पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने प्रदेश के राज्यपाल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि राजभवन में राज्यपाल ने अपने करीबियों और रिश्तेदारों की नियुक्ति की है।

महुआ मोइत्रा ने जारी की लिस्ट

टीएमसी सांसद ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्विट करते हुए राज्यपाल जगदीप धनखड़ को निशाने पर लिया है। उन्होंने ट्विट करते हुए राजभवन में काम करने वाले 6 लोगों की एक लिस्ट जारी की है। जो राज्यपाल के करीबी बताए जा रहे हैं। टीएमसी सांसद द्वारा जारी की गई लिस्ट के मुताबिक राज्यपाल के ओएसडी अभ्युदय सिंह शेखावत उनके साला के बेटे हैं। 

ओएसडी को-ऑर्डिनेशन अखिल चौधरी राज्यपाल के करीबी रिश्तेदार हैं। रूची दूबे, ओएसडी एडमिनिस्ट्रेशन राज्यपाल के पूर्व एडीसी मेजर गौरंग दीक्षित की पत्नी हैं। प्रशांत दीक्षित, ओएसडी प्रोटोकॉल, राज्यपाल के पूर्व एडीसी के साले हैं। कौस्तब एस वालीकर, एसएसडी आई, राज्यपाल के एडीसी श्रीकांत जनार्दन राव, आईपीएस के साले हैं। नवनियुक्त ओएसडी किशन धनखड़ राज्यपाल के करीबी रिश्तेदार हैं।

राज्यपाल ने कानून व्यवस्था पर उठाए सवाल

बता दें, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ राज्य सरकार को लगातार निशाने पर ले  रहे हैं। बीते दिन रविवार को अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्विट करते हुए राज्यपाल ने प्रदेश की कानून व्यवस्थान पर सवाल उठाए थे। उन्होंने राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का ध्यान आकर्षित किया है और चुनाव के बाद हिंसा की घटना को मानवता के लिए शर्मशार करार दिया है। उन्होंने इस मामले में राज्य के मुख्य सचिव एचके द्विवेदी को भी तलब किया है।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के नतीजों के घोषणा के बाद राज्य में कई जगहों से हिंसा की घटना सामने आई थी। जिसे लेकर प्रदेश सरकार पर सवाल उठे थे। कई राजनीतिक पार्टियों ने उस हिंसा की निंदा की थी। तब टीएमसी ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया था कि उस समय प्रदेश की कानून व्यवस्था चुनाव आयोग के हाथों में थी।

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