Historic Bhide Wada: फुले दंपति की ऐतिहासिक विरासत को मिलेगा सलाम,  भिडे वाडा पर बनेगा राष्ट्रीय स्मारक!

👤 vickynedrick@gmail.com | Nedrick News 🕒 Published: 03 जुलाई 2025, 12:00 AM 🔄 Updated: 03 जुलाई 2025, 12:00 AM
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Historic Bhide Wada: भारत में सामाजिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ते हुए, बंबई हाई कोर्ट ने साल 2023 में पुणे नगर निगम और महाराष्ट्र राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय सुनाया है। यह फैसला भिडे वाडा मामले से जुड़ा हुआ था, जहां 1848 में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिबा फुले ने भारत का पहला लड़कियों का स्कूल स्थापित किया था। यह स्कूल भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। भिडे वाडा की वर्तमान स्थिति खस्ता हो चुकी है, और वहां एक राष्ट्रीय स्मारक बनाए जाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न हो गया था।

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दरअसल पुणे नगर निगम ने इस 3,500 वर्ग फीट (327 वर्ग मीटर) भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन इसे पुणे मर्चेंट कोऑपरेटिव बैंक और इसके दो दर्जन किरायेदारों से कड़ा विरोध झेलना पड़ा। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे फिर से हाई कोर्ट में भेज दिया। अब, सोमवार को हाई कोर्ट ने पुणे नगर निगम के पक्ष में लंबित निर्णय सुनाया, जिससे भिडे वाडा में एक स्मारक बनाने का रास्ता साफ हो गया।

हाई कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश- Historic Bhide Wada

इस मामले में फैसला सुनते हुए साल 2023 में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति गौतम पटेल और कमल खाटा की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि स्मारक का निर्माण सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा करेगा और अधिकारियों को भूमि अधिग्रहण योजना के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा था, “हाई कोर्ट के निर्णय से भिडे वाडा पर स्मारक बनाने का रास्ता साफ हो गया है। यह निर्णय नवरात्रि के दौरान आया है, जो हम सभी के लिए एक शुभ संकेत है।”

महाराष्ट्र के उच्च और तकनीकी शिक्षा मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने भी इस फैसले का स्वागत किया था। उन्होंने कहा, “अधिवक्ता जनरल ने प्रभावी रूप से सरकार का पक्ष अदालत में प्रस्तुत किया, जिसके बाद हाई कोर्ट का यह निर्णय हुआ।”

सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले की क्रांतिकारी पहल

सावित्रीबाई फुले का जीवन भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक प्रेरणा रहा है। जब उनकी शादी हुई थी, तब वह निरक्षर थीं, लेकिन ज्योतिबा फुले ने उन्हें साक्षर बनाने का बीड़ा उठाया। महज 17 वर्ष की आयु में, 1 जनवरी 1848 को, सावित्रीबाई फुले ने भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला। इस कदम को उस समय कठोर विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें पत्थरों और गोवर्धन के गोबर से हमले झेलने पड़े, लेकिन इस उत्पीड़न के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने पुणे में कई और स्कूल खोले और 1851 तक उन्होंने 150 से अधिक विद्यार्थियों को शिक्षा देना शुरू कर दिया। यह पहल भारतीय समाज में महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने में मील का पत्थर साबित हुई।

नीता होले की संघर्ष की कहानी

नीता होले, जो ज्योतिबा फुले के परपोते की बहू हैं, ने भिडे वाडा और फुले द्वारा शुरू किए गए स्कूलों के लिए संघर्ष किया। उनका कहना था कि यदि उन्होंने इस मुद्दे को उठाया नहीं होता, तो भिडे वाडा के बारे में कोई नहीं जानता होता। उन्होंने नागपुर में विधान भवन के सामने धरना देकर सरकार से मांग की थी कि फुले द्वारा स्थापित 17 स्कूलों को पुणे नगर निगम से उन्हें सौंपा जाए और भिडे वाडा पर राष्ट्रीय स्मारक बनाया जाए।

नीता ने यह भी कहा कि वह खुश हैं कि हाई कोर्ट का फैसला उनके पक्ष में आया, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि स्मारक के निर्माण के लिए जो 50 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, उनका सही तरीके से उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से यह भी अनुरोध किया कि भिडे वाडा की 3,000 वर्ग फीट भूमि में से 1,000 वर्ग फीट क्षेत्र स्मारक के लिए आरक्षित किया जाए, और इसके ऊपर दो अतिरिक्त मंजिलें बनाई जाएं, जिनमें लड़कियों के लिए एक पुस्तकालय हो। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उनकी यह मांग पूरी नहीं की गई, तो वह आंदोलन शुरू करेंगी।

भिडे वाडा मामले में बंबई हाई कोर्ट का फैसला न केवल सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले के योगदान को सम्मानित करता है, बल्कि यह भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों के लिए उनकी क्रांतिकारी पहल को भी सराहता है। यह निर्णय एक ऐतिहासिक कदम है, जो सामाजिक न्याय, समानता और शिक्षा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।

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