जानिए हिन्दू, मुस्लिम और सिख में क्यों पूजनीय हैं गोगाजी महाराज ? वर्तमान में भी बने हुए हैं एकता के प्रतीक

[nedrick_meta]

हिन्दू, मुस्लिम और सिख में हैं ये पूजनीय 

भारत जैसे देश में आज-कल बहुत कम एकता का प्रतीक बचा हुआ, जो हिन्दू, मुस्लिम, सिख को एक साथ बांधता हो। जो राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और भी कई राज्यों को एक साथ बांध कर रखता हो । हाँ, लेकिन भारतीय इतिहास में ऐसे भी लोग हैं जो इन सभी जातियों और राज्यों को एक साथ पिरो कर रखते थे और आज के दिन तक या फिर कह ले वर्तमान में भी,  हिन्दू, मुस्लिम और सिख में ये पूजनीय हैं तथा प्रेरणाश्रोत हैं। आज हम बात करेंगे गोगा जी महाराज के बारे में और उनके इतिहास के कुछ दिलचस्प किस्सों के बारे में।

Also read- आर्यों और द्रविड़ो की लड़ाई में आदिवासियों ने मारी बाजी, भारत में सबसे पहले उनके पड़े थे कदम

चौहान वंश में जन्मे थे गोगाजी वीर

गोगाजी को लोग कई सारे नामों से जानते है जैसे की गोगाजी, गुग्गा वीर, जाहिर वीर,राजा मण्डलिक व जाहर पीर। गोगाजी का जन्म हिंदी कैलेंडर विक्रम संवत के अनुसार 1003 में चुरू जिले के ददरेवा गाँव में हुआ था। इनकी पूजा हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्म के लोग करते हैं। चौहान वंश में जन्मे गोगाजी वीर के राज्य का विस्तार हांसी, हरियाणा तक था। 

जानिए हिन्दू, मुस्लिम और सिख में क्यों पूजनीय हैं गोगाजी महाराज ? वर्तमान में भी बने हुए हैं एकता के प्रतीक — Nedrick News

गुरु गोरखनाथ के थे शिष्य 

हिन्दू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदाय बड़ी श्रद्धा भक्ति से इस जाहर वीर की  पूजा करते हैं। गौरक्षा और सर्वधर्म सम्मान के लिए ख्याति प्राप्त जाहरवीर गोगाजी , गुरु गोरखनाथ के परम शिष्य और राजस्थान की सिद्ध परपरा यानि की 6 सिद्ध योगियों में से गोगाजी का पहला स्थान हैं।  हिन्दू लोक देवता गोगा जी हनुमान गढ़ के चौहान शासक गोगा बाबा  के रूप में में जाने जाते हैं। धर्म परिवर्तीत कर चुके चौहान-मुसलमान गोगा पीर के रूप में पूजते हैं। 

जानिए हिन्दू, मुस्लिम और सिख में क्यों पूजनीय हैं गोगाजी महाराज ? वर्तमान में भी बने हुए हैं एकता के प्रतीक — Nedrick News

गोगाजी महराज के अगर जन्म को देखे, तो इनका भी जन्म एक दैवीय जन्म की तरह हुआ था। इनके पिता का नाम जेंह्वर तथा माता का नाम बाइल था। गोगा जी की माता के बारे में कहा जाता है कि वो गोरखनाथ की भक्त थी।  बाइल की सेवा से प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने गूगल धूप से बना सर्प दिया और कहा कि इसे दूध में घोल कर पी जाना।  इसके पिने के बाद गोगादे (गोगाजी) का जन्म हुआ था। 

गोगाजी के शादी का दिलचस्प किस्सा

दूसरी तरफ गोगाजी के शादी का किस्सा भी बहुत दिलचस्प है।  गोगाजी वीर के शादी के बारे में कहा जाता है कि लोकदेवता गोगाजी का विवाह पाबूजी अपने बड़े भाई बुडौजी की पुत्री केमलदे से करना चाहते थे, लेकिन बूडोजी यह नही चाहते थे। पाबूजी, गोरखनाथ के उन्हीं 6 वीर और योगी शिष्यों में से एक थे, जिनमे गोगाजी का पहला स्थान है। गोगाजी और केमलदे के विवाह को देखे थे तो बुडौजी के मना करने के बाद इन लोगों का विवाह होना लगभग नामुमकिन ही था। कहा जाता है की इसके बाद एक दिन गोगाजी ने सर्प का रूप धारण कर यानि की सांप बनकर फूलों के बिच बैठ गये थे। जब केमलदे वहां फूल लेने गईं, तब सांप से उसे डस लिया। अंत में गोगाजी के अभिमंत्रित धागे को बाँधने से केमलदे ठीक हो गई और दोनों का विवाह हो गया। 

अपने भाइयों के मौत के बाद बने सन्यासी 

आपमें से बहुत कम लोगों को गोगाजी महराज की समाधि के किस्से के बारे में पता होगा। गोगाजी महराज तो एक पराक्रमी योद्धा थे। हमारे इतिहास में यह तो पढ़ाया जाता है कि महमूद गजनवी और गौरी जैसे लूटेरों ने भारत की धरती को लूटा, शहरों को तहस नहस किया. मगर यह नहीं बताया जाता हैं कि उसका प्रतिशोध गोगाजी जैसे वीरों ने कैसे किया। इसी बीच गोगाजी ने दिल्ली के सुलतान फिरोजशाह से युद्ध किया। इस युद्ध में गोगाजी के दो मौसेरे भाई अरजन व सरजन भी बादशाह की ओर से लड़ रहे थे। वे दोनों मारे गये… जब गोगा ने अपने घर पर यह बात अपनी माता को बताई, वह बहुत नाराज हुई और गोगा को घर से चले जाने और कभी मुहं नही दिखाने को कहा। गोगाजी को यह बहुत बुरा लगा और इसके बाद उन्होंने जीवित समाधि लेली थी। 

जानिए हिन्दू, मुस्लिम और सिख में क्यों पूजनीय हैं गोगाजी महाराज ? वर्तमान में भी बने हुए हैं एकता के प्रतीक — Nedrick News

गोगाजी के शौर्य को देख मुगलों ने बताया  जिंदा पीर

गोगाजी जैसे पराक्रमी वीर की मौत भी एक महान योद्धा की तरह ही हुई। गोगा जी जी जितना अपने अंदर योगी थे उतने ही बड़े योद्धा वो बाहर थे। वो इतने बड़ा योद्धा थे की गौरक्षा में उन्होंने युद्ध भूमि पर अपने प्राण गँवा दिए। कहानी कुछ ऐसे है की इलाके की सारी गायों को मुस्लिम शासक गजनवी बंधक बना ले गया ! जिस कारण गोगा जी गाँयों को बचाने अपने 47 पुत्रों और 60 भतीजों के साथ ‘चिनाब नदी‘ को पार कर के गजनवी से युद्ध करने पहुंचे, और यहां तक की गायों को मुक्त भी करवाया ! महमूद गजनवी ने इस युद्ध गोगाजी के शोर्य को देखकर इन्हें जाहरपीर या जिंदा पीर कहा था। लेकिन वापस आने के बाद इनके चचेरे भाईयों ने इनसे युद्ध किया जिसमें ये वीर गति को प्राप्त हुए थे ! अन्य इतिहास के अनुसार गोगाजी को अपने चचेरे भाई के साथ भूमि विवाद पर युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त हुई थी। युद्ध में लड़ते हुए उनका सर ददरेवा (चुरू) में गिरा इसी कारण इसे शीर्षमेड़ी कहा जाता है,और कपन्ध (बिना शीश का धड़) गोगामेड़ी (नोहर-हनुमानगढ़) में गिरा था, जिस कारण इसे धुरमेड़ी कहते हैं !

Also read- गुरु नानक जी ने क्यों दिया सिखों को “एक ओंकार सत नाम” का मूल मंत्र, जाने इसकी उत्पत्ति और अर्थ

vickynedrick@gmail.com

vickynedrick@gmail.com https://nedricknews.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds