Film Phule Boycott: फुले फिल्म पर बायकॉट का बवंडर! क्या जातिवाद के खिलाफ आवाज़ दबाई जा रही है?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 24 अप्रैल 2025, 05:30 AM Updated: 24 अप्रैल 2025, 05:30 AM
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Film Phule Boycott: हाल ही में बॉलीवुड की फिल्म फुले को लेकर जबरदस्त विवाद खड़ा हो गया है। ब्राह्मण रक्षा मंच ने फिल्म के खिलाफ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और फिल्म में ब्राह्मणों और पंडितों के चरित्र को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने मांग की कि फिल्म को तत्काल रोका जाए। इस विवाद के केंद्र में फिल्म का निर्देशक अनंत महादेवन और निर्माता अनुराग कश्यप हैं, जिनकी फिल्म जाति और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ सामाजिक न्याय की लड़ाई को चित्रित करती है। लेकिन क्या इस फिल्म को बैन करने का प्रस्ताव सही है? क्या ब्राह्मणों के अपमान की बात सच है, या यह फिल्म एक आवश्यक सामाजिक मुद्दे को उजागर कर रही है?

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फिल्म के उद्देश्य और विवाद का आधार- Film Phule Boycott

फुले फिल्म का उद्देश्य 19वीं सदी के भारत में शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले के संघर्ष को चित्रित करना है। यह फिल्म उनके द्वारा स्थापित पहले स्कूल, जिसमें उन्होंने लड़कियों के लिए शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया, की कहानी बताती है। फिल्म में प्रतीक गांधी ने ज्योतिराव फुले का और पत्रलेखा ने सावित्रीबाई फुले का किरदार निभाया है। निर्देशक अनंत महादेवन ने इस फिल्म को समाज सुधारकों को सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में पेश किया है।

फिल्म के खिलाफ आपत्ति उठाने वालों का कहना है कि फिल्म में ब्राह्मणों को विलेन के रूप में पेश किया गया है, जो एक ऐतिहासिक सत्य को विकृत करता है। उन्होंने सेंसर बोर्ड से फिल्म को रोका जाने की अपील की, और फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप से माफी की मांग की। यह विवाद विशेष रूप से तब उभरकर सामने आया जब अनुराग कश्यप ने सोशल मीडिया पर ब्राह्मणों को लेकर विवादित बयान दिया था, जिससे ब्राह्मण समाज में गुस्सा फैल गया था। लोगों का कहना है कि कश्यप ने ब्राह्मणों पर पेशाब करने जैसी बातें कही हैं, जो कि बहुत गलत है।

 

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फिल्म की आलोचनाओं का जवाब

इसमें कोई संदेह नहीं कि फुले फिल्म सामाजिक सुधार के एक बड़े कार्य को उजागर करती है, जो महात्मा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई के योगदान को प्रदर्शित करती है। उनकी लड़ाई का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से जातिवाद और धार्मिक भेदभाव को खत्म करना था। अगर हम आज भी समाज में जातिवाद को देखें, तो यह फिल्म समाज में जागरूकता लाने की एक कोशिश के रूप में सामने आती है।

ब्राह्मणों द्वारा उठाए गए विरोध को लेकर यह सवाल उठता है कि क्या यह फिल्म उनके खिलाफ भड़काऊ है? फिल्म के निर्माता और निर्देशक का कहना है कि उन्होंने किसी भी समुदाय को बदनाम करने का इरादा नहीं रखा, बल्कि उन्होंने केवल ऐतिहासिक सच्चाई को पर्दे पर लाने की कोशिश की है। फिल्म में ब्राह्मणों का चित्रण एक निश्चित ऐतिहासिक संदर्भ में किया गया है, जब समाज में उच्च जातियों द्वारा शोषण और भेदभाव की घटनाएं प्रचलित थीं।

सेंसर बोर्ड की भूमिका पर सवाल

सेंसर बोर्ड का यह निर्णय कि फिल्म में कुछ शब्दों और संवादों को बदलने के लिए कहा जाए, यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। फुले फिल्म को सेंसर बोर्ड से पहले बदलावों के लिए कहा गया था, जैसे कि मांग‘, ‘महार‘, और पेशवाईजैसे जातीय संदर्भ वाले शब्दों को हटाने का सुझाव दिया गया। इस बदलाव को लेकर कई सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाया है कि क्या सेंसर बोर्ड पक्षपाती तरीके से काम कर रहा है, क्योंकि फिल्मों की छंटाई केवल इस फिल्म तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

सेंसर बोर्ड द्वारा की गई यह छंटाई फुले के विचारों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़ा करती है। महात्मा फुले ने जब जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई, तो उन्हें व्यापक विरोध और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इस फिल्म के साथ भी कुछ वैसा ही हो रहा है, जहां फिल्म की ऐतिहासिक सटीकता को बदलने के प्रयास किए जा रहे हैं।

कलात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन

यह सवाल उठता है कि क्या यह फिल्म समाज में जागरूकता और बदलाव लाने के उद्देश्य से बनाई गई है, या फिर इसे सिर्फ एक राजनीतिक बयान के रूप में देखा जा रहा है। महात्मा फुले का कार्य कभी भी आसान नहीं था। उन्होंने समाज के शोषित वर्गों के लिए लड़ाई लड़ी, और अपनी पत्नी सावित्रीबाई को एक शिक्षिका के रूप में स्थापित किया। फुले ने जातिवाद और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ जमकर संघर्ष किया और इसके लिए उन्हें समाज से अलगाव और कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

फिल्म फुले न केवल इस संघर्ष को दिखाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे शिक्षा के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है। यह फिल्म एक प्रेरणा है उन लोगों के लिए जो आज भी जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।

चाहे फिल्म को रिलीज़ किया जाए या फिर उस पर रोक लगाई जाए, यह तय है कि फुले हमारे सामाजिक इतिहास का आईना बनकर जातिवाद और सामाजिक सुधार के संघर्ष को उजागर कर रही है।

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