…तो वुहान लैब से ही निकला कोरोना? भारतीय वैज्ञानिकों ने जुटाए ये बड़े सबूत, किए चौंकाने वाले दावे!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 06 जून 2021, 05:30 AM Updated: 06 जून 2021, 05:30 AM
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डेढ़ सालों में 37 लाख से भी ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुलाने वाला और दुनियाभर के लोगों की जिंदगी तबाह करने वाला कोरोना वायरस आया कहां से? ये अब तक रहस्य बना हुआ है। कोरोना महामारी की उत्पत्ति को लेकर अक्सर ही बहस छिड़ी रहती है। कुछ लोगों का मानना है कि कोरोना जानवरों से इंसान में आया, तो कुछ लोग इसके पीछे चीन को कसूरवार मानते हैं। कई लोगों का मानना है कि चीन की वुहान लैब से ये वायरस निकला। 

कोरोना की उत्पत्ति को लेकर जांच

दुनिया के कई देश कोरोना वायरस को लेकर चीन को शक के नजरिए से देखते हैं। इसमें अमेरिका भी शामिल है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कोरोना की उत्पत्ति की जांच करने के अधिकारियों को निर्देश तक दिए हैं। वहीं कई देशों के वैज्ञानिक भी ऐसा मानते हैं कि वुहान लैब से ही ये वायरस निकला।

अब भारतीय वैज्ञानिकों की तरफ से भी इस तरह के दावे किए गए। ऐसा दावा करने वालों में पुणे के रहने वाले वैज्ञानिक दंपति डॉ. राहुल बहुलिकर और डॉ. मोनाली राहलकर शामिल हैं। इसके अलावा एक और रिसर्चर भी हैं, जिन्होंने अपना नाम गुप्त रखा है। कोरोना के वुहान लैब से निकलने के दावे को सही साबित करने के लिए कुछ बड़े सबूत भी दिए।

‘सीकर’ से किया संपर्क और…

कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर बीते साल मार्च में सोशल मीडिया पर एक टीम बनाई गई थीं। इस टीम में दुनियाभर के वैज्ञानिक और रिसर्चर शामल थे। इसका नाम रखा गया Drastic। सुरक्षा के चलते टीम में शामिल अपने नामों को गुप्त ही रखा। भारतीय वैज्ञानिक दंपत्ति राहुल बहुलिकर और डॉ. मोनाली राहलकर टीम का हिस्सा था। इसके अलावा टीम में तीसरे जो भारतीय रिसर्चर हैं, उनका निक नेम ‘सीकर’ है। असली नाम नहीं मालूम। 

वैज्ञानिक डॉ. राहुल बाहुलिकर ने कहा कि एक ट्विटर यूजर ‘सीकर’ से उन्होंने संपर्क किया, जो Drastic नामक समूह का हिस्सा है। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक सीकर 20 से 30 साल के बीच के हैं। वो पूर्वी भारत में रहते हैं। ‘सीकर’ एक आर्किटेक के साथ साथ फिल्ममेकर हैं। इसके अलावा वो साइंस टीचर हैं। साथ में उनको चाइनीज लैंग्वेज भी आती है। 

वुहान लैब से निकलने के मिले ये सबूत

ये लोग जांच करने के लिए चीनी दस्तावेजों का अनुवाद करने की कोशिश कर रहे हैं। चाइनीज एकेडमिक पेपर और गुप्त दस्तावेजों के मुताबिक इस सब की शुरूआत 2012 में हुई थीं। तब एक खदान को साफ करने के लिए कुछ श्रमिकों को भेजा गया। उस खदान में चमगादड़ों का आंतक फैला हुआ था। इसके बाद वो श्रमिक बीमार पड़ गए और उनमें से तीन की मौत हो गईं। इसमें वही लक्षण देखने को मिले थे, जो कोरोना के होते हैं। इसके बाद 2013 में वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के डायरेक्टर अपनी टीम के साथ माइनशाफ्ट में गए और वहां से सैंपल लेकर आए। लैब के डायरेक्टर ने दावा किया कि श्रमिकों की मौत गुफा में मौजूद फंगस क चलते हुई। 

वहीं Distract इसको लेकर ये कहता है कि वुहान लैब के डायरेक्टर को एक अज्ञात कोरोना स्ट्रेन मिला था। वुहान लैब ने साल 2015-17 के पेपर में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है। ये प्रयोग काफी विवादित था, क्योंकि इससे वायरस को कई ज्यादा संक्रामक बनाया गया।

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