Sikh Warriors story: सिख योद्धा और आदमखोर बाघिन,जब मौत के जबड़े से छीन लाए जिंदगी

Shikha Mishra | Nedrick News Punjab Published: 07 मार्च 2026, 12:49 PM Updated: 07 मार्च 2026, 12:49 PM
Google News
Follow Us on Google News
Prefer Nedrick News
on Google

Sikh Warriors story : वो हर हाल में जीवन जीने का हुनर रखते है, हालत चाहे जो भी हो, वो सर्वाइव करना जानते है, या तो अपनी जान दे देंगे या फिर दुश्मनों की जान हलक से निकाल कर ही दम लेंगे ।जी हां, हम बात कर रहे है वीर सिख जवानों की।जिनकी हिम्मत के आगे तो ब्रिटिश सेना हो या अफगानी सेना, पानी मांगती थी। गुरु गोबिंद सिंह जी ने एक कहावत कहीं थी

सवा लाख से एक लड़ाऊं,.

चिड़ियां ते मैं बाज़ तुड़ाऊं,

तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं

खालसा पंथ की स्थापना के समय दशम गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखो को बहादुरी और साहस की मिसाल माना था। उन्होंने हर एक सिख योद्धा को सवा लाख के बराबर कहा है, और हमारे बहादुर सिखो ने समय समय पर अपनी बहादुरी साबित करके गुरु साहिब की बोली गई एक एक शब्द को सही साबित किया है। सिखो की एक ऐसी ही बहादुरी की, अदम्य साहस की कहानी मौजूद है आगरा के पास के जंगलों में, जहां न केवल एक सिख शेर से लड़ गया था, इतना ही भी इस क्षेत्र को शेरों से मुक्त करने के लिए सिख जवानो की एक टुकड़ी ने ऐड़ी से चोटी का जोर लगा कर बाघ के झुंड को धर दबोचा था। अपने इस वीडियो में आज हम सिखो के साहस और बहुदुरी की कहानी को जानेंगे, जिसके कारण आज भी आगरा का शिवपुरी का जंगल मशहूर है।

लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह

ये कहानी शुरु होती है साल 1954 में, भारत आजाद हो चुका था और अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए सेना कई तरह से प्रयोग कर रही थी, इसी दौरान 17 सिख बटालियन को आगरा के शिवपुरी के पास जंगलो में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया था, जिनका नेतृत्व कर रहे थे लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह। लेफ्टिनेंट की बहादुरी के किस्से जम्मू-कश्मीर में 1947-48 की लड़ाई में उनके साहसिक युद्ध कला के जरिये पहले ही मशहूर थे, ऐसे में सिखो को कठोर ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी उनकी थी।

सिख सिपाहियो के लिए खाने का बंदोबस्त

सिख सैनिक ट्रेनिंग के साथ साथ अपने लिए खाना बना तक का काम भी खुद करते थे। सिख सिपाहियो के लिए खाने का बंदोबस्त करने की जिम्मेदारी थी सिपाही फौजा सिंह पर, चुंकि वो जंगली इलाके में रहते थे, वो जंगलों से लकड़ियां लाते और खाना बनाते थे, इसी दौरान एक बार वो जंगल में लकड़िया लाने गए थे, लेकिन तभी अचानक झाड़ियों में से एक बाघिन उन पर झपटी। फौजा सिंह निहत्थे थे, अचानक हुए हमले के कारण कुल्हाड़ी उनके हाथ से छूट गई थी।

लेकिन फौजा सिंह ने बाघिन के आगे हार मानने के बजाय निहत्थे ही बाघिन से लड़ पड़े.. अंत में बुरी तरह से घायल होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और बाघिन उनकी पगड़ी खींच कर ले गई। फौजा सिंह घायल हालात में अपनी छावनी पहुंचे थे औऱ बाघिन के बारे में जानकारी दी थी, बुरी तरह से घायल फौजा सिंह को अपने जख्मों से ज्यादा अपनी पगड़ी जाने का दुख था। लेकिन ये कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि शुरु हुई आदमखोर बाघिन को शिकंजे में कसने की कहानी।

कैसे आदमखोर बाघिन और उसके 4 बच्चों को दबोचा

एक बाघिन के डर से ट्रेनिंग रुक जाये, ये न तो इंडियन आर्मी का रूल है और न ही सिखों की शान का.. ट्रेनिंग जारी रही लेकिन, उस दौरान बाघिन और उसके साथ 4 बच्चों के होने की खबरें आने लगी, यहां तक कि ये भी पता चला कि 2 लोगो पर हमला करके उन्हें मार दिया गया है, इधर सिखों की टेस्ट एक्सरसाइड चलती रही, जो बिना रुकावट के पूरी हुई, लेकिन आखिरी दिन लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह ने अपने ब्रिगेड कमांडर, ब्रिगेडियर डैनी मिसरा के सामने आदमखोर बाघिन से निपटने की पेशकश रखी।

चुंकि उस वक्त भारत में शिकार गैरकानूनी नहीं था, ब्रिगेडियर को भी शिकार का शौक था, लेकिन उन्होंने कहा कि उनके जवानो को शेरनी को संगीनो से मारना होगी… कर्नल ने कहा कि हमारे जवान कभी किसी काम से पीछे नहीं हटते, औऱ जो वो चाहते है ऐसा ही होगा। कर्नल वापिस छावनी आये और सिख फौजियो का हौसला बढ़ाने के लिए हरि सिंह नलवा के शेर से लड़ने की कहावी भी सुनाई। तय हुआ कि सिख सैनिक पैदल मार्च करके हमला करेंगे।

संगीनो से बाघिन को मारा

सिख सैनिको ने इस पर बशर्ते ट्रेनिंग प्रेक्टिश की थी, और तय दिन में 17 सिख की दो कंपनियों ने 200 गज लंबी एक हमला लाइन बनाई, जिसके बीच में कमांडिंग ऑफिसर की पार्टी थी। एनफील्ड .303 राइफलों पर संगीनें लगाई गईं, और बाघिन के पलटवार की तैयारी पूरी की गई। सिख सैनिक जो बोले सो निहाल कह कर आगे बढ़ रहे थे। इस बात पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल था कि संगीनो से बाघिन को मारा जा सकता है, लेकिन करीब 20 मिनट बाद ही बाघिन की गुफा मिल गई, बाघिन नहीं थी लेकिन उसके 3 बच्चे थे, उन्हें जिवित पगड़ा गया और आगरा चिड़ियाघर को दे दिया गया, वहीं पर फौजा सिंह की पगड़ी भी थी, यानि की जिस बाघिन ने हमला किया था वो यहीं थी।

सिख सैनिक अंदर की ओर मुड़े

सिख सैनिक बाघिन को खोजने के लिए आगे बढ़ रहे थे और मात्र 10 मिनच बाद ही बाघिन दहाड़ते हुए सिख जवानों पर झपटी… पहले से तैयार सिख सैनिकों में से एक सुच्चा सिंह ने अपा बचाव करते हुए संगीन को बाघिन के सीने में घोंप दिया। जो कि बाघिन के सीने के अंदर, पूरी तरह घुस गई, सुच्चा सिंह भी गिर पड़े थे, लेकिन बाघिन खुद 10 गज आगे गिरी थी। जिसके बाद सिख सैनिक अंदर की ओर मुड़े और बाघिन पर झपट पड़े, और उसे अपनी संगीनों से दबा दिया था।

सुच्चा सिंह घायल हो गया था लेकिन फिर भी जब कर्नल शमशेर ने सुच्चा सिंह का हाल पूछा तो उन्होंने की वो अच्छे है, लेकिन बाघिन उनकी राइफल छीन कर ले गई। एक सिपाही के लिए उसका हथियार चला जाना बहुत बड़ी बात थी, लेकिन सुच्चा सिंह को बताया गया कि राइफल मिल गई है। सुच्चा सिंह आर्मी अस्पताल में भर्ती हुए थे , उन्होंने अकेले ही बाघिन को मार गिराया था, जिसके कारण उन्हें तुरंत लांस नायक के पद पर प्रमोट कर दिया गया और 17 सिख बटालियन का नाम बदलकर टाइगर बटालियन कर दिया गया।

सुच्चा सिंह की संगीन को, बाघिन की खाल और घटना की न्यूज़ पेपर कवरेज के साथ, 17 सिख — द टाइगर बटालियन के ऑफिसर्स मेस में लगाया गया है, जो सिख बटालियन की बहादुरी और साहस की कहानी का प्रतीक है, ताकि दूसरे जवानों का मनोबल बढ़े। सिख जवानों की बहादुरी की मिसाल आज भी दी जाती है, ये हमेशा से एक बहादुर और निडर सेना के रूप में ही प्रचलित रही।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds