1988 flood history in Punjab: साल 2025 में अगस्त और सितंबर का महीना पंजाब के लिए कभी न भरने वाला जख्म दे कर गया.. करीब 4 दशको के बाद फिर से पंजाब की धरती हफ्तो बाढ़ की त्रासदी से गुजरी थी..23 से ज्यादा जिले औऱ लगभग 1900 गावों को प्रभावित करने वाले इस बाढ़ ने 2.5 लाख एकड़ कृषि भूमि को तबाह कर दिया.. अरबो की फसले पानी में समा गई.. लाखों लोग बेघर हो गये..इस, त्रासदी से किसी का भी कलेजा फट जायें, लेकिन पंजाब की जनता ने अपनी हिम्मत नहीं खोई और वो डट कर प्रभावित लोगो की मदद के लिए आगे आये थे.. ये त्रासदी कभी भूली नहीं जा सकती है लेकिन क्या आप ये जानते है कि पंजाब में 1988 में इससे भी भयानक बाढ़ आई थी.. जिसमें पंजाब की 18 प्रतिशत जमीन ही पानी में डूब गई..पंजाब के करीब 12989 गांवो में 9000 गांव प्रभावित हुए थे.. औऱ केवल पंजाब में ही बाढ़ के कारण 383 लोगो के मारे जाने की रिपोर्ट है.. तो वहीं कई लोग लापता हो गये। इस बाढ़ के कारण ही पहली बार भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड के खिलाफ प्रदर्शन किया.. तो वहीं पंजाब के खिलाफ साजिश रचने के शक में बीबीएमबी के अध्यक्ष की हत्या तक कर दी गई.. अपने इस लेख में हम 1988 में पंजाब में आई इस त्रासदी के बारे में जानेंगे।
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पंजाब की सबसे भयावह बाढ़ 1988
साल 1988 का सितंबर महीना चल रहा था.. ये समय भारत में मानसून का होता है। सितंबर के अंत तक मानसून के खत्म होने की प्रिडिक्शन पहले ही मौसम विभाग कर चुका था। उम्मीद थी भाखड़ा क्षेत्र में भी ज्यादा से ज्यादा 160मिमी बारिश होगी। लेकिन कहते है न कि जब प्रकृति तबाही लाती है तो वो समय नहीं देखती.. 22 सितंबर से लेकर 26 सितंबर तक भाखड़ा और पोंग बांधो के क्षेत्र में ही भारी बारिश हुई। अकेले भाखड़ा क्षेत्र में 634 मिमी बारिश हुई.. नतीजा पोंग और भाखरा नांगल बांधों की झीलें उफान पर पहुंच गई,, ये बांधे टूटे उससे पहले बीबीएमबी के अध्य़क्ष और उत्तर भारत की प्रमुख नदियों पर बने Hydropower plants का Operation देखने वाले बीएन कुमार ने एक कड़ा फैसला लेते हुए बिना किसी early warning के पोंग नदी से लगभग 3 लाख क्यूसेक पानी ब्यास नदी में और भाखरा नांगल बांध से लगभग 4 लाख क्यूसेक पानी सतलुज नदी में छोड़ दिया गया।
पंजाब के सिंचाई विभाग के Former Assistant Engineer, सुखदर्शन नट के मुताबिक ये फैसला बेहद जल्दबाजी में लिया गया था। 4 दिनों में पानी का लेवल तेजी से बढ़ा था .. लेकिन बांध के दरवाजे काफी चौड़े खोले गए थे। वहीं दूसरी तरफ सतलुज नदी के प्रचंड उफान को देखते हुए हरिके बांध को बचाने के लिए उसके सभी 52 दरवाजे खोल दिये गए। सतलुज के पानी का लेवल उसके 2 लाख क्यूसेक की कैपेसिटी से दोगुना हो चुका था। दरवाजो को खोलने के बाद पंजाब में जो जलप्रलय शुरु हुआ,.. उसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती देखते ही देखते न केवल पंजाब, बल्कि हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर और दिल्ली के विशाल क्षेत्र जलमग्न हो गए थे।
पंजाब की 18% जमीन बन गई थी समंदर
जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान पंजाब को हुआ.. पंजाब की करीब 18 % जमीन जलमग्न हो गई .. और 12,989 गांवों में से 9,000 गांव बाढ़ की चपेट में आ गए, जिनमें से 2,500 से अधिक गांव पूरी तरह से जलमग्न हो गए या बह गए, जिससे करीब 34 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे। पंजाब में कपूरथला, जालंधर, अमृतसर, बटाला, लुधियाना, संगरूर और गुरदासपुर जिले तो पूरी तरह से बाकी के राज्यों से अलग थलग प़ड़ गए थे जिसमें करीब 2 लाख से भी ज्याद लोग फंस गये थे। पंजाब की स्थिति बेहद खराब हो चुकी थी। मंडियों में फसलों और भंडारित अनाज बाढ़ से बह गए लेकिन उसी के साथ विडंबना ये थी कि पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू था।यानि की जो भी राहत का कार्य होता वो सीधा केंद्र से होता..पंजाब की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर रे के आदेश पर आपदा प्रबंधन विंग का गठन किया।
100 Boats को काम पर लगाया
राज्य के सभी स्कूलो और कॉलेजो को बंद करवा दिया गया ताकि विस्थापित औऱ प्रभावित लोगो को इनमें रखा जा सकें, क्योंकि टेंटो की कमी हो गई थी। Remote rural areas में फंसे लोगो को निकालने के लिए अलग से 100 Boats को काम पर लगाया गया। वहीं केंद्र सरकार ने भी उस वक्त 100मोटरबोट दिये, ताकि फंसे हुए लोगो को जल्द से जल्द निकाला जा सकें। भारतीय सेना औऱ वायुसेना दोनो को बाढ़ में बचाव कार्य के लिए लगाया गया था। आकड़ो की माने तो पांचो राज्यों में बांढ़ के कारण करीब 1400 से भी ज्यादा जानें चली गई थी.. बिना चेतानवी आई इस आपदा को जितना ईश्वर का प्रकोप कहा जाये उतना ही मानव रचित भी कहा जा सकता है।
अगर कुछ दिनो पहले भी बांधो के झीलो के भरे होने की चेतावनी जारी होती तो लोगो को विस्थापित होने का थोड़ा समय मिलता.. कहा जाता है कि इस घटना के बाद लोगो में बेहद गुस्सा भर गया था और वो अपने अपनो को खोने के लिए बीबीएमबी के अध्यक्ष मेजर जनरल बीएन कुमार के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे थे, लेकिन 7 नवंबर 1988 को खालिस्तान कमांडो फोर्स के प्रमुख परमजीत सिंह पंजवार के इशारे पर बीएन कुमार की हत्या कर दी गई.. क्योंकि पंजवार का मानना था कि बीबीएमबी ने साजिश के तहत बिना किसी चेतावनी के बांधो का दरवाजा सीमा से ज्यादा खोला था..वहीं कुमार ने अपने बचाव में मौसम विभाग के प्रिडिक्शन की बात उठाई जिसमें विभाग ने सितंबर के शुष्क होने की बात की थी। लेकिन कोई भी दलील इस बात झुठला नहीं सकती थी कि बांध का दरवाजा खोलने से पहले कोई चेतावनी जारी नहीं की गई थी। जो पंजाब में सदियों में होने वाली एक बड़ी त्रासदी का कारण बनी थी।































