Lansdowne Property for Sale: बाढ़ के बाद भी नहीं थमे बिल्डर, लैंसडाउन में अब भी बेच रहे ‘ड्रीम होम’

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 10 सितम्बर 2025, 05:30 AM Updated: 10 सितम्बर 2025, 05:30 AM
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Lansdowne Property for Sale: पिछले दिनों उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ ने जैसे पहाड़ों को हिला कर रख दिया हो। नदियां उफान पर थीं, रास्ते टूट गए, और कई घर पानी में डूब गए। एक तरफ पूरी घाटी त्रस्त थी, दूसरी तरफ ऐसा लग रहा था जैसे कोई सुन नहीं रहा। क्योंकि, इस आपदा के बाद भी ब्रोकर बिना रुके, नए-नए “ड्रीम प्रोजेक्ट्स” लेकर आ गए। वो भी ठीक ऐसे इलाकों में जहां बार-बार भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बना रहता है। खासकर लैंसडाउन जैसे खूबसूरत लेकिन जोखिम भरे इलाके में। यहां हाल की बाढ़ के बावजूद नए प्रोजेक्ट्स की भरमार है।

और पढ़ें: Ahmedabad Land Sinking: गुजरात में धीरे-धीरे धंस रही है ज़मीन: अहमदाबाद-सूरत में सबसे ज्यादा खतरा

अजीब बात ये है कि इस खतरनाक कहानी के बीच ब्रोकरों के झांसे में आकर लोग अपने सपनों के घर के चक्कर में अपनी सुरक्षा तक दांव पर लगा रहे हैं। तो सवाल ये उठता है, आखिर क्यों लोग फिर भी पहाड़ों की इन खतरनाक जगहों में अपना पैसा लगा रहे हैं? चलिए, इस कहानी के पीछे की हकीकत जानते हैं।

लैंसडाउन: जहां नेचर की गोद में, ब्रोकरों का ‘खतरनाक सपना’ पल रहा है- Lansdowne Property for Sale

पहले बात करते हैं लैंसडाउन की। ये जगह गढ़वाल हिल्स में बसी है, जहां ब्रिटिश काल से ही पर्यटन का केंद्र रही है। लेकिन प्रकृति की मार यहां बार-बार पड़ती है। यह इलाका हर साल बारिश, भूस्खलन और बाढ़ से प्रभावित होता है।

  • वर्ष 2021: द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, लैंसडाउन में एक निर्माणाधीन (under-construction) होटल स्थल पर अचानक भूस्खलन (landslide) हुआ, जिसमें तीन लोगों – दो महिलाओं और एक बच्चे की मौत हो गई।
  • 2023 में, तेज बारिश से लैंसडाउन के पास भू-धंसाव हुआ और सड़कें घंटों बंद रहीं। कोटद्वार से हल्द्वानी तक बाढ़ जैसे हालात बन गए।
  • 2024 में, चिनबौ संपर्क मार्ग और कठवाणा-खंसूली रोड पर मलबा गिरा, जिससे पूरा ट्रैफिक ठप हो गया।
  • 2025 की अगस्त, फिर एक बार वही कहानी दोहराई गई। फ्लैश फ्लड्स में हाथियों का झुंड खोह नदी पार कर रहा था कि एक बच्चा बह गया। ये घटना वायरल हुई और लोगों का दिल दहल गया।

अब सोचिए, जब हाथियों का ये हाल है, तो इंसानों के घर, मकान, सड़कें और प्लॉट किस हाल में होंगे?

इतना सब होने के बाद भी क्यों नहीं रुक रहा है निर्माण?

अब आप पूछेंगे कि जब खतरे इतने साफ हैं, तो लोग यहां घर क्यों बना रहे हैं? इसका जवाब है – ब्रोकरों का ‘नेचर वाला सपना’ और लोगों की आंखों पर बंधी उम्मीदों की पट्टी।

ब्रोकर बताते हैं:

“यहां व्यू मिलेगा, ट्रैफिक नहीं, नेचर के बीच जियो, प्रॉपर्टी की वैल्यू बढ़ रही है।”

लेकिन वो नहीं बताते:

“यह जगह लैंडस्लाइड जोन में है, RERA अप्रूवल नहीं है, बारिश में सड़कें बह जाती हैं, और इमरजेंसी में हॉस्पिटल तक पहुंचना मुश्किल है।”

चलिए अब एक विडिओ दिखते हैं आपको। ये विडिओ लैंसडाउन का बताया जा रहा है हालांकि नेडरिक न्यूज इसकी पुष्टि नहीं करता है।

https://youtube.com/shorts/DksGNY54p-o?si=WNnV9eitUuJLJxLx 

विडिओ में अप देख साकते हैं लैंसडाउन में निर्माण चल रहा था। अचानक पहाड़ी पर भूस्खलन हो गया, और मजदूर जान बचाकर भागे। ये दृश्य बताता है कि ओवर कंस्ट्रक्शन कितना खतरनाक है, लेकिन अफसोस  ब्रोकर इसे “छोटी सी घटना” बताकर टाल देते हैं।

उत्तराखंड में लगातार बढ़ रहा लैंडस्लाइड और फ्लड का खतरा

आपकी जानकारी के लिए बता दें, 2023 में उत्तराखंड में कुल 1,100 लैंडस्लाइड दर्ज किए गए। लेकिन ये सिर्फ शुरुआत थी। अगले ही साल, यानी 2024 में, ये संख्या बढ़कर 1,813 हो गई यानी लगभग दोगुनी। ये आंकड़े किसी अलार्म बेल से कम नहीं हैं, लेकिन हैरानी की बात ये है कि इसके बावजूद भी पहाड़ी इलाकों में धड़ल्ले से प्रॉपर्टी डील हो रही है।

2013 की केदारनाथ त्रासदी, जिसमें हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, या फिर 2021 में चमोली ग्लेशियर के फटने से आई भीषण बाढ़ ये सब घटनाएं शायद हमारी सामूहिक याददाश्त से मिटती जा रही हैं। वरना कोई क्यों उस ज़मीन पर ‘ड्रीम होम’ बनाए, जो हर साल किसी न किसी आपदा की चपेट में आ जाती है?

लेकिन ब्रोकरों और प्रॉपर्टी डेवलपर्स को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके पास तैयार पैकेज है, हरी-भरी वादियाँ, नज़रों को सुकून देने वाले व्यू और नेचर के बीच एक शांत, परियों जैसे घर का सपना। और लोग, उस सपने के पीछे भाग रहे हैं, बिना ये समझे कि जो हरियाली उन्हें आकर्षित कर रही है, वो दरअसल खतरे का इलाका है।

पहाड़ों में घर लेने के नुकसान

  1. कंस्ट्रक्शन खर्च: समतल ज़मीन से 5x ज्यादा। स्ट्रक्चर को मजबूत बनाना पड़ता है।
  2. मेंटेनेंस का झंझट: बारिश में लीकेज, सर्दियों में बर्फबारी, हर मौसम में खतरा।
  3. सिक्योरिटी: अकेला मकान, जानवरों और चोरी दोनों का डर।
  4. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: नज़दीकी हॉस्पिटल, स्कूल या मॉल बहुत दूर होते हैं।
  5. प्राकृतिक खतरे: लैंडस्लाइड, बाढ़, मडस्लाइड – सब किसी भी मौसम में मुसीबत बन सकते हैं।

इन्वेस्टमेंट? सोचिए दो बार

हालांकि, कई लोग इन मकानों को इन्वेस्टमेंट के तौर पर देखते हैं। सोचते हैं कि रेंटल इनकम होगी या प्रॉपर्टी की वैल्यू बढ़ेगी।
सच ये है कि पहाड़ों में इन्वेस्टमेंट पर रिटर्न इतना स्थिर नहीं होता।

  • भीमताल जैसे इलाकों में कीमत 4,000 से 6,000 रुपये प्रति वर्ग फुट है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में इसे दोबारा बेचना मुश्किल है क्योंकि खरीदार अब रिस्क देख रहे हैं।
  • Insurance महंगा हो गया है।

अगर फिर भी लेने का मन बना रहे हैं, तो ये बातें ज़रूर ध्यान में रखें:

  1. RERA अप्रूवल देखें।
  2. मानसून के समय साइट विजिट करें, असली हाल तभी दिखेगा।
  3. Civil Engineer से स्लोप, ड्रेनेज और फाउंडेशन की जांच कराएं।
  4. अकेले मकानों से बेहतर गेटेड सोसाइटी चुनें।
  5. पानी और बिजली जैसी बेसिक सुविधाओं की स्थिति समझें।
  6. हर 3 महीने में विजिट करें, वरना घर बर्बाद हो सकता है।
  7. बिक्री की शर्तें पढ़ें “As-Is” जैसी टर्म से सावधान रहें।
  8. डॉक्टर, मेडिकल और लोकल बाजार की दूरी जानें क्योंकि आपात स्थितियों में यही काम आएंगे।

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