CEC पर महाभियोग का दांव फेल! आखिर किस संवैधानिक नियम ने बचा ली कुर्सी? | CEC Impeachment Motion

Nandani | Nedrick News New Delhi Published: 07 Apr 2026, 09:07 AM | Updated: 07 Apr 2026, 09:07 AM

CEC Impeachment Motion: भारतीय लोकतंत्र में पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश की गई, लेकिन यह प्रक्रिया अपने शुरुआती चरण में ही रुक गई। विपक्षी दलों, खासकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने की मुहिम शुरू की थी। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिससे यह मामला आगे नहीं बढ़ सका।

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लोकसभा अध्यक्ष ने क्यों ठुकराया प्रस्ताव | CEC Impeachment Motion

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जानकारी के मुताबिक, टीएमसी के नेतृत्व में लाए गए इस प्रस्ताव पर 130 से ज्यादा सांसदों के हस्ताक्षर थे। इसके बावजूद, यह नोटिस संवैधानिक और तकनीकी मानकों पर खरा नहीं उतर पाया। अध्यक्ष ने साफ कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिल है और इसके लिए मजबूत आधार जरूरी होता है, जो इस मामले में पर्याप्त नहीं पाया गया।

विपक्ष के आरोप क्या थे

टीएमसी ने 12 मार्च को करीब 10 पन्नों का नोटिस सौंपा था, जिसमें सात बड़े आरोप लगाए गए थे। इनमें बिहार की एसआईआर (SIR) प्रक्रिया में गड़बड़ी और लोगों के वोटिंग अधिकार प्रभावित होने जैसे मुद्दे शामिल थे। विपक्ष का कहना था कि चुनाव आयोग ने कुछ राजनीतिक दलों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देकर आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए।

संविधान ने कैसे दी सुरक्षा

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया आसान नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत उन्हें वही सुरक्षा मिलती है, जो सुप्रीम कोर्ट के जज को मिलती है। यानी उन्हें हटाने के लिए ‘सिद्ध कदाचार’ (प्रमाणित गलत आचरण) या ‘अक्षमता’ साबित करना जरूरी होता है। जांच में पाया गया कि विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोप इन मानकों को पूरा नहीं कर पाए। यही वजह रही कि प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

1968 का कानून बना निर्णायक

इस पूरे मामले में जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3 अहम साबित हुई। इस कानून के तहत लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को यह अधिकार है कि वे ऐसे नोटिस की प्रारंभिक जांच करें और तय करें कि उसे स्वीकार किया जाए या नहीं। अधिकारियों ने नोटिस की गहराई से जांच की और पाया कि आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत नहीं हैं। इसी आधार पर प्रस्ताव को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।

ऐतिहासिक लेकिन अधूरा प्रयास

भारत के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश हुई। कुल मिलाकर 193 सांसदों के हस्ताक्षरों के जरिए दबाव बनाने का प्रयास किया गया था। हालांकि, संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था के प्रमुख को हटाने के लिए बेहद ठोस और स्पष्ट प्रमाण जरूरी होते हैं, जो इस मामले में सामने नहीं आए।

आगे क्या?

इस घटनाक्रम के बाद साफ हो गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को हटाने की प्रक्रिया बेहद सख्त और नियमों से बंधी होती है। फिलहाल यह मामला यहीं थम गया है, लेकिन इससे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी स्वतंत्रता पर बहस जरूर तेज हो गई है।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

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