Delhi New CM: आतिशी कैसे बन गईं अरविंद केजरीवाल की उत्तराधिकारी? जानिए केजरीवाल ने क्यों दिखाया उनपर भरोसा

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 17 Sep 2024, 12:00 AM | Updated: 17 Sep 2024, 12:00 AM

अरविंद केजरीवाल के बाद दिल्ली का नया सीएम कौन होगा? आखिरकार सस्पेंस खत्म हो गया है। आम आदमी पार्टी की नेता आतिशी शर्मा के रूप में दिल्ली को नया सीएम मिल गया है। केजरीवाल ने आतिशी को अपना उत्तराधिकारी बनाकर उन्हें सत्ता सौंप दी है। लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि आतिशी केजरीवाल की इतनी भरोसेमंद कैसे हो गईं कि उन्हें दिल्ली की सत्ता सौंप दी गई। मिली जानकारी के मुताबिक मंगलवार को आम आदमी पार्टी के विधायक दलों की बैठक में खुद अरविंद केजरीवाल ने आतिशी के नाम का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव पर सभी ने सर्वसम्मति से सहमति जताई। इस तरह अब आतिशी ने सीएम की रेस जीत ली है। अब सवाल यह उठता है कि अरविंद केजरीवाल ने आतिशी को दिल्ली का नया सीएम क्यों बनाया है? तो इसके कई कारण हैं।

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आतिशी है अरविंद केजरीवाल की सबसे भरोसेमंद

आतिशी को अरविंद केजरीवाल का भरोसेमंद और काफी करीबी माना जाता है। अन्ना आंदोलन के समय से ही आतिशी अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से जुड़ी हुई हैं, वह इस समूह की नई नेता नहीं हैं। अपनी योग्यताओं के दम पर वह महज पांच साल में विधायक से मंत्री बन गईं। 2020 में आतिशी कालकाजी की पहली विधायक चुनी गईं। 2023 में उन्हें अरविंद केजरीवाल सरकार में मंत्री बनाया गया और 2024 तक वह दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं। इस तरह से उनका राजनीतिक सफर लगभग अद्भुत रहा है।

सीएम रेस में शामिल थे ये सात दावेदार

अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे की घोषणा के बाद, मुख्यमंत्री पद के लिए सात नाम सामने आए थे। इनमें सबसे पहले उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल का नाम था। लेकिन शुरू से ही उनका दावा कमजोर था, क्योंकि वे विधायक नहीं हैं। इसके अलावा, ये मंत्री भी मुख्यमंत्री पद के लिए दौड़ में थे: गोपाल राय, कैलाश गहलोत, आतिशी, सौरभ भारद्वाज, राखी बिड़लान और कुलदीप कुमार।

आतिशी ने केजरिवल के बाद AAP को संभाला

दिल्ली शराब घोटाले की जांच की कमान आतिशी ने तब संभाली थी, जब अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जेल में थे। इस दौरान आतिशी ने संगठन और सरकार की जिम्मेदारियों को बखूबी संभाला। जब भी आम आदमी पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उन्होंने विरोधियों का डटकर सामना किया। उन्होंने पिछले कुछ समय से आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता की भूमिका संभाली है, केजरीवाल और सिसोदिया की जगह। उन्होंने कई मुद्दों पर मीडिया के सामने आम आदमी पार्टी का पक्ष रखा है। आतिशी ने इन दो प्रभावशाली हस्तियों की अनुपस्थिति में भी संगठन और नेताओं का मनोबल बनाए रखा।

ये थे वो कारण जिसकी वजह से आतिशी ने सीएम कुर्सी की रेस जीत ली

-आम आदमी पार्टी सरकार के मंत्रियों में एकमात्र महिला मंत्री। पार्टी में महिलाओं की मुख्य आवाज़।

-मनीष सिसोदिया के जेल जाने के बाद उन्होंने शिक्षा मंत्रालय की बागडोर संभाली और इसे बखूबी निभाया।

-आतिशी की संगठन और नेताओं पर अच्छी पकड़ है।

-आतिशी का अंदाज़ आक्रामक है।

-संगठन और प्रशासन का अच्छा अनुभव

आतिशी के सीएम बनने पर स्वाति मालीवाल ने जताया दुख

स्वाति मालीवाल ने आप नेता आतिशी के दिल्ली के नए मुख्यमंत्री चुने जाने पर इसे दिल्ली के लिए दुखद दिन बताया है। स्वाति मालीवाल ने ट्विटर पर एक पोस्ट में कहा, “आज दिल्ली के लिए बहुत दुखद दिन है। आज दिल्ली का मुख्यमंत्री एक ऐसी महिला को बनाया जा रहा है, जिसके परिवार ने आतंकवादी अफजल गुरु को फांसी से बचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी। उसके माता-पिता ने आतंकवादी अफजल गुरु को बचाने के लिए माननीय राष्ट्रपति को दया याचिका लिखी थी।”

आतिशी का परिवार आतंकवादी अफ़जल गुरु की फांसी रुकवाना चाहते था

स्वाति मालीवाल ने आतिशी के परिवार पर आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु को फांसी से बचाने के लिए लड़ने का भी आरोप लगाया है। मालीवाल ने आगे कहा, “उनके अनुसार, अफ़ज़ल गुरु निर्दोष था और उसे राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया था। वैसे तो आतिशी मार्लेना सिर्फ़ ‘Dummy CM’ है, फिर भी ये मुद्दा देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। भगवान दिल्ली की रक्षा करे!”

केजरीवाल ने मजबूरी में आतिशी को सीएम बनाया

इससे पहले दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने दावा किया था कि अरविंद केजरीवाल ने आतिशी को मुख्यमंत्री बनने के लिए मजबूर किया था क्योंकि वे चाहते हुए भी अपनी पसंद का उम्मीदवार नियुक्त नहीं कर पा रहे थे। मनीष सिसोदिया ने आतिशी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दबाव डाला और परिणामस्वरूप आतिशी को सभी विभाग दे दिए गए। वीरेंद्र सचदेवा के अनुसार, नए रूप के बावजूद AAP का कुटिल स्वभाव नहीं बदला है।

आतिशी का सियासी सफर

आतिशी ने लोकसभा में सीट जीतने का भी प्रयास किया है। आतिशी को 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया था। उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के गौतम गंभीर ने 4.77 लाख वोटों के अंतर से हराया था। आतिशी ने 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में दक्षिणी दिल्ली कालकाजी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार धर्मवीर सिंह को 11,422 वोटों से हराया था। बाद में उन्हें और सौरभ भारद्वाज को उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के इस्तीफे के बाद दिल्ली प्रशासन में कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल किया गया।

केजरिवल का दिल्ली को लेकर क्या है प्लान?

केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने और आतिशी को मुख्यमंत्री बनाने के कई राजनीतिक मायने हैं। सबसे पहले तो अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि दिल्ली में जल्द से जल्द चुनाव हो। महाराष्ट्र के अलावा उन्होंने प्रस्ताव रखा है कि दिल्ली में भी नवंबर में चुनाव हो जाएं। लेकिन इसकी संभावना अभी भी कम ही लग रही है। क्योंकि दिल्ली में फरवरी 2025 में चुनाव होने हैं।

दिल्ली पर आम आदमी पार्टी का शासन

दिल्ली में 2013 से आम आदमी पार्टी का शासन है। 8 दिसंबर 2013 को दिल्ली की 70 सीटों के लिए 2013 के चुनाव के नतीजे घोषित हुए। इसमें 32 सीटों के साथ भाजपा शीर्ष पर रही। हालांकि उसे बहुमत नहीं मिला। उस समय हुए चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 28 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस ने 8 सीटें जीतीं। अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के समर्थन से मंत्रिमंडल का गठन किया और मुख्यमंत्री बने। लेकिन 49 दिनों के बाद दोनों पार्टियों का सहयोग खत्म हो गया। केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया। बाद में जब विधानसभा चुनाव हुए तो केजरीवाल की पार्टी ही बहुमत हासिल करने वाली पार्टी थी।

क्या हेमंत सोरेन की तरह गेम खेलना चाहते हैं केजरीवाल

अब केजरीवाल द्वारा आतिशी को मुख्यमंत्री बनाने के कदम को झारखंड की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी मुख्यमंत्री रहते हुए जेल जाना पड़ा था। उन पर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला था, जिसके बाद वे जेल गए और अपने पद से इस्तीफा देकर अपने विश्वस्त चंपई को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया। इसके बाद चंपई सोरेन मुख्यमंत्री बने, लेकिन जब हेमंत आए तो उन्हें कुर्सी से हटा दिया गया। इससे नाराज चंपई ने हेमंत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। चंपई फिलहाल हेमंत के खिलाफ बगावत कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं।

इसी तरह 2014 में भी नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री का चयन किया था। लोकसभा चुनाव हारने के बाद नीतीश ने इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था। हालांकि, कुछ ही महीनों में मांझी ने नीतीश के खिलाफ बगावत कर दी।

सीएम चुनने का लालू का मॉडल भी फेल

1997 में चारा घोटाले की जांच तेज होने के बाद केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव पर शिकंजा कस दिया। जब लालू यादव को लगा कि सीबीआई की गिरफ्तारी से उन्हें कोई कानूनी सहारा नहीं मिल रहा है, तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप दी। देश के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी नेता ने अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री पद दिया। लालू के इस फैसले से जनता दल में बगावत भड़क उठी। लालू को मजबूरन नई पार्टी बनानी पड़ी। लालू का यह फैसला राष्ट्रीय जनता दल के लिए विनाशकारी साबित हुआ। 2000 के चुनाव में छल-कपट के जरिए लालू की पार्टी सरकार बनाने में सफल रही, हालांकि बाद में उसे सत्ता से हाथ धोना पड़ा।

केजरीवाल के लिए राह आसान क्यों नहीं?

अभी तक आपातकालीन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री चुनने का लालू और चंपई का तरीका कारगर नहीं रहा है। चंपई-मांझी मॉडल में जिसे मुख्यमंत्री बनना था, वह खुद बागी हो गया, जबकि लालू मॉडल में पार्टी के भीतर विद्रोह हुआ। अगर केजरीवाल लालू मॉडल के हिसाब से मुख्यमंत्री चुनते हैं तो पार्टी के भीतर और जनता की नजरों में उनकी फजीहत हो सकती है। इससे उनकी निस्वार्थता की धारणा पर भी असर पड़ेगा। एलजी के कारण कानूनी पेंच भी फंस सकते हैं। उनकी पत्नी सुनीता फिलहाल विधायक नहीं हैं। पांच महीने बाद ही दिल्ली में चुनाव प्रस्तावित हैं। एलजी इस मामले में विधायक को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा करके इसे टाल सकते हैं।

खतरे के साथ-साथ 2 तथ्य भी पक्ष में हैं

पिछले दो सालों से अरविंद केजरीवाल की पार्टी का नाम दिल्ली शराब घोटाले से जुड़ा हुआ है। इन दो सालों में पार्टी के तीन बड़े नेताओं को जेल की सज़ा सुनाई गई। फिर भी, AAP के अंदर कोई ख़ास दरार नहीं आई है। मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल ने भी इस बात को उठाया है। दिल्ली में चुनाव पार्टी के लिए दूसरा फ़ायदा है। अब से पाँच महीने बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव से एक महीने पहले आचार संहिता लागू हो जाएगी। ऐसे में नए मुख्यमंत्री के पास ज़्यादा समय नहीं होगा। हालांकि, केजरीवाल ने यह भी घोषणा की है कि वे मंत्रिमंडल के गठन के साथ ही मुख्यमंत्री की कुर्सी वापस ले लेंगे। लेकिन आतिशी उन्हें सीएम की कुर्सी देंगी या नहीं, यह देखना अभी बाकी है।

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