Guru Nanak dev ji spiritual journeys: ये तो हर सिख जानता है कि सिख धर्म की स्थापना करने के बाद सिखो के प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी साल 1500 में दुनिया की यात्रा पर निकले थे, और उनके साथ उनके परम मित्र भाई मरदाना भी थे। करीब 24 साल तक उन्होंने ये यात्राएं की थी, जिन्हें सिख धर्म में उदासियां कहा जाता है। 24 सालों में गुरु साहिब ने 4 उदासियां की थी जिसमें पहली उदासी साल 1500- से लेकर 1506 ई. तक कि थी जिसमें वो पूर्व दिशा की यात्रा पर गए थे, इस यात्रा में उन्होंने नानकमता और कामरूप का भ्रमण कर अंधविश्वास और छुआछूत को खत्म करने की दिशा में लोगों को जागरूक किया था।
दूसरी उदासी 1506 से लेकर 1513 ई. तक किया था जिसमें वो दक्षिण दिशा में गए थे तब गुरूबसाहिब ने एक ओंकार का संदेश देते हुए भक्ति का संदेश दिया। था, तीसरी उदासी 1514 से 1518 ई तक किया था जिसमें वो उत्तर दिशा में हिमालय की तरफ गए थे और चौथी उदासी 1519 से 1521 ई. तक की थी, जिसमें वो पश्चिम दिशा में गए थे। तब वो इस्लामिक देश मक्का, मदीना और बगदाद गए थे और वहां भाईचारे और मानवता का संदेश दिया, लेकिन क्या आप ये जानते है कि ये तो केवल वो जानकारी है जिसके बारे में लगभग सभी जगह बात होती है लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि गुरु नानक देव जी उस वक्त केवल पृथ्वी की थी नहीं बल्कि कई लोकों की यात्रा पर गए थे। अपने इस लेख में हम बात करेंगे कि पृथ्वी लोक के अलावा गुरु नानक देव और भाई मरदाना जी किन किन लोकों में भी गए थे। और वहां जाकर उन्हें क्या ज्ञान प्राप्त हुआ।
इन यात्रा के दौरान गुरु साहिब सबसे पहले प्रहलाद पूरी गए थे। उसके बाद शिवपुरी गए, फिर श्रम खंड होते हुए कर्म खंड गए थे, और फिर सचखंड गए थे। धरती की यात्रा के साथ साथ वो प्रकृति के इन अलग अलग रचनाओं , अलग अलग लोको को देख कर भावविभोर हो उठे थे। इन लोको को देख कर भाई मरदाना ने गुरु साहिब से कहा कि उन्होंने अभी तक कई लोक देख लिए और वो ये समझ पाए कि इन लोको का कोई अंत नहीं है। भाई मरदाना ने गुरु साहिब के आगे सिर झुकाते हुए कहा कि महाराज आपने ये कैसा ब्रह्मांड बनाया, अपने कितनी खूबसूरत संरचना बनाई।
केवल आपके एक इशारे में सब कुछ आपके अनुसार, अपनी उंगलियों पर चलता है। जैसा आप चाहते हो, आप नचाते हो। यानी कि ये कथन बताता है व्यक्ति एक लोक में रहता है और धन संपदा शरीर पर अहंकार करता है, मान के चलता है कि वो ही महान है सर्वोपरि है, लेकिन सच्चाई तो ये है कि उस निरंकार ईश्वर के आगे व्यक्ति धूल के एक कण के बराबर भर भी नहीं है।
अगर अपने सिख धर्म के बारे में जाना या समझा है तो आपको ये जरूर पता होगा कि गुरु नानक साहिब अपने शरीर के साथ ही सचखंड गए थे जिन्हें लेने के लिए खुद ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं के राजा इंद्र लेने आए थे। जबकि हमेशा अपने सुना होगा कि कोई भी व्यक्ति शरीर के साथ सचखंड नहीं जा सकता है लेकिन प्रथम गुरु गए थे, इससे आप उनकी महानता, उनकी आध्यात्मिकता की शक्ति का अंदाजा लगा सकते है। उनके साथ साएं की तरह रहने वाले भाई मरदाना ने सिख धर्म को स्थापित करने और एक महान धर्म बनाने में गुरु साहिब का साथ दिया।
कहते है न जब आप बगीचे में काम करते है तो खुशबू खुद अपने आ जाती है, बस गुरु साहिब के सानिध्य ने भाई मरदाना जी को महान बनाया, आध्यात्मिकता के करीब पहुंचाया। इतना ही नहीं उन्हें गुरु साहिब की कृपा से उन लोकों के भी दर्शन हुए जो के बारे में शायद उन्होंने सोचा भी नहीं होगा। गुरु साहिब से जुड़ा ये सत्य बहुत कम लोग जानते है। गुरु साहिब को सिख धर्म को स्थापित करने के लिये पुजा जाता है लेकिन जब आप उन्हें करीब से जानेंगे तो पाएंगे कि गुरु साहिब ने कभी नहीं कहा कि वो परमेश्वर है, उन्होंने सदैव कहा कि वो परमेश्वर के दूत है, लेकिन उनके किए गए कार्यों ने उन्हें आज सिखो के लिए परमेश्वर बना दिया। जैसे जैसे आप गुरु साहिब को जानते है, आपका सिर खुद उनके लिए सम्मान से झुक जाता है। आपको अहसास होता है कि ऐसे महान व्यक्ति के स्थापित धर्म भी कितना महान होगा।






























