IIT hub Bihar: पटवा टोली नाम का वो गांव जो हर साल पैदा करता है ‘तोप’ इंजीनियर

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 16 Jun 2025, 12:00 AM | Updated: 16 Jun 2025, 12:00 AM

IIT hub Bihar: बिहार के गयाजी जिले स्थित पटवा टोली को ‘आईआईटीयन विलेज’ के नाम से जाना जाता है। इस छोटे से गांव से हर साल बड़ी संख्या में छात्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और अन्य प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला प्राप्त करते हैं। इस साल भी पटवा टोली से 12 छात्रों का चयन आईआईटी के लिए हुआ है, जो इस गांव की शिक्षा की उत्कृष्टता और सफलता को दर्शाता है। लेकिन यह सवाल अक्सर उठता है कि इस गांव से इतनी बड़ी संख्या में छात्र आईआईटी में कैसे चयनित हो जाते हैं? आइए जानें इस सफलता की कहानी।

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‘मैनचेस्टर ऑफ बिहार’ से आईआईटी तक का सफर- IIT hub Bihar

पटवा टोली गांव मानपुर प्रखंड के अंतर्गत आता है और एक समय था जब इसे ‘मैनचेस्टर ऑफ बिहार’ कहा जाता था। यहां के वस्त्र उद्योग ने इस जगह को पहचान दिलाई थी। गांव में 10,000 से अधिक पावरलूम और 300 से ज्यादा हैंडलूम चलाए जाते हैं, जो देश के विभिन्न हिस्सों में धोती, गमछा, बेड शीट और साड़ी भेजते हैं। पावरलूम की आवाज़ के बीच गांव में एक अलग ही ऊर्जा का संचार होता था। हालांकि, यह उद्योग और इसके साथ जुड़ी चुनौतियां कभी छात्रों के लिए कठिनाई का कारण बनती थीं, लेकिन इसके बावजूद यहां की शिक्षा में एक अलग ही दिशा और लगन देखने को मिलती है।

1991 से आईआईटी का सिलसिला शुरू हुआ

पटवा टोली से आईआईटी का सफर 1991 में एक छात्र, जितेंद्र प्रसाद के चयन से शुरू हुआ था। उनके बाद, गांव में इंजीनियरिंग और आईआईटी के प्रति एक नई रुचि पैदा हुई। जितेंद्र के चयन ने गांव के बच्चों को यह दिखाया कि यह संभव है, और इसके बाद से हर साल कुछ न कुछ छात्र आईआईटी में दाखिला पाने में सफल हुए। यहां के बच्चे जब भी घर लौटते हैं, तो वे अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं और उन्हें सही दिशा दिखाने का काम करते हैं।

वृक्ष-बी द चेंज संस्था: सफलता का एक नया मार्ग

पटवा टोली में बच्चों के लिए एक और मील का पत्थर साबित हुआ, जब ‘वृक्ष-बी द चेंज’ नामक संस्था की शुरुआत हुई। इस संस्था ने बच्चों को नि:शुल्क इंजीनियरिंग की तैयारी कराई, जिससे छात्रों को शांतिपूर्ण माहौल में पढ़ाई करने का अवसर मिला। पहले जहां बच्चों को पावरलूम की आवाज़ के बीच पढ़ाई करनी पड़ती थी, अब वे एक बेहतर और शांत वातावरण में अपनी तैयारी कर सकते थे। इस संस्था में बच्चों को ई-लाइब्रेरी मॉडल उपलब्ध कराया गया, जहां वे आत्मनिर्भर होकर पढ़ाई कर सकते थे।

सीनियर छात्रों का मार्गदर्शन: सफलता की कुंजी

एक और महत्वपूर्ण पहलू जिसने इस गांव की सफलता को बढ़ाया, वह है सीनियर छात्रों का जूनियर छात्रों को मार्गदर्शन देना। जब राज्य और देश के सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों में गर्मी की छुट्टियां होती हैं, तो पटवा टोली के कई इंजीनियरिंग छात्र अपने घर लौटते हैं। ये छात्र अपनी छुट्टियों का उपयोग जूनियर बच्चों को कठिन सवालों के हल के लिए मार्गदर्शन देने में करते हैं। वे अपनी यात्रा के अनुभव को साझा करते हैं और बच्चों को कठिन विषयों और सवालों को हल करने में मदद करते हैं। एनआईटी कॉलेज के छात्र रूपम कुमार और सूरज कुमार, जो इस संस्था से पढ़कर इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचे हैं, इन दिनों छुट्टियों में जूनियर बच्चों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

समाज की मदद से शिक्षा का नया चेहरा

पटवा टोली की यह सफलता सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि यह एक समाज की ताकत का प्रतीक है, जो शिक्षा को प्राथमिकता देता है और एक दूसरे की मदद से बड़ी सफलता की ओर बढ़ता है। बच्चों की मेहनत और सीनियर छात्रों के मार्गदर्शन ने पटवा टोली को आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हर साल नाम कमाने वाला गांव बना दिया है।

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