Ambedkar Park in Punjab: डॉ. आंबेडकर के नाम पर पंजाब में बना ऐसा पार्क, जिसे देखकर हर कोई हैरान!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 05 सितम्बर 2025, 05:30 AM Updated: 05 सितम्बर 2025, 05:30 AM
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Ambedkar Park in Punjab: जब भी भारत में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम पर बने पार्कों की बात होती है, तो ज़हन में सबसे पहले लखनऊ का “राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल” और नोएडा का “अंबेडकर पार्क” आता है। लेकिन पंजाब के एक छोटे से कस्बे फगवाड़ा में ऐसा एक पार्क खड़ा है, जो न सिर्फ भव्य है, बल्कि अपने भीतर समाज की चेतना, संघर्ष और बदलाव की पूरी कहानी समेटे हुए है।

यह कोई सरकारी प्रोजेक्ट नहीं है। ये एक आंदोलन से उपजा सपना है, जिसे जमीनी स्तर पर जी-जान से जुड़े कुछ लोगों ने अपने मेहनत, समय और निजी संसाधनों से हकीकत में बदल दिया। इस पार्क का नाम है – डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क, फगवाड़ा।

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जैसे ही आप इस पार्क में प्रवेश करते हैं… Ambedkar Park in Punjab

…तो सबसे पहले आपका ध्यान इन शानदार और जीवंत मूर्तियों की तरफ जाता है। ये सिर्फ पत्थर की आकृतियाँ नहीं हैं, बल्कि इतिहास की सजीव कहानियाँ हैं। राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले, माता सावित्रीबाई फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, मान्यवर कांशीराम, माता रमाबाई, फातिमा शेख, तथागत बुद्ध, और सम्राट अशोक जैसी विभूतियों की प्रतिमाएं इस पार्क की रौनक हैं।

इन मूर्तियों को देखने के बाद एक बात साफ हो जाती है यह पार्क सिर्फ किसी की याद में खड़ा स्मारक नहीं है, बल्कि यह बहुजन समाज की पहचान, उसका आत्मगौरव और उसकी सांस्कृतिक विरासत का जिंदा दस्तावेज़ है।

मूर्तियों में जान है, पत्थरों में विचार हैं

इन प्रतिमाओं की एक और खास बात यह है कि ये सिर्फ किसी “एक रंग के पत्थर” से तराशी हुई न होकर, कंक्रीट और रंगों से बनी हुई हैं। यानी इनमें जो रंग भरे गए हैं, वो इन्हें जीवंत बनाते हैं जैसे मानो वे अपने संघर्ष की कहानी खुद कह रही हों।

आप जब छत्रपति शाहू जी महाराज की प्रतिमा के पास जाते हैं तो आपको याद आता है कि 1902 में उन्होंने अपने राज्य में 50% आरक्षण लागू किया था, वो भी उस दौर में जब जातिगत भेदभाव अपनी चरम सीमा पर था।

इसी तरह सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की मूर्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि देश में लड़कियों की पहली स्कूल खोलने वाली महिलाएं सिर्फ शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि सामाजिक क्रांति की प्रतीक थीं।

यह पार्क बना कैसे?

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि असली प्रेरणा इसके निर्माण की कहानी में छिपी है।

इस पार्क को बनाने वाले रमेश कॉल और उनकी पत्नी सीता कॉल हैं,  एक समर्पित जोड़ी, जो न केवल सामाजिक आंदोलन से जुड़े हैं, बल्कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इस पार्क की नींव रखी, पैसा खर्च किया, और अपने हाथों से मिट्टी-कचरा डाल कर इसका आकार गढ़ा।

शुरुआत में यह जगह एक गहरा छप्पड़ (गड्ढा/खाई) थी, जिसमें शहर का गंदा पानी जमा होता था। कॉल साहब ने नगर परिषद से बात की, कुछ फंड मंजूर कराए, लेकिन यह फंड इतना सीमित था कि उससे एक छोटा-सा गार्डन भी नहीं बन सकता था। तब उन्होंने फैसला लिया कि:

“हमें पैसे की नहीं, अपने पुरखों की विरासत को सहेजने की फिक्र है।”

उन्होंने शहर की फैक्ट्रियों का कचरा, राख, मिट्टी आदि 7000 ट्रॉली से उठवा कर इस गड्ढे को भरा। सुबह 5 बजे उठकर वो खुद उस गंदगी को बिछाते थे। हफ्तों की मेहनत से यह जमीन समतल हुई। और फिर शुरू हुआ निर्माण का सफर।

संघर्ष की कीमत नहीं, सम्मान चाहिए था

निर्माण के शुरुआती चरण में कॉल दंपत्ति को नगरपालिका अध्यक्ष से समर्थन की जरूरत पड़ी। उन्होंने पैसे की मांग नहीं की, बस एक शर्त रखी:

“अगर हमारा समर्थन चाहिए, तो इस पार्क का नाम डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम पर होना चाहिए।”

कोई और होता तो शायद पैसे ले लेता, पद के बदले चुप्पी साध लेता, लेकिन उन्होंने बाबा साहब की विरासत को प्राथमिकता दी।

एनआरआई सपोर्ट और जनसहयोग

शुरुआत कॉल दंपत्ति ने अपने खर्चे से की। लेकिन जब लोगों ने इस काम को देखा, तो देश-विदेश के अंबेडकरवादी जुड़ते चले गए।

  • अमेरिका से अंबेडकर कल्चरल रिफॉर्म ऑर्गेनाइजेशन
  • ब्रिटेन से गुरप्रीत बंसी और गुरदयाल भोज
  • कनाडा और यूरोप से कई साथी

इन सभी ने एक-एक मूर्ति का जिम्मा लिया और डोनेशन देकर अपना योगदान दिया। हर मूर्ति के पास एक पत्थर पर उसका डोनर अंकित है ताकि ट्रांसपेरेंसी बनी रहे और लोग देखें कि उनका योगदान कहां लगा।

यह पार्क सिर्फ पत्थरों का संग्रह नहीं

इस पार्क में सिर्फ मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि इसके साथ एक कल्चरल सेंटर, लाइब्रेरी, स्टेज, और हॉल भी है। यहां “शाहू मेला”, “अंबेडकर जयंती”, “बुद्ध पूर्णिमा”, “सम्राट अशोक जयंती” जैसे आयोजन भव्य रूप से होते हैं। बच्चों को इतिहास से जोड़ने के लिए छोटे-छोटे बच्चों को जय भीम कहना सिखाया जाता है, उनको किताबें दी जाती हैं, और बहुजन इतिहास बताया जाता है।

मूर्तियों से आगे – विचारों का आंदोलन

रमेश कॉल साहब खुद कहते हैं:

“मूर्तियों पे माला और विचारों पे ताला नहीं लगना चाहिए।”

यानी सिर्फ दिखावे से समाज नहीं बदलेगा, असली बदलाव विचारों से, समझ से और चेतना से आएगा।

सीता कॉल महिलाओं के बीच जाकर उन्हें अंधविश्वास से दूर रहना, बेटियों को पढ़ाना, और सामाजिक जागरूकता का महत्व समझाती हैं। वो कहती हैं:

“हम मूर्तियां इसलिए लगवाते हैं ताकि जिन महिलाओं को किताबें पढ़ने में रुचि नहीं होती, वे कम से कम इन प्रतिमाओं को देखकर प्रेरणा ले सकें।”

यह पार्क क्यों जरूरी है?

पंजाब जैसे राज्य में, जहां एक खास धार्मिक धारा बहुत प्रभावी है, वहां एक ऐसा सार्वजनिक स्थल बनाना, जिसमें बुद्ध, फुले, शाहू, सावित्रीबाई, कांशीराम, अंबेडकर और अशोक जैसे नायकों की विचारधारा को सम्मान मिले अपने आप में साहस और बदलाव की मिसाल है।

यह पार्क सामाजिक न्याय, समानता और बहुजन चेतना का केंद्र बन चुका है। और यह काम सिर्फ सरकार की मदद से नहीं, जन आंदोलन, सहयोग और खुद्दारी से हुआ है।

फगवाड़ा का डॉक्टर अंबेडकर पार्क सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है। यह संघर्ष की कहानी है। यह प्रेरणा का स्रोत है। यह बहुजन आंदोलन का जिंदा उदाहरण है कि जब आम लोग ठान लें, तो वे इतिहास रच सकते हैं।

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