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Surajbhan Singh Story: AK-47, गोली और गाय: बिहार की सियासत में सूरजभान सिंह की जान बचाने वाली दिलचस्प कहानी 

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 02 Jul 2025, 12:00 AM | Updated: 02 Jul 2025, 12:00 AM

Surajbhan Singh Story: बिहार में चुनावी बयार फिर से बहने लगी है और इस बार भी बाहुबलियों की भूमिका चर्चा का केंद्र बनी हुई है। बिहार की सियासत में बाहुबलियों का असर हमेशा से ही गहरा रहा है, और जब बात मोकामा के पूर्व सांसद सूरजभान सिंह की होती है, तो यह नाम बिना कहे ही सामने आ जाता है। सूरजभान सिंह ने AK-47 की गूंज के बीच राजनीति में कदम रखा और विधानसभा से लेकर संसद तक का सफर तय किया। लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा महज एक चुनावी कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बिहार की कहानी है जहां गोली चलने पर सरकारें भी हिल जाया करती थीं। यह किस्सा इस बार फिर ताजा हो गया, जब हम जानेंगे कि कैसे एक गाय ने AK-47 की गोलियों से सूरजभान सिंह की जान बचा ली।

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मोकामा में AK-47 की गोलियों से बची जान- Surajbhan Singh Story

1993 में मोकामा के रेलवे और ठेकेदारी के साम्राज्य पर वर्चस्व को लेकर सूरजभान सिंह और बेगूसराय के कुख्यात बाहुबली अशोक सम्राट के बीच संघर्ष शुरू हुआ था। एक दिन अशोक सम्राट ने सूरजभान सिंह पर AK-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। यह घटना उस समय मोकामा की तीसरी मंजिल से शुरू हुई थी। सूरजभान सिंह को पैर में गोली लगी, लेकिन उनकी जान बची। किसी फिल्मी सीन की तरह, एक गाय अचानक उस गोली के रास्ते में आ गई और सूरजभान सिंह को मौत से बचा लिया। वह गाय सूरजभान और मौत के बीच एक ‘ढाल’ बन गई। हालांकि, सूरजभान सिंह के पैर में लगी गोली आज भी उन्हें तकलीफ देती है और बीते 30 सालों से उनका पैर खून बहा रहा है।

राजनीति में कदम और नीतीश कुमार का समर्थन

1980 के दशक में छोटे-मोटे अपराधों से शुरुआत करने वाले सूरजभान सिंह 1990 तक रंगदारी, अपहरण और हत्या जैसे मामलों के प्रमुख किरदार बन चुके थे। लेकिन 2000 में उन्होंने मोकामा से निर्दलीय विधायक के रूप में चुनाव लड़ा और दिलीप सिंह को हराकर जीत हासिल की। इस चुनाव ने बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ दिया और सूरजभान सिंह ने नीतीश कुमार को समर्थन देकर उन्हें पहली बार मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया।

रामविलास पासवान से नाता और बढ़ती राजनीति

सूरजभान सिंह की राजनीतिक यात्रा में एक अहम मोड़ तब आया जब वे लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के विश्वासपात्र बने। 2004 में वे बेगूसराय के बलिया से लोकसभा पहुंचे और पासवान ने उन्हें LJP का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी वीणा देवी और भाई चंदन सिंह को भी राजनीति में उतारा और उन्हें जीत दिलवायी। सूरजभान सिंह का नेटवर्क बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैल चुका था, और उनका प्रभाव हर पार्टी ने महसूस किया।

मोकामा की सियासत: आज भी सक्रिय

हालांकि, 2025 के विधानसभा चुनाव में सूरजभान सिंह खुद मैदान में नहीं हैं, लेकिन उनके परिवार के सदस्य वीणा देवी और चंदन सिंह अब भी एनडीए में सक्रिय हैं। हाल ही में, सूरजभान सिंह ने मोकामा में अनंत सिंह पर हमला बोलते हुए ‘इतिहास, भूगोल और गणित बदलने’ की धमकी दी, जिससे सियासी गलियारों में हलचल मच गई। रJD ने शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा और पत्नी हिना शहाब को पार्टी में शामिल किया है, वहीं अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी और बेटे चेतन आनंद भी मैदान में हैं।

बाहुबली राजनीति: एक नया दौर?

बिहार की सियासत में बाहुबलियों का प्रभाव अब भी खत्म नहीं हुआ है। हालाँकि, यह प्रभाव पहले के मुकाबले थोड़ा कमजोर हुआ है, फिर भी बाहुबलियों का खेल अब भी जारी है। यह लड़ाई अब भी लोकतंत्र और AK-47 के बीच जारी है। बिहार के आगामी चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मतदाता इस बार बंदूक के बजाय बैलट पर ज्यादा भरोसा करेंगे, या फिर बाहुबलियों का दबदबा कायम रहेगा। इस बार, सियासी गलियों में AK-47 और गाय वाला किस्सा फिर से हवा में तैरने वाला है, जो बिहार की राजनीति के अनछुए पहलुओं को उजागर करता है।

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