इस शहर से बापू ने शुरू किया छुआछूत के खिलाफ आंदोलन, जानिए कब क्या हुआ था?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 07 Jan 2022, 12:00 AM | Updated: 07 Jan 2022, 12:00 AM

महात्मा गांधी से जुड़ी कई यादें भारत के छत्तीसगढ़ में भी जुड़ी हुई हैं जब वो यहां दो दफा आए। इस बाबत यहां पर इस राज्य में कई ऐसी धरोहरें हैं जो गांधी जी के यहां आने की याद को जाता कर देती हैं लेकिन उनका यहां आना एक बड़े अहम जंग की भी याद दिलाता है।

महात्मा गांधी के द्वारा छत्तीसगढ़ में शुरू की गई छुआछूत के खिलाफ जंग। महात्मा गांधी रायपुर पंडित सुंदरलाल शर्मा के साथ आए वो तारीख थी 20 दिसंबर 1920 जब वो रेलवे स्टेशन पर उतरे। इस दौरान उनके साथ मौलाना शौकत अली भी थे जो कि खिलाफत आंदोलन के नेता थे। इसके बाद साल 1933 में दूसरी बार गांधीजी  छत्तीसगढ़ पहुंचे थे। गांधी जी की ये यात्रा कैसी थी और किस मायने से ये यात्रा काफी अहम साबित हुई थी चलिए जानते हैं इसके बारे में पूरे विस्तार से…

22 से 28 नवंबर 1933 तक महात्मा गांधी छत्तीसगढ़ रहे और इन्हीं दिनों 24 नवंबर को रायपुर के लारी स्कूल में एक जनसभा को उन्होंने संबोधित किया और फिर पंडित सुदरलाल शर्मा के चलाए गए सतनामी आश्रम का उन्होंने निरीक्षण किया और फिर मौदहापारा में उनका हरिजनों को संबोधन और फिर गांधी जी रायपुर की पुरानी बस्ती गए जहां के जैतिसाव मठ से छुआछूत के खिलाफ उन्होंने पूरे प्रदेश में जैसे एक जंग की ही शुरुआत कर दी और शुरू कर दिया लोगों को जागरूक करना।

आखिर इन दिनों गांधी जी संदेश क्या दिया? बापू ने रायपुर में एक सभा भी की और सर्वधर्म समभाव का उन्होंने लोगों को मंत्र भी दिया। उन्होंने छुआछूत को लेकर जो बातें कहीं उसका लोगों पर गहरा असर हुआ। उन्होंने कहा कि ईश्वर कभी छुआछूत करने वालों को माफ नहीं करते। आज भी जैतुसाव मंठ के मंदिर लोगों के लिए श्रद्धा का केन्द्र है ऐसे इस वजह से  क्योंकि महात्मा गांधी ने कई कुरुतियों को यहीं तोड़ा था।

इतना ही नहीं उन्होंने पास के एक कुएं से हरिजनों को पानी निकालने दिया और तो और उनके हाथ से लाया गया पानी भी सबको पिलाया। माना जाता है आज भी ये कुआं पवित्र कुंड जैसा है। इस राज्य में रहते हुए गांधी जी ने रायपुर के ब्राह्मणपारा में आनंद वाचनालय में वहां की महिलाओं को संदेश दिया।  तिलक स्वराज फंड में करीब करीब 2000 रुपये के गहने महिलाओं ने भेंट किए।

गांधी जी का ये दौरा हरिजनों के उत्थान के लिए था। दुर्ग में  घनश्याम गुप्त के यहां महात्मा गांधी रूके थे जहां पहुंचते ही गांधी जी का सवाल था कि आखिर दुर्ग में देखने के लिए क्या है जिसके जवाब में उस स्कूल के बारे में कहा कहा जहां साल 1926 से एक ही टाट पट्टी पर बैठकर सवर्ण और हरिजनों के बच्चे पढ रहे थे। दुर्ग के मोती बाग तालाब के मैदान में उसी दिन शाम को एक बहुत बड़ी जनसभा का आयोजन किया गया जिसमें दिए गए गांधी जी के संदेशों ने लोगों को खूब जागरूक किया। 

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