Dev Uthani Ekadashi : क्यों इस दिन एक पत्थर से कराया जाता है तुलसी माता का विवाह, जानिए पूरी कथा

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 01 नवम्बर 2022, 05:30 AM Updated: 01 नवम्बर 2022, 05:30 AM
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देव उठनी एकादशी के दिन शालिग्राम पत्थर से कराया जाता है तुलसी माता का विवाह 

भारत में 04 नवंबर को देव उठनी एकादशी (Dev Uthani Ekadashi) का त्यौहार मनाया जाएगा. इस दिन से भगवान विष्णु चार महीने की नींद के बाद जागते हैं और सृष्टि का संचालन करते हैं. वहीं इस देव उठनी एकादशी के बाद ही हिंदु धर्म में सभी शुभ कार्यों का आरंभ हो जाता है. वहीं इस एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह (Tulsi and Shaligram Vivah ) भी किया जाता है जिसको लेकर एक कथा है और तभी से देव उठनी एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह की परंपरा है. 

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शालिग्राम पत्थर की कथा 

 पौराणिक कथा के मुताबिक, शालीग्राम भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का ही रूप हैं. भगवान शिव के गणेश और कार्तिकेय के अलावा एक और पुत्र थे, जिनका नाम था जलंधर था. जलंधर असुर प्रवत्ति का था और वह खुद को सभी देवताओं से ज्यादा शक्तिशाली समझता था और देवगणों को परेशान करता था. वहीं जलंधर का विवाह भगवान विष्णु की परम भक्त वृंदा से हुआ. जलंधर का बार-बार देवताओं को परेशान करने की वजह से त्रिदेवों ने उसके वध की योजना बनाई. लेकिन वृंदा के भक्ति की वजह उन्हें त्रिदेव उन्हें नहीं मार पाए.

विष्णु भगवान को मिला पत्थर बनने का श्राप

जलंधर को मारने में विफल रहने के बाद सभी देव भगवान विष्णु का पास आये और  इस समस्या का समाधान करने की बात कही जिसके बाद भगवन विष्णु ने  वृंदा के भक्ति को भंग करने की योजना बनाई. ऐसा करने के लिए विष्णु जी ने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा का भक्ति  को भंग कर दिया. इसके बाद त्रिदेव ने जलंधर को मार दिया. वहीं वृंदा इस छल के बारे में जानकर बेहद दुखी हुई और उसने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया. सभी देवताओं ने वृंदा से श्राप वापस लेने की विनती की, जिसे वृंदा ने माना और अपना श्राप वापस ले लिया. प्रायश्चित के लिए भगवान विष्णु ने खुद का एक पत्थर रूप प्रकट किया. इसी पत्थर को शालिग्राम का नाम दिया गया. 

शालिग्राम से हुआ तुलसी का विवाह 

जब वृंदा अपने पति जलंधर के साथ सती हुई और उसकी राख से तुलसी का पौधा निकला. इतना ही नहीं भगवान विष्णु ने अपना प्रायच्क्षित जारी रखते हुए तुलसी को सबसे ऊंचा स्थान दिया और कहा कि, मैं तुलसी के बिना भोजन नहीं करूंगा. इसके बाद सभी देवताओं ने वृंदा के सती होने का मान रखा और उसका विवाह शालिग्राम से कराया. जिस दिन तुलसी विवाह हुआ उस दिन देवउठनी एकादशी (Devuthani Ekadashi) थी. इसीलिए हर साल देवउठनी के दिन ही तुलसी विवाह किया जाने लगा. देव उठनी एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह किया जाता है इस दिन तुलसी दुल्हन और शालिग्राम दुल्हा बनते हैं और दोनों की शादी मनुष्यों की शादी की तरह ही धूमधाम से की जाती है.

इस दिन मनाई जायेगी देवउठनी एकादशी

इस दिन मनाई जायेगी देवउठनी एकादशी

पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानि 03 नवंबर, गुरुवार की शाम 07:30 से शुरू होगी, जो 04 नवंबर, शुक्रवार की शाम 06:08 तक रहेगी। चूंकि एकादशी तिथि का सूर्योदय 4 नवंबर को होगा, इसलिए इसी तिथि पर ये व्रत किया जाएगा। वहीँ कहा जाता है कि इन योगों में की गई पूजा का शुभ फल बहुत ही जल्दी प्राप्त होता है.

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