Kawad Yatra 2025: कांवड़ यात्रा में यूपी सरकार का बड़ा कदम, मांसाहारी बिक्री पर रोक और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 07 Jul 2025, 12:00 AM | Updated: 07 Jul 2025, 12:00 AM

Kawad Yatra 2025: सावन का महीना आते ही देशभर में एक खास उत्साह और धार्मिक खुमारी छा जाती है, जो कांवड़ यात्रा के आगमन के साथ और भी गहरी हो जाती है। यह यात्रा न सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि शिवभक्तों के लिए साल का सबसे बड़ा और पवित्र पर्व भी है। इस साल कांवड़ यात्रा 11 जुलाई 2025 से शुरू होने वाली है, और लाखों शिव भक्तों के लिए यह एक नये उत्साह और जोश का समय है। वहीं, कांवड़ यात्रा को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम कदम उठाया है, जिसने अब विवाद को जन्म दे दिया है।

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यूपी में कांवड़ यात्रा को लेकर विवाद- Kawad Yatra 2025

उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार ने खाद्य और दुकानदारों के मानकों को लेकर कड़े निर्देश जारी किए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कांवड़ यात्रा मार्गों पर साफ-सफाई, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और खाद्य मिलावट को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। इसके तहत कांवड़ यात्रा के मार्गों पर खुले में मांसाहारी भोजन की बिक्री पर सख्त रोक है और सभी विक्रेताओं को अपने नाम, पते और मोबाइल नंबर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने का आदेश दिया गया है। इसी के साथ, खाद्य वस्तुओं की कीमतें तय की जाएंगी ताकि श्रद्धालुओं से मनमानी वसूली न हो।

हालांकि, इस फैसले को लेकर राज्य में राजनीतिक और कानूनी विवाद भी छिड़ गए हैं। यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने योगी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि कांवड़ यात्रा पर यह कड़े फैसले सिर्फ एक राजनीतिक खेल हैं और आस्था का सम्मान नहीं किया जा रहा है। वहीं, कांवड़ यात्रा मार्ग पर पहचान अभियान चलाने वाले स्वामी यशवीर जी महाराज के नेतृत्व में मुजफ्फरनगर में एक ढाबे पर कर्मचारियों की पहचान को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया। यह हंगामा तब हुआ जब एक टीम ने पंडित जी वैष्णो ढाबे पर जाकर कर्मचारियों से आधार कार्ड मांगे, और इसमें कई सवाल उठाए गए।

कांवड़ यात्रा की धार्मिक महत्व

वहीं, कांवड़ यात्रा, जो खासकर सावन के महीने में होती है, शिव भक्तों के लिए धार्मिक आस्था का प्रतीक मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन से विष निकला था, तो भगवान शिव ने उसे पी लिया था। इस विष के प्रभाव को कम करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर गंगाजल अर्पित किया था। तभी से सावन के महीने में शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। इसके अतिरिक्त, परशुराम जी को प्रथम कांवड़िया माना जाता है, जिन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर महादेव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया था। त्रेतायुग में श्रवण कुमार द्वारा अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थयात्रा कराने की कथा भी प्रचलित है, जिससे इस यात्रा को ‘कांवड़’ नाम मिला।

यात्रा की तिथि और रास्ते

कांवड़ यात्रा की शुरुआत 11 जुलाई को, सावन कृष्ण प्रतिपदा से होगी और 23 जुलाई को शिवरात्रि के दिन समाप्त होगी। इस साल यात्रा का समापन जलाभिषेक के साथ होगा, जो भक्तों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यात्रा के दौरान मुख्य तौर पर हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री जैसे पवित्र स्थानों से गंगाजल लाकर इसे शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है। यह यात्रा पूरे 13 दिन चलती है और इस दौरान लाखों लोग न केवल गंगाजल लाते हैं, बल्कि अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए इस यात्रा को एक संकल्प के रूप में लेते हैं।

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