Abhishek Banerjee News: पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहा तृणमूल कांग्रेस (TMC) का आंतरिक संकट अब राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। पार्टी के भीतर असंतोष और बगावत की खबरें पहले विधानसभा स्तर पर सामने आई थीं, लेकिन अब मामला सीधे संसद तक पहुंच गया है। दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के कई सांसदों ने पार्टी नेतृत्व से अलग रुख अपनाते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने का फैसला किया है।
इस घटनाक्रम ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं और राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। हालांकि पार्टी के आधिकारिक खेमे ने इन दावों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है, लेकिन बागी नेताओं के बयान लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं।
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NDA को समर्थन देने का दावा| Abhishek Banerjee News
टीएमसी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि पार्टी के लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने NDA का समर्थन करने का फैसला किया है। उनके मुताबिक इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भी भेजा जा चुका है। काकोली घोष ने कहा कि सांसदों के एक समूह ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया है और स्पीकर को इसकी जानकारी दे दी गई है। उनका कहना है कि यह फैसला जनता के जनादेश और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
वर्तमान में टीएमसी के पास लोकसभा में 28 सांसद हैं। संसदीय नियमों के अनुसार अलग गुट की मान्यता के लिए कम से कम 12 सांसदों का समर्थन जरूरी माना जाता है। ऐसे में यदि 20 सांसदों का दावा सही साबित होता है, तो यह पार्टी के लिए बड़ा झटका हो सकता है।
दिल्ली में हुई अहम मुलाकात
सूत्रों के अनुसार, सोमवार को टीएमसी के 14 लोकसभा सांसदों ने भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की। इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं। हालांकि इस बैठक के आधिकारिक एजेंडे को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन इसे टीएमसी के भीतर चल रहे असंतोष से जोड़कर देखा जा रहा है।
अभिषेक बनर्जी की जगह काकोली घोष?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बागी सांसद लोकसभा में अपने समूह का नेतृत्व काकोली घोष दस्तीदार को सौंपना चाहते हैं। वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी हैं। काकोली घोष ने दावा किया है कि वह अभी भी पार्टी की चीफ व्हिप हैं और उनके साथ कई सांसद खड़े हैं। उनका कहना है कि यह फैसला व्यापक चर्चा के बाद लिया गया है और इसका उद्देश्य राजनीतिक दिशा तय करना है।
विधानसभा से शुरू हुई थी बगावत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी के भीतर असंतोष की शुरुआत विधानसभा स्तर पर हुई थी। बताया जाता है कि जब ममता बनर्जी ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित किया, तब पार्टी के भीतर विरोध के स्वर उभरने लगे। इसके बाद एक बड़े विधायक समूह ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता घोषित किया। विधानसभा स्पीकर द्वारा उस गुट को मान्यता दिए जाने के बाद पार्टी के भीतर खींचतान और बढ़ गई। अब वही मॉडल दिल्ली में भी अपनाए जाने की चर्चा हो रही है।
काकोली घोष ने लगाए गंभीर आरोप
काकोली घोष दस्तीदार पहले भी पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा चुकी हैं। विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने बारासात जिला अध्यक्ष पद समेत कई संगठनात्मक जिम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने आरोप लगाया है कि पार्टी के भीतर फैसले एकतरफा तरीके से लिए जा रहे हैं और वरिष्ठ नेताओं की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें हटाने से उनकी संसदीय स्थिति स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
शर्मिला सरकार ने जताई नाराजगी
बागी खेमे की सांसद डॉ. शर्मिला सरकार ने भी पार्टी नेतृत्व पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि वह विकास की राजनीति का हिस्सा बनना चाहती हैं और पार्टी के भीतर फैले कथित भ्रष्टाचार से परेशान हैं। शर्मिला सरकार का कहना है कि पुराने नेताओं को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा था और संगठन के भीतर काफी समय से असंतोष का माहौल था। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व को कई मुद्दों पर रिपोर्ट भेजी थी, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
उनके अनुसार, फिलहाल उनके समूह के साथ लगभग 20 सांसद हैं और आने वाले समय में यह संख्या बढ़ भी सकती है।
TMC ने किया पलटवार
दूसरी ओर ममता बनर्जी समर्थक खेमे ने बागी नेताओं के दावों को चुनौती दी है। टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने पार्टी में किसी बड़े विभाजन से इनकार करते हुए कहा कि बागी सांसदों की संख्या 20 नहीं, बल्कि लगभग 13 है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पार्टी अभी भी एकजुट है और टूट की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
फिलहाल टीएमसी के भीतर चल रही यह खींचतान पश्चिम बंगाल की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन चुकी है। यदि आने वाले दिनों में बागी सांसदों के दावे मजबूत होते हैं, तो यह न केवल ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए चुनौती साबित हो सकता है, बल्कि संसद में विपक्षी राजनीति के समीकरणों पर भी असर डाल सकता है।





























