Saka Panja sahib history: सिखों ने 1849 में पंजाब का ईस्ट ईंडिया कंपनी में विलय होने के बाद से ही अंग्रेजी हुकुमत से वफादारी निभाई थी.. वो अंग्रेजो की सेना में शामिल हो 1857 की पहली क्रांति को दबाने में साथ देना हो, .या फिर प्रथम विश्व युद्ध से लेकर दूसरा विश्व युद्ध लड़ना हो, सिखों ने समय समय पर अंग्रेजी हुकुमत का साथ निभाया..सारागढ़ी के 21 सिख जवानों के बलिदान को तो कभी भुलाया ही नहीं जा सकता है लेकिन वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी हुकुमत ने सिखों के सीने को छलनी करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी.. उन्हें पीठ पीछे खंजर मारने से भी बाज नहीं आये। 1919 का जलियावालां नरसंहार को याद ही होगा आपको.. जिनके बारे में शायद हम सभी जानते है, लेकिन एक और इतिहास है जिनके बारे में चर्चा कम होती है, जो अंग्रेजों के धोखे और दमनकारी सोच का परिणाम थी। साका पंजा साहिब.. जब गुरुद्वारे की बागडोर पंडितो के हाथों में थी और गुरुद्वारो की शान सिखों को ही गुरुद्वारे से जुड़ी गतिविधियों के लिए हिंदू पंडितो की इजाजत लेनी पड़ती थी। लेकिन क्या हुआ जब सिखों ने उनके खिलाफ जाकर लंगर के लिए गुरुद्वारे की जमीन से ही लकड़ी ले ली.. कैसे अंग्रेजों ने सैकड़ो सिखों को गिरफ्तार कर जल्दबाजी में फैसला किया.. जानते है क्या साका पंजा साहिब का इतिहास…
गुरुद्वारे पर पंडितों का कब्जा और अंग्रेजों की साजिश
16 नवंबर 1920 को गुरुद्वारों पर से पंडितो के वर्चस्व औऱ उनकी मनमानी खत्म करने के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) का गठन हुआ, जो अंग्रेजी हुकुमत से गुरुद्वारों पर सिख संगठन का अधिकार होना चाहिए और वो ही उसकी देखरेख करने चाहिए, उसकी लड़ाई लड़ रहे थे। समिति एक एक करके गुरुद्वारो का अधिकार महंतो से ले रही थी, लेकिन इसी दौरान 8 अगस्त 1922 को अमृतसर में गुरुद्वारा गुरु का बाग के पास मौजूद बंजर भूमि पर गुरू का लंगर कराने के लिए पेड़ काटने को लेकर अंग्रेजी हुकमत के खिलाफ हिंसक आंदोलन शुरु हुआ.. इस जमीन को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने पहले ही एक समझौते के तहत महतो से ले लिया था.. लेकिन अंग्रेजी हुकुमत ने चाल चली और सिख सेवको पर जमीन पर अतिक्रमण और गैर कानूनी तरीके से पेड़ काटने का आरोप लगा कर गिरफ्तार कर लिया था, जब आंदोलन व्यापक होने लगा तो अंग्रजो ने 25 अगस्त से यहां आने वाले हर सिख यात्रियों को बुरी तरह से पीटना शुरु कर दिया।
सिख यात्रियो की पिटाई
सिख यात्रियो की पिटाई का सिलसिला 13 सितंबर तक चलता रहा लेकिन जब राज्यपाल रेवरेंड सी.एफ. एंड्रयूज ने अंग्रेजो के व्यावहार की निंदा की औऱ पिटाई न करने की अपील की तो मारपीट बंद कर दी गई औऱ झूठे आरोपो को लगा कर सिखो को गिरफ्तार करके आनन फानन में मुकदमा चला कर ट्रेनो से दूर दराज भेजा गया। अंग्रेजी हुकुमत के अत्याचार का ये सिलसिला कई महीनो तक चलता रहा था लेकिन 29 अक्टूबर 1922 को कपूरथला राज्य के सूबेदार सिंह धालीवाल के नेतृत्व रिटायर सिख फौजियो के एक समूह ने अपनी गिरफ्तारी दे दी थी। मजिस्ट्रेट असलम खान ने सभी कैदियों को ढाई साल की सजा और 100 रूपय का जुर्माना लगाया। उन कैदियों को अमृतसर से अटक किले के लिए तक जाने वाली ट्रेन में बिठाया गया.. जब अगली सुबह हसन अब्दाल स्टेशन पहुंची तो ट्रेन में सवार सिख कैदियों के लिए हसन अब्दाल के गुरुद्वारा साका साहिब के सिखों ने फैसला किया कि वो ट्रेन से जाने वाले कैदियों को खाना खिलायेंगे।
डेढ़ घंटे तक सिख सेवको ने सभी कैदियों को खाना खिलाया
सिख भाई खाना लेकर जब स्टेशन मास्टर के पास पहुंचे तो उसने ये कह कर इंकार कर दिया ऐसे किसी कार्यक्रम की बात नहीं हुई है.. लाख गिड़गिड़ाने के बाद भी जब स्टेशन मास्टर नही माना तो इस कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे भाई प्रताप सिंह और भाई करम सिंह ट्रेन की पटरी पर ही बैठ गए.. उनके पीछे सैकड़ो लोग पटरी पर बैठ गए.. ट्रेन की रफ्तार तेज थी। ड्राइवर ने जब तक ट्रेन में ब्रेक लगाया तब तक 11 लोग कुचले जा चुके थे, जिसमें भाई प्रताप सिंह और भाई करम सिंह की काफी घायल थे। जब सिख संगतों ने उन्हें इलाज के लिए उठाना चाहा तो उन्होंने कहा कि पहले भूखे सिख भाईयो को खाना खिलाओं फिर हमें देखना। करीब डेढ़ घंटे तक सिख सेवको ने सभी कैदियों को खाना खिलाया.,. और फिर वो घायलो की तऱफ मुड़ गए। अगले दिन भाई प्रताप सिंह और भाई करम सिंह की मौत हो गई…. कहते है कि मरने से पहले भाई प्रताप सिंह जिनकी उम्र 24 साल ही थी।
उन्होंने अपनी 18 साल की पत्नी से कहा था कि वो उनकी मौत पर एक भी आंसू न बहाये..वरना उनकी शहादत व्यर्थ हो जायेगी..कहते है उनकी पत्नी ने कभी आंखू नहीं बहाये थे और आजीवन संगतो की सेवा करने, गद्दी का पाठ करने में और नाम सिमरन करने में बिताया था।,., दोनो के शवो को अंतिम संस्कार के लिए रावलपिंडी ले जाया गया, दोनो को शहीद की उपाधी दी गई और सिखो ने पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया। कहते है कि आजादी और बंटवारे से पहले तक हर साल यहां 30 अक्टूबर से 1 नवंबर कर मेला आयोजित किया जाता था, बंटवारे के बाद ये स्थान पाकिस्तान में चला गया। ये बलिदान कहानी है सिख धर्म में मौजूद त्याग और समर्पण की.. जब सिख परंपरा को मानने और उनका पालन करने के लिए सिख अनुयायियों ने हंसते हंसते अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। आज भी राववपिंडी में पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति शहीदो के सम्मान में 30 अक्टूबर से 1 नवंबर से कार्यक्रम करती है.. जो आज भी गवाह है सिखों को उस साहस वीरता और सेवा भाव का.. जिसे सिखों ने सदैव दिखाया है।































