KAPL bribery case: देश की सार्वजनिक क्षेत्र की फार्मा कंपनियां (PSUs) एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में हैं। इस बार मामला कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (KAPL) से जुड़ा है, जहां केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने कंपनी के प्रबंध निदेशक अनुराग दनायक को कथित तौर पर ₹5 लाख की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार करने का दावा किया है। सीबीआई के अनुसार यह राशि कथित ₹15 लाख की कुल रिश्वत मांग की पहली किस्त थी। इस कार्रवाई ने न केवल KAPL बल्कि पूरे सरकारी फार्मा सेक्टर में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सीबीआई के अनुसार यह मामला भोपाल स्थित एक फार्मा फर्म की शिकायत के बाद सामने आया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि वर्ष 2026-27 के लिए सर्विस एजेंट एग्रीमेंट के नवीनीकरण, नए सरकारी संस्थानों के आवंटन तथा अन्य व्यावसायिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के बदले रिश्वत की मांग की गई। एजेंसी के अनुसार प्रारंभिक जांच के बाद नोएडा में ट्रैप बिछाया गया, जहां कथित तौर पर ₹5 लाख स्वीकार करते समय अनुराग दनायक को गिरफ्तार किया गया।
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एफआईआर के अनुसार आरोपी अधिकारी ने कुल ₹15 लाख की रिश्वत मांगी थी। शिकायत में यह भी आरोप है कि फरवरी 2026 से एजेंट को मिलने वाले कमीशन का 60 प्रतिशत हिस्सा भी कथित तौर पर मांगा गया। शिकायतकर्ता के अनुसार व्हाट्सएप कॉल के माध्यम से कई बार संपर्क कर भुगतान का दबाव बनाया गया तथा कहा गया कि यदि रकम नहीं दी गई तो सर्विस एजेंट एग्रीमेंट का नवीनीकरण और नए सरकारी संस्थानों का आवंटन प्रभावित होगा। इन सभी आरोपों की जांच फिलहाल सीबीआई कर रही है।
गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने बेंगलुरु, नोएडा और जबलपुर स्थित परिसरों में तलाशी ली। एजेंसी के अनुसार लगभग ₹75 लाख नकद, विदेशी मुद्रा, लगभग 697 ग्राम सोना तथा संपत्ति से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए हैं। मामले की जांच भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जारी है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
पहले भी विवादों के केंद्र में रहा है KAPL| KAPL bribery case
KAPL का नाम पहली बार विवादों में नहीं आया है। पिछले कुछ वर्षों में कंपनी प्रशासन, अतिरिक्त प्रभार (Additional Charge), सर्विस एजेंट एवं C&F नियुक्तियों तथा प्रशासनिक निर्णयों को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। इन विवादों के केंद्र में सबसे अधिक चर्चा नीरजा श्रॉफ के कार्यकाल और उनके प्रशासनिक निर्णयों को लेकर हुई थी।
वर्ष 2024 में प्रकाशित विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नीरजा श्रॉफ, जो वर्ष 2016 से हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड (HAL) की प्रबंध निदेशक थीं, उन्हें क्रमशः राजस्थान ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (RDPL), इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (IDPL), बंगाल केमिकल एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (BCPL) तथा बाद में KAPL का भी अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। उस समय यह सवाल प्रमुखता से उठा कि क्या एक ही अधिकारी को एक साथ कई सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों का संचालन सौंपना प्रशासनिक दृष्टि से उचित था।
इसी दौरान हमारे मंच ने सबसे पहले नीरजा श्रॉफ के कार्यकाल से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों, अतिरिक्त प्रभार, सर्विस एजेंट एवं C&F नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी तथा कथित अनियमितताओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। हमारे पूर्व प्रकाशित लेखों में यह प्रश्न उठाया गया था कि एजेंटों की नियुक्ति, अनुबंधों के नवीनीकरण और वितरण व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। बाद में यही विषय विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक चर्चाओं का हिस्सा भी बने।
नीरजा श्रॉफ की कार्यशैली भी उस समय लगातार चर्चा में रही। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों तथा हमारे पूर्व प्रकाशित लेखों में यह उल्लेख किया गया था कि उनके कार्यकाल के दौरान हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड (HAL) और KAPL के कई वरिष्ठ अधिकारियों के निलंबन (Suspension) जैसे प्रशासनिक निर्णय भी सुर्खियों में रहे। इन कार्रवाइयों को लेकर प्रशासनिक हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इन्हें अनुशासन स्थापित करने की दिशा में उठाया गया कदम बताया, जबकि अन्य ने इन निर्णयों की प्रक्रिया, पारदर्शिता और प्रशासनिक शैली पर सवाल उठाए। इसी अवधि में सर्विस एजेंट एवं C&F नियुक्तियों, अनुबंधों के नवीनीकरण तथा वितरण व्यवस्था में कथित अनियमितताओं को लेकर भी लगातार प्रश्न उठते रहे।
आज अनुराग दनायक की गिरफ्तारी की खबर ने इन पुराने विवादों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालांकि नीरजा श्रॉफ से जुड़े प्रशासनिक विवाद और वर्तमान रिश्वत प्रकरण अलग-अलग प्रकृति के हैं, लेकिन दोनों घटनाओं ने सरकारी कंपनियों की कार्यप्रणाली, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
क्या व्यवस्था में सुधार की जरूरत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ऐसे में नियुक्तियों से लेकर खरीद प्रक्रिया, सर्विस एजेंट एवं C&F चयन, अनुबंधों के नवीनीकरण, दवा वितरण और प्रशासनिक निर्णयों तक प्रत्येक स्तर पर पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना आवश्यक है। केवल भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि ऐसी संस्थागत व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, डिजिटल, जवाबदेह और स्वतंत्र निगरानी के दायरे में हो।
फिलहाल अनुराग दनायक के विरुद्ध दर्ज मामला जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है तथा आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा। लेकिन यह प्रकरण एक बार फिर इस बहस को तेज कर गया है कि क्या सरकारी फार्मा कंपनियों में केवल अधिकारियों के बदलने से व्यवस्था सुधरेगी, या फिर नियुक्ति, अनुबंध, निगरानी और जवाबदेही की पूरी प्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। आने वाले समय में जांच एजेंसियों, सरकार और संबंधित मंत्रालयों की कार्रवाई इस बहस की दिशा तय करेगी।
































