वोटिंग के दौरान उंगली पर लगने वाली स्याही कहां से मंगवाई जाती, क्या है इसका इतिहास ?

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अगर आपने कभी चुनाव में वोट डाला होगा तो आप उंगली पर लगाई जाने वाली नीले कलर की स्याही के बारे में जरूर जानते होंगे. उंगली पर लगी स्याही, व्यक्ति द्वारा मतदान किए जाने की पहचान है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस स्याही को कहां बनाया जाता है? कौन सी कंपनी इसका निर्माण करती है और यह भारत में कब से चला आ रहा है? चलिए आज के लेख में हम इसके बारे में विस्तार से बात करतें हैं.

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मतदान में इंक लगाने का कारण

सबसे पहले हम बात करते हैं कि आखिर क्यों वोट डालने के दौरान स्याही उंगली पर लगाई जाती है? इसके पीछे का प्रमुख कारण है कि कोई भी वोटर दोबारा वोट न डाल पाए. इसका प्रयोग फर्जी वोटिंग को रोकने के लिए किया जाता है. यह स्याही आसानी से उंगली से नही हटती है, लंबे वक्त तक इसके निशान उंगली पर दिखाई देते हैं. इस इंक/स्याही को इलेक्शन इंक या इंडलिबल इंक भी कहते हैं.

भारत में यह स्याही बनाने वाली सिर्फ एक कंपनी है, जो दक्षिण भारत के मैसूर में मैसूर पेंट एंड वार्निश के नाम से स्थित है. इस कंपनी की स्थापना मैसूर घराने के महाराज नलवाडी कृष्ण राजा वडायर ने की थी. यह कंपनी इस इंक को केवल सरकार और चुनाव से संबंधित एजेंसियों को ही मुहैया कराती है. इसे मार्केट में दिए जाने पर रोक है. इस कंपनी की स्याही इस इंक की पहचान है.

कंपनी का इतिहास

इस कंपनी का इतिहास मैसूर के वाडियार राजवंश से जुड़ा हुआ है. यह राजवंश दुनिया के सबसे अमीर राजघरानों में शुमार था. महाराजा कृष्णराज वाडियार ब्रिटिश हुकूमत के दौरान यहां के शासक थे. उन्होंने 1937 में पेंट और वार्निश की एक कंपनी खोली, जब देश आजाद हुआ तो यह फैक्ट्री राज्य सरकार के अधीन हो गई.

1951-52 में हुआ मतदान आजाद भारत का पहला चुनाव था. उस दौर में कई लोगों ने एक से अधिक वोट डाले और पहचान कर पाना मुश्किल हो रहा था. इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की गई. चुनाव आयोग इस समस्या के समाधान के लिए ऐसी स्याही चाहता था जिसे आसानी से मिटाया न जा सके. इसके लिए चुनाव आयोग ने नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी ऑफ इंडिया से संपर्क किया. इसके बाद फिजिकल लेबोरेटरी ने ऐसी स्याही का निर्माण किया जो न पानी और न केमिकल से नष्ट की जा सकती थी.

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