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जब बाल गंगाधर तिलक ने की थी किसानों को जेल भेजने की मांग

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 09 Oct 2023, 12:00 AM | Updated: 09 Oct 2023, 12:00 AM

क्या आप जानते है कि भारत में 1874-79 के बीच पड़े भयंकर अकाल पड़ा था, जिसकी मर किसानों पर सबसे ज्यादा पड़ी थी. किसानों की फासले भी खराब हुई और उन्हें ज्यादा कर्ज भी देना था. उस समय किसानो की यह हालात हो गयी थी कि 10 से 20 रुपए का लगान देने वाले किसानों पर सूदखोरों का क़र्ज़ बढ़कर 1000 से 2000 रुपए तक पहुँच गया था. जिसके चलते अकाल की मार झेल चुके किसानों को राहत देने के लिए एक बिल लाया गया था. यह बिल ‘डेक्कन एग्रीकल्चरिस्ट्स रिलीफ़ बिल’ किसानो के लिए लाया गया था, जिसका ड्राफ्ट महादेव गोविंद रानाडे और विलियम वेडरबर्न ने तैयार किया था. रानाडे को उस समय के ऐसे व्यक्तियों में गिना जाता था, जिनका मानना था कि देख के विकास के लिए देश के किसानो और महिलाओं का सशक्तिकरण बहुत जरूरी है. इन्होने हमेशा महिलाओं की शिक्षा और किसानों के विकास को बदावा दिया है. बाद में रानाडे को बाबा साहेब ने भी बहुत माना था. लेकिन उसी समय हमारे देश में कुछ ऐसे भी व्यक्ति थे, जो रानाडे का जमकर विरोध कर रहे थे.

दोस्तों, आईये आज हम आपको बतायेंगे कि रानाडे का विरोध किसने किया ? और बाल गंगाधर तिलक ने किसानों को जेल भेजने की मांग क्यों कि ?

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बाल गंगाधर तिलक ने की थी किसानों को जेल भेजने की मांग

हम आपको बता दे कि बाल गंगाधर तिलक ने हमेशा से ही महिलाओं की शिक्षा का विरोध, वर्ण व्यवस्था का समर्थन और किसानों का विरोध किया है. 1881 से उनकी पत्रकारिता का करियर भी इन्ही मुद्दों के विरोधाभास से शुरू हुआ था.

यह बात जब कि है तब 1874-79 के बीच पड़े भयंकर अकाल के बाद भारी कर्जे के निचे दबे किसानों ने सूदखोरो के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन छेड दिया था, जिसके समर्थन में दौलतिया रामोशी, बाबाजी चमार, सखाराम महार और कोदू मांग जैसे अछूत और आदवासी लोग थे. इस आन्दोलन के चलते सरकार ने इस आन्दोलन के मुखिया फड़के को जेल में भेज दिया था, जहाँ उनकी मौत हो गयी थी. उस समय के सारे बड़े बड़े व्यक्ति इस आन्दोलन में किसानो के साथ थे. लेकिन तिलक अपने अखबारों में लगातार किसानो का विरोध कर रहा था. तिलक ने कई बार अपने अख़बार में किसानो के लिखाफ लिखा और जो किसान कर्ज नहीं चुका सकते उन्हें जेल भेजने की बात भी कही थी.

तिलक ने किया रानाडे का विरोध

“द महरट्टा” कोई कॉर्पोरेट अख़बार नहीं था बल्कि यह अख़बार तिलक का था, जिसमे उसने लगातार किसानो का विरोध किया था, साथ ही रानाडे द्वारा लाये गए बिल का भी विरोध किया था.  रानाडे ने बिल के बाद किसानो को ऐसी हालात का सामना फिर न करना पड़े इसीलिए उनके लिए बैंको का भी निर्माण करवा दिया था, लेकिन तिलक ने अपने अखबारों में रानाडे के कामों का जानकर विरोध किया और साथ ही सूदखोरो को “काश्तकारों का भगवान” कहने वाले तिलक ने कहा कि जो भी सूदखोरो को के कर्ज के पैसे नहीं लौटा रहे उन्हें जेल भेज देना चाहिए.

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