India-US Trade Deal: भारत ने दिखाई सख्ती, ट्रंप की बढ़ीं मुश्किलें! 9 जुलाई की डेडलाइन से पहले पूरा गेम कैसे पलट गया?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 27 Jun 2025, 12:00 AM | Updated: 27 Jun 2025, 12:00 AM

India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता एक अहम मोड़ पर पहुंच चुकी है। 9 जुलाई की डेडलाइन से पहले कोई स्पष्ट समझौता होने की उम्मीद कम होती जा रही है, क्योंकि दोनों देशों के बीच मुख्य असहमति के मुद्दे अब तक हल नहीं हो पाए हैं। इन मुद्दों में प्रमुख रूप से ऑटो पार्ट्स, स्टील और कृषि उत्पादों जैसे सोयाबीन, मक्का, गेहूं, इथेनॉल और डेयरी उत्पादों पर आयात शुल्क को लेकर खींचतान जारी है। अमेरिका इन उत्पादों पर भारत से आयात शुल्क कम करने की मांग कर रहा है, जबकि भारत इन मुद्दों पर अपनी घरेलू प्राथमिकताओं और नीतियों को सुरक्षित रखना चाहता है।

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अमेरिका की मांग और भारत का रुख– India-US Trade Deal

अमेरिका ने भारत से अपनी कृषि उत्पादों पर शुल्क में और कटौती करने की मांग की है। साथ ही, गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने की बात भी कही है। वहीं, भारत का रुख यह है कि वह अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को बचाए रखना चाहता है। भारतीय अधिकारी स्पष्ट कर चुके हैं कि वह किसी भी समझौते पर तभी हस्ताक्षर करेंगे जब उनकी अपेक्षाएं पूरी होंगी। इस स्थिति ने अमेरिका के लिए परेशानी खड़ी कर दी है, क्योंकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चीन के साथ व्यापार टैरिफ के मुद्दे पर निपट चुके हैं और अब वह भारत से भी समझौते की उम्मीद कर रहे हैं।

अमेरिकी पक्ष के साथ असहमति

अमेरिका चाहता है कि भारत सोयाबीन, मक्का, कारों और शराब जैसे कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में और कटौती करे, और साथ ही कुछ गैर-टैरिफ बाधाओं को भी समाप्त करे। लेकिन भारतीय अधिकारियों ने इन मांगों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है। रॉयटर्स द्वारा प्राप्त सूत्रों के अनुसार, इन मुद्दों पर दोनों देशों के वार्ताकारों के बीच अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है, जिससे 9 जुलाई की डेडलाइन के भीतर किसी समझौते की संभावना कम होती जा रही है।

भारत का संतुलित दृष्टिकोण

भारत ने अमेरिका से अपनी मांगों को पूरा करने के लिए सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन वह किसी भी कीमत पर अपनी नीतियों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। भारतीय अधिकारी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका व्यापार समझौता दीर्घकालिक हो और दोनों देशों के लिए लाभकारी हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को अमेरिका के एक प्रमुख आर्थिक साझेदार के रूप में स्थापित करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं, और वे चीन से आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव के लिए अमेरिकी कंपनियों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, व्यापार वार्ता में अब तक धीमी प्रगति देखने को मिली है।

साझेदारी का दीर्घकालिक दृष्टिकोण

भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को 2025 तक पूरा करने और 2030 तक व्यापार को लगभग 191 अरब डॉलर से बढ़ाकर 500 अरब डॉलर करने पर सहमति पहले ही हो चुकी है। भारत इस साल यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर भी बातचीत कर रहा है, और ब्रिटेन के साथ FTA पर बातचीत पूरी कर चुका है। यह कदम ट्रंप के तहत संभावित अमेरिकी नीतिगत बदलावों से बचने के लिए उठाया गया है।

भारत का ठोस रुख

राम सिंह, जो भारतीय विदेश व्यापार संस्थान के प्रमुख हैं, ने कहा कि भारत किसी भी ‘विन-लॉस’ व्यापार साझेदारी के लिए तैयार नहीं है। उनका कहना था कि अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत अपनी स्वतंत्र नीतियों को बनाए रखते हुए ही व्यापार समझौते करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सबसे खराब स्थिति में भी भारत जवाबी शुल्क के प्रभाव को झेल सकता है, क्योंकि वियतनाम और चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों पर उसे अभी भी टैरिफ का फायदा है।

निर्यात में वृद्धि

भारत का अमेरिका के प्रति निर्यात अप्रैल-मई में बढ़कर 17.25 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले साल की इसी अवधि में 14.17 अरब डॉलर था। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए 10% टैरिफ बढ़ोतरी का भारतीय निर्यात पर सीमित प्रभाव पड़ा है।

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