भारत विश्व-शक्ति कैसे बने? राहत की राजनीति नहीं बल्कि अचूक उपायों की है जरूरत

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 31 अक्टूबर 2022, 05:30 AM Updated: 31 अक्टूबर 2022, 05:30 AM
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शिक्षा और चिकित्सा के बिना कौन सा देश बना विश्व-शक्ति?

भारतीय राजनेताओं के मुहं से और खासकर 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में आने के बाद से भारत के विश्वगुरु और विश्व-शक्ति बनने का मुद्दा अक्सर उठते रहा है। कौन सा ऐसा देश है जो विश्व शक्ति में सुमार नहीं होना चाहता है, लेकिन इस मुद्दे को लेकर राजनीती करना और जनता के भावनाओं से खेलना सही बात नहीं है। इस विश्वगुरु के मुद्दे को लेकर डॉ. वेदप्रताप वैदिक लिखते है कि सरकार भारत को विश्व-शक्ति बनाना तो चाहती है लेकिन शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में कोई क्रांतिकारी कदम उठाते हुए नहीं दिखती।

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प्रधानमंत्री मोदी से थी क्रन्तिकारी कदम की उम्मीद

डॉ. वेदप्रताप वैदिक कहते है कि, भारत की सरकारों से मेरी शिकायत प्रायः यह रहती है कि वे शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम क्यों नहीं उठाती हैं? अभी तक आजाद भारत में एक भी सरकार ऐसी नहीं आई है, जिसने यह बुनियादी पहल की हो। कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने छोटे-मोटे कुछ कदम इस दिशा में जरूर उठाए थे लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले मेरा सोचना यह था कि यदि वे प्रधानमंत्री बन गए तो वे जरूर यह क्रांतिकारी काम कर डालेंगे लेकिन यह तभी हो सकता है जब हमारे नेता नौकरशाहों की गिरफ्त से बाहर निकलें।

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राहत की राजनीति नहीं बल्कि अचूक उपायों की जरूरत

डॉ. वैदिक आगे कहते है कि फिर भी 2018 से सरकार ने जो आयुष्मान बीमा योजना चालू की है, उससे देश के करोड़ों गरीब लोगों को राहत मिल रही है। यह योजना सराहनीय है लेकिन यह मूलतः राहत की राजनीति है। यानि की मतदाताओं को तुरंत तात्कालिक लाभ दो और बदले में उनसे वोट लो। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन इस देश का स्वास्थ्य मूल रूप से सुधरे, इसकी कोई तदबीर आज तक सामने नहीं आई है। फिर भी इस योजना से देश के लगभग 40-45 करोड़ लोगों को लाभ मिलेगा। वे अपना 5 लाख रू. तक का इलाज मुफ्त करवा सकेंगे। उनके इलाज का पैसा सरकार देगी। अभी तक देश में लगभग 3 करोड़ 60 लाख लोग इस योजना के तहत अपना मुफ्त इलाज करवा चुके हैं। उन पर सरकार ने अब तक 45 हजार करोड़ रु. से ज्यादा खर्च किया है।

भाषाएँ पढ़ना जरुरी लेकिन प्रतिभापलायन नहीं

इसके बाद वैदिन सरकार से सवाल पूछते हुए कहते है कि देश की कुछ राज्य सरकारों ने भी राहत की इस रणनीति को अपना लिया है लेकिन क्या भारत के 140 करोड़ लोगों की स्वास्थ्य-रक्षा और चिकित्सा की भी योजना कोई सरकार लाएगी? इसी प्रकार भारत में जब तक प्रांरभिक से लेकर उच्चतम शिक्षा भारतीय भाषाओं के जरिए नहीं होती है, भारत की गिनती पिछड़े हुए देशों में ही होती रहेगी। जब तक यह मैकाले प्रणाली की गुलामी का ढर्रा भारत में चलता रहेगा, भारत से प्रतिभापलायन होता रहेगा। अंग्रेजीदाँ भारतीय युवजन भागकर विदेशों में नौकरियाँ ढूंढेंगे और अपनी सारी प्रतिभा उन देशों पर लुटा देंगे। भारतमाता टूंगती रह जाएगी। इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे बच्चे विदेशी भाषाएं न पढ़ें। उन्हें सुविधा हो कि वे अंग्रेजी के साथ कई अन्य प्रमुख विदेशी भाषाएं भी जरूर पढ़ें लेकिन उनकी पढ़ाई का माध्यम कोई विदेशी भाषा न हो। सारे भारत में किसी भी विदेशी भाषा को पढ़ाई का माध्यम बनाने पर कड़ा प्रतिबंध होना चाहिए। कौन करेगा, यह काम? यह काम वही संसद, वही सरकार और वही प्रधानमंत्री कर सकते हैं, जिनके पास राष्ट्रोन्नति का मौलिक सोच हो और नौकरशाहों की नौकरी न करते हों। जिस दिन यह सोच पैदा होगा, उसी दिन से भारत विश्व-शक्ति बनना शुरु हो जाएगा।

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