Kalgi Tora: 1704 का समय था.. पंजाब के चमकौर में गुरु साहिब अपने 40 सिखों के साथ मुगलो के खिलाफ युद्ध के मैदान में थे, मुगलो को डटकर सामना करने के लिए सिख लड़ाको ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी, जिसमें गुरु साहिब के दो साहिबजादे भी शहीद हो गए थे, लेकिन तब जरूरी ये था कि मुगलो के खिलाफ युद्ध के जारी रखने और धर्म की रक्षा के लिए गुरु साहिब का सुरक्षित रहना जरूरी थी। इसलिए पहली बार गुरु साहिब ने अपनी वेशभूशा को बदला और अपने बदले भाई संगत सिंह, जो कि गुरू साहिब की ही कद काठी के थे।
उन्हें अपने पोशाक पहनायें और साथ ही उनके सिर पर सजी पगड़ी की कलगी औऱ तोरा को उन्होंने अपने हाथों से भाई संगत सिंह की पगड़ी पर सजाया था..जो गुरु साहिब की सबसे बड़ी पहचान थी। ये कलगी ही निशानी थी वो वो अजेय है, वो ईश्वर को छोड़ कर किसी के गुलाम नहीं है। किसी की भी गुलामी को वो स्वीकार नहीं करेंगे.. इस कलगी ने मुगलो के इरादों को भी बदल दिया था। जानते है कलगी और तोरा की कहानी।
पगड़ी का महत्व क्या होता है?
जब 1699 में दसवे पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा की स्थापना की थी तब उन्होंने अपने सभी प्यारे बंदो को सच्चा सिख होने के कई नियम बतायें थे, जिसमें सबसे पहला नियम है सच्चे का पंच ककार धारण करना। इसी के साथ उन्होनें हर सिख के लिए पगड़ी पहनने के महत्व के भी दर्शाया। पहले गुरु नानक देव जी से लेकर दसवे गुरु तक सभी ने पगड़ी धारण की थी, लेकिन एक सिख के लिए पगड़ी का महत्व क्या होता है उसे बताने वाले थे दसवे गुरु। पांच ककार के साथ सिर पर पगड़ी, जो न केवल सिख धर्म की आन बान शान थी, बल्कि गुरु साहिब की पगड़ी पर लगाये जाने वाले कलगी और तोरा का भी विशेष महत्व माना जाता है। कलगी जो कि एक राजसी पंखयुक्त आभूषण होता है, जो सदैव अजेय रहने का, और किसी की गुलामी का स्वीकार नहीं करने का प्रतीक था, गुरु गोबिंद सिंह जी भी अपने दस्तार यानि का पगड़ी में हीरा जड़ित कलगी धारण करते थे। जिनके कारण गुरु साहिब कलगीधर भी कहलाये।
भाई संगत सिंह का बलिदान
वहीं तोरा एक ऐसा गोटा या अन्य चमकीले कपड़ो से बना होता है जो कि पगड़ी या फिर कलगी के साथ बांधा जाता है, जिससे पगड़ी की सुंदरता और शान और बढ़ जाती है। गुरु साहिब की कलगी और तोरा को सिख उनके ढृढ़ निश्चयी स्वाभाव, निडरता, उनके व्यक्तित्व, उनके राजसी शान, और महान बलिदान से जोड़ कर देखते है। गुरु साहिब की रक्षा के लिए भाई संगत सिंह का बलिदान, हमेशा के लिए उन्हें अमर कर गया। गुरु साहिब का केवल सिर पर हाथ पड़ जाये तो जीवन सफल हो जायें, ऐसे में उनके सिर पर धारण किये जाने वाली कलगी को सिर पर धारण करने मात्र से ही गुरु साहिब की आभा औऱ उनकी कृपा को महसूस किया जा सकता है। गुरु साहिब के विश्वास को दिखाया गया.. ये गुरु साहिब का विश्वास था कि भाई संगत सिंह जी ही उनकी जगह ले सकते है। हालांकि भाई संगत सिंह शहीद हो गए, लेकिन जिस मकसद से उन्होंने गुरु साहिब का रूप लिया था, वो पूरा हो गया था।
कलगी लाहौर किले के तोशाखाना के दस्तावेजों में रखा गया
गुरु साहिब के कलगी के बारे में बात करें तो वो चमकौर के युद्ध के बाद वो मुगलो के हाथ लग गई जिसे लाहौर किले रखा गया था, लेकिन जब शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी ने लाहौर पर कब्जा किया तो वो उनके पास आ गई और कलगी लाहौर किले के तोशाखाना के दस्तावेजों में रखा गया, महाराजा के समय में इस कलगी को ‘कलगी-ए-कुछ’ कहां जाता था। हालांकि उनकी मृत्यु के बाद गुरु साहिब की कलगी को अंग्रेजी हुकुमत के अधिकारी लॉर्ड डलहौजी धोखे से पहले कोलकाता और फिर ब्रिटेन ले गया।
लेकिन करीब 160 सालों के बाद जून 2009 में भारत सरकार की तमाम कोशिशो के बाद लंदन से अमृतसर लाया गया, जहां अमृतसर में श्री अकाल तख्त साहिब में स्थापित किया गया, जहां आज भी ये सिख गुरु के प्रत्यक्ष होने का बोध कराता है। जो गुरु साहिब के बलिदान औऱ साहस की कहानी कहती है। जो उस विजय की कहानी है जो उन्होने मुगलो के खिलाफ पाई थी। गुरु साहिब की पगड़ी में लगी कलगी प्रतीक है कि चाहे कुछ भी हो जाये लेकिन गुरु साहिब कभी भी अधर्म के आगे नहीं झुके.. औऱ यहीं संदेश उन्होंने अपने सभी अनुयायियो को भी दिया कि चाहे सिर कटाना पड़े तो कटा दों लेकिन अधर्म और अधर्मी के आगे कभी मत झुकों।
































