Punjab Partition 1947: 15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटेन की गुलामी से आजादी मिली थी, उम्मीद थी कि जब ब्रिटेन भारत से निकलेगा तो भारत में भाईचारा और शांति फिर से स्थापित होगी.. लेकिन जाते जाते अंग्रेजो ने अपनी नहीं निति अपनाई जिसका सहारा लेकर वो भारत पर व्यापार के बहाने राज करने लगे थे। फूट डालो और राज करों। अंग्रेजो ने मुस्लिम के साथ मिलकर धर्म के आधार पर देश के दो टुकड़े करवा दिये.. तय किया गया कि भारत का वो हिस्सा जहां मुसलमान ज्यादा है वो हिस्सा पाकिस्तान बना दिया जाये। पंजाब और बंगाल के दो टुकड़े हुए औऱ पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम पाकिस्तान बना दिया गया। लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर जब अंग्रेजो ने पंजाब का बंटवारा किया तब 29 जिलो में से करीब 16 महत्वपूर्ण जिलो को पाकिस्तान को दे दिया गया था.. पानी, जंगल, सरकारे, फौजे सब बांट दिये गये थे फिर क्यों.. पंजाब का बंटवारा एक त्रासदी हो गया। जानेंगे कि कैसे किया गया था पंजाब का बंटवारा भारत औऱ पाकिस्तान के बीच।
पंजाब के कई जिलों में मुसलमान अधिकारियों की तैनाती
धर्म के आधार पर बंटवारा करने की आग 1946 में ही उठ चुकी थी, करीब जानबूझ कर पंजाब के कई जिलों में मुसलमान अधिकारियों की तैनाती की जा रही थी। पंजाब अंदर अंदर ही सम्प्रादायिक दंगो की आग में जलने लगा था, एक संगठित हिंसा की जा रही था, और वो इलाके जहां सिखों औऱ हिंदुओ की आबादी अनुपात में कम थे, उन्हें विस्थापित करने के लिए या तो उनका कत्लेआम किया गया या उन्हें वहां से भगाया गया। वहीं पंजाब को बांटने के लिए ये भी जद्दोजहद शुरु हो चुकी थी कि आखिर पंजाब को बांटा कैसे जायें। ताकि न तो मुसलमानो को घाटा हो और न ही सिखों औऱ हिंदुओ को। पंजाब को बांटने की जिम्मेदारी एक ऐसे शख्स को दी गई जिसे केवल नक्शों पर भारत की भौगोलिक स्थिति पता थी.. जमीनी स्तर पर नहीं.. ये सख्श था सिरिल रेडक्लिफ।
पंजाब के तीन प्रमुख समुदाय
रेडक्लिफ को मात्र 35 से 40 दिन दिये गये थे उस हिस्से को चुनने के लिए जिसे पाकिस्तान और भारत का बंटवारा सुनिश्चित हो सकें। 9 जुलाई को पहली बार रेडक्लिफ भारत आया था, 31 जुलाई को उसने पंजाब के तीन प्रमुख समुदाय हिंदू, मुसलमान और सिख समुदाय के प्रमुख नेताओं से खुद इस मुद्दे पर चर्चा की थी, लेकिन कोई भी ये तय नहीं कर पाया कि बंटवारा कैसे हो। नतीजा ये हुआ कि रेडक्लिफ ने ये जिम्मेदारी अपने कंधो पर ले ली। 1941 में हुई जनगणना से पहले ही साफ हो गया था कि पंजाब में करीब उस वक्त 57 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की थी.. जो कि वहां बहुसंख्यक थे, और हिंदू 30 प्रतिशत और सबसे कम सिख मात्र 12 प्रतिशत ही थे। वहीं 1909 में अंग्रेजी हुकुमत ने हिंदूओं और मुसलमानों के बीच फूट डालने के लिए अलग निर्वाचन मंडल को मंजूरी दे दी थी… कहने के लिए तो अल्पसंख्यकों को मजबूती देना था, लेकिन ये पंजाब में कुछ और ही कहानी लिखने वाला था।
मुसलमान वहां बहुसंख्यक थे। वहीं मुसलमान शहरी इलाको के बजाये ग्रामीण इलाकों में ज्यादा बसते थे, हिंदू और सिख मुसलमानों के अपेक्षा लाहौर और अमृतसर, दोनो ही स्थानों के साथ साथ पंजाब के शहरी इलाकों में ज्यादा मजबूत और संपन्न थे। जिससे आर्थिक भेदभाव उपजा। वहीं मुसलमान जो गांवों में रहते थे किसानी करते थे वो हिंदुओ औऱ सिखों के कर्ज तले दबते गए थे। मुसलमान समझने लगे कि उन्हें जानबूझ कर आर्थिक तौर पर कमजोर किया गया, संख्या में ज्यादा होते हुए भी वो झुकने के लिए मजबूर किये जाते थे, जिसका नतीजा ये हुआ कि मुसलमानों की नफरत बढ़ने लगा। धीरे धीरे मैत्री से रहने वाला पंजाब बंटने लगा था। राजनीतिक तौर पर मुसलमान मजबूत हो.. ऐसा सिख नहीं चाहते थे, क्योंकि इससे उनकी संपन्नता पर ही हमला किया जाता।
पंजाब सिख धर्म की अहम निशानिया
इसी उछल पुथल के बीच कैबिनेट मिशन भारत ब्रिटेन से आया जिनको ये तय करना था कि वो भारत को आजादी स्थांनांतरित करते समय इस बात का ध्यान रखे कि सब कुछ संवैधानिक तरीके से हो और स्वतंत्रता और एकता का संदेश देता हो। कैबिनेट मिशन भारत ने भारत को तीन संघीय ढांचे में बांट कर हिंदू बहुल प्रांत, फिर मुसलान बहुल प्रांतो, और फिर पूर्वी मुसलमान बहुल क्षेत्र। संघीय ढांचे में पंजाब को मुसलमान बहुल इलाकों में शामिल करके सिखों की चिंता बढ़ा दी गई थी। चुंकि पंजाब सिख धर्म की अहम निशानियों और सिख धर्म की उत्पत्ति का प्रतीक है ऐसे में सिख किसी भी हाल में पंजाब को बंटते हुए नहीं देखना चाहते थ… लेकिन जब संविधान सभा के चुनावों का बहिष्कार कर रहे जिन्ना को करारी शिकस्त मिली तो धार्मिक तनाव और बढ़ गये। आखिरी वायसराय लार्ड माउंटबेटन को ये भापने में जरा भी देर नहीं लगी कि अगर जल्द से जल्द बंटवारा नहीं हुआ तो बड़े दंगे फसाद होंगे.. और उन्होंने 3 जून 1947 को माउंटबेटन प्लान पेश कर दिया। इस प्लान के तहत पंजाब औऱ बंगाल को बहुसंख्यको के आधार पर बांटने का फैसला किया गया।
पंजाब पार्टीशन कमिशन
यहां सिखों के हितो को नजरअंदाज किया गया.. अकाली दल ने मांग की थी कि वो इस तरह से सीमा तय करें जिससे कम से कम 85 प्रतिशत सिख आबादी भारत में रहे.. लेकिन अंग्रेजो को इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ा और रेडक्लिफ की एंट्री हुई। पंजाब पार्टीशन कमिशन बना कर ये तय किया गया कि कैसे होगा पंजाब का बंटवारा। सिख नेताओ ने बार बार मांग की कि बंटवारे में उनकी धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रख कर बांटा जाये लेकिन ऐसा लगता था कि जैसे अंग्रेज जिन्ना को लेकर पक्षपाती थे..उस दौरान केवल जमीने ही नहीं बटीं बल्कि पानी, जंगल, राजस्व और धार्मिक स्थलों को भी बांटा गया। उस वक्त पार्टिशन कमेटी ने तय किया कि सीमा सतलुज और रावी नदियों की सीमा के अनुसाप खींची जाये, जिससे मुस्लिम बहुल इलाके पाकिस्तान का हिस्सा बन जायें। लेकिन यहां मामला नानकाना साहिब पर आकर अटक गया।
ये जिला सिखो के सबसे अहम था, और वो उसे पाकिस्ताना का हिस्सा नहीं बनने देना चाहते थे। तय हुआ कि 14 अगस्त तक बंटवारा पूरा होना चाहिए.. जिसकी जिम्मेदारी रेडक्लिफ को दी गई.. और उन्होंने पूर्वी पंजाब और पश्चिमी पंजाब के बीच लकीर खींच दी थी। जिसमें भारत को कश्मीर से जोड़े रखने के लिए गुरदासपुर और फिरोजपुर को भारत को दिया गया। 9 अगस्त को ही उसने नक्शा तैयार कर लिया था और 17 अगस्त को इसे सार्जनिक किया था। रेडक्लिफ ने पाकिस्तान पर दया दिखाते हुए लाहौर को न चाहते हुए भी पाकिस्तान को दे दिया था, जिसे उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि वो भारत का हिस्सा होना चाहिए था। उज नदी से शुरू हुई रेडक्लिफ की रेखा पाकिस्तान के बहावलपुल राज्य तक पहुचाई गई थी,, रेडक्लिफ ने लाइन तो खींच दी थी लेकिन तब उन्हें ये नहीं पता था कि पंजाब की जनता किस आग में झुलसने वाली थी।
इस लकीर ने लाखों हिंदुओं और सिखों की जिंदगी में उथलपुथल मचा दी, उन्हें अपने घर जमीने सबकुछ छोड़ कर विस्थापन करना पड़ा.. कहते है कि इस हिंसा में 10 लाख लोगो की हत्यायें की गई। करीब 1.4 करोड़ से लेकर 1.8 करोड़ लोगो का विस्थापन हुआ था। जिसमें करीब 80 लाख हिंदू और सिखों ने पाकिस्तान से भारत की तरफ विस्थापन किया गया और इतने ही लोग पाकिस्तान गए थे। ये एक ऐसी त्रासदी थी जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। जिस तरह से ये बंटवारा हुआ किसी ने नहीं सोचा था कि इतना बड़ा पलायन होगा.. लेकिन आनन फानन में हुआ ये बंटवारा बड़ी त्रासदी और नरसंहार लेकर आया.. जिसे बाद में रेडक्लिफ ने भी माना कि उनसे बंटवारे को लेकर गलती हुई .. उनके पास समय कम था.. जबकि उसके लिए कम से कम 3 साल मिलने चाहिए थे। अंग्रेज चले गए थे लेकिन वो भारत के सीने पर कभी न भरने नाला जख्म कुरेद कर चले थे।




























