ब्राह्मणवाद और छुआछूत को लेकर संत रविदास के 10 अनमोल वचन

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 20 जनवरी 2023, 05:30 AM Updated: 20 जनवरी 2023, 05:30 AM
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ब्राह्मणवाद और छुआछूत को लेकर संत रविदास ने कहे थे ये अनमोल वचन

पंजाब में संत रविदाजी को संत रविदास कहा जाता है तो वहीं  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उन्हें रैदास के नाम से जाना जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र के लोग ‘रोहिदास’ और बंगाल के लोग उन्हें ‘रुइदास’ कहते हैं। लेकिन ज्यादातर लोग उन्हें रविदास के नाम से ही जानते हैं.  संत रविदास जी का जन्म  माघ मास की पूर्णिमा को जहुआ, उस रविवार का दिन था जिसके कारण उनका नाम रविदास रखा गया था और इस साल 27 फरवरी 2021 को उनकी जयंती मनाई जाएगी। रविदास 15वीं शताब्दी के ऐसे कवि थे जिन्होंने ये साफ़ किया था कि भगवान और मंदिर की ज़रुरत इंसान को रोटी और इंसानियत से ज़्यादा पसंद नहीं है, उन्होंने अपने लेख में ईश्वर को अधिकृत के विज्ञापनों से समाज को मुक्त किया। जिसके बाद लगा कवि नहीं संत रविदास ने कहा और आज हम वैसे भी 10 ऐसे अनमोल वचनों के बारे में अल्पसंख्यक जो ब्राह्मणवाद और घुसपैठ थे।

रविदास के 10 अनमोल वचन

ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन,

पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीण।

किसी भी व्यक्ति का सिद्धांत और वरिष्ठ पूर्व का आधार उसका उच्च कुल उसके गुण नहीं है और उसका शौर्य होना चाहिए, भले ही वह कितना भी भद्दा क्यों न हो, उसका सम्मान लेना चाहिए, भले ही वह जाति से नीचा क्यों न हो।

जा देखे घिन शूटिंगै, नरक कुंड में बास

प्रेम भगति सोन ओधरे, प्रगतित जन रैदास।।

जिस रैदास को देखने में पहले घिनौना आता था, जिसका रहने का स्थान नरक-कुंड के रूप में था, ऐसे रविदास की ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना, ऐसा ही मनुष्य है जैसे के रूप में वापस उत्पत्ति हुई हो।

‘रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीचा

नकर कूं नीच करि दारी है, ओछे करम कीच’।।

कोई भी व्यक्ति किसी जाति में जन्म के कारण नीचा या छोटा नहीं होता है, मनुष्य अपने कर्मों के कारण नीचा होता है।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,

रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात’।।

जिस प्रकार केले के तने को छीला तो पत्ते के नीचे पत्ता, फिर पत्ते के नीचे पत्ता और अंत में कुछ नहीं बिखरा, लेकिन पूरा पेड़ खत्म हो जाता है। ठीक उसी तरह इंसानों को भी जातियों में बांट दिया जाता है, जातियों के बंटवारे से इंसान तो अलग-अलग टूट जाते हैं, अंत में इंसान खत्म भी हो जाते हैं, लेकिन यह जाति कभी खत्म नहीं होती।

कृष्ण, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा

वेद कतेब कुरान, पुराणन, सहज एक नहीं देखा।।

अर्थात् राम, कृष्ण, हरे, ईश्वर, करीम, राघव सब एक ही ईश्वर के अलग नाम हैं वेद, कुरान, पुराण आदि सभी ग्रंथों में एक ही ईश्वर का गुणगान किया गया है, और सभी ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार का पाठ पढ़ाते हैं हैं।

रैदास कह जाकै हदै, रहे रैन डे राम

सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम।।

इस दोहे में संत रविदास भक्ति की शक्ति का वर्णन करते हैं। रैदासजी कहते हैं, जिस हृदय में दिन-रात बस राम के नाम का ही वास रहता है, ऐसा भक्त स्वयं राम के समान हो ता है। राम नाम की ऐसी माया है कि इसे दिन-रात होती जपनेवाले साधक को न तो किसी के क्रोध से क्रोध आता है और न ही कभी कामभावना उस पर हावी हो जाती है।

मन ही पूजा मन ही धूप,

मन ही सेअन सहज संदर्भ।।

अर्थ- इस पंक्ति में रविदासजी कहते हैं कि निर्मल मन में ही भगवान वास करते हैं। अगर आपके मन में किसी के प्रति बैर नहीं है, कोई लालच या द्वेष नहीं है तो आपका मन ही भगवान का मंदिर, दीपक और धूप है। ऐसे पवित्र विचार वाले मन में प्रभु सदैव निवास करते हैं।

जनम जात मत पूछिए, का जातरू पात।

रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहीं जात कुजात॥

रैदास कहते हैं कि किसी की जाति नहीं पूछनी चाहिए क्योंकि संसार में कोई जाति-पाँति नहीं है। सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की पवित्रता हैं। यहाँ कोई जाति, बुरी जाति नहीं है।

मां तिलक हाथ जपमाला, जग ठुंगने कूं स्वांग बनाया।

मार्ग छाड़ि कुमारग उहकै, सांची प्रीत बिनु राम न पाया॥

ईश्वर को पाने के लिए माथे पर तिलक लगाना और मातृभूमि को जपना केवल संसार को ठगने का तरीका है। प्रेम मार्ग को छोड़कर स्वांग करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी। नियोजित प्रेम और अच्छे कर्म के बिना परमात्मा को पाना असंभव है।

ब्राह्मण खत्री बैस सूद रैदास जनम ते नांहि।

जो चाहि सुबरन कु पावई करमन मांहि॥

कोई भी मनुष्य जनम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं पैदा होता। यदि कोई व्यक्ति उच्च वर्ण को प्राप्त करना चाहता है तो वह केवल सुकर्म(अच्छे काम) से ही उसे प्राप्त कर सकता है। सुकर्म ही मानव को ऊंचा और लिपटा हुआ दिखता है।

जात पांट के फेर मन्हि, उर्जि रहै सब लोग।

मानुषा कुं खात हैं, रैदास जात कर रोग॥

अज्ञानी सभी लोग जाति-पाटी के चक्कर में उलझ कर रह गए हैं। रैदास कहते हैं कि यदि वे इस जातिवाद के चक्कर से नहीं निकलते हैं तो एक दिन जाति का यह भयंकर रोग संपूर्ण मानवता और मानव जाति को नीचा दिखाएगा।

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