Ukraine Poland Split: रूस के साथ जारी युद्ध के बीच यूक्रेन को एक नया कूटनीतिक झटका लगा है। इस बार विवाद किसी सैन्य मोर्चे या आर्थिक सहायता को लेकर नहीं, बल्कि इतिहास से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर खड़ा हुआ है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और पोलैंड के बीच बढ़ते तनाव ने दोनों देशों के रिश्तों को मुश्किल दौर में ला खड़ा किया है। हालात इतने बिगड़ गए कि जेलेंस्की ने पोलैंड का सर्वोच्च नागरिक सम्मान वापस भेज दिया, जबकि पोलैंड की ओर से भी कड़े संदेश दिए गए हैं।
सम्मान लौटाने से बढ़ा विवाद| Ukraine Poland Split
दोनों देशों के बीच ताजा विवाद तब सुर्खियों में आया जब जेलेंस्की ने पोलैंड के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘द ऑर्डर ऑफ द व्हाइट ईगल’ को वापस भेज दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उस पार्सल की रसीद साझा की, जिसके जरिए यह सम्मान पोलैंड के राष्ट्रपति भवन भेजा गया था। जेलेंस्की ने अपनी पोस्ट में लिखा कि उन्हें लगा था यह सम्मान यूक्रेन की जनता और देश की सेना के साहस को सम्मानित करने के लिए दिया गया था। उन्होंने कहा कि अब यह सम्मान वापस भेज दिया गया है और भविष्य यह तय करेगा कि यूक्रेन के लोग किस सम्मान के हकदार हैं।
गौरतलब है कि यह सम्मान उन्हें वर्ष 2023 में पोलैंड के तत्कालीन राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा ने दिया था। उस समय रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूक्रेन की दृढ़ता, सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा के प्रयासों की सराहना की गई थी।
आखिर क्यों भड़का पोलैंड?
इस पूरे विवाद की जड़ मई 2026 में जेलेंस्की द्वारा लिया गया एक सैन्य निर्णय माना जा रहा है। यूक्रेन सरकार ने अपनी स्पेशल ऑपरेशंस फोर्सेज की एक यूनिट का नाम ऐतिहासिक यूक्रेनी विद्रोही सेना (UPA) के नाम पर रखने का फैसला किया। यहीं से पोलैंड की नाराजगी शुरू हुई। पोलैंड में UPA का नाम बेहद विवादित माना जाता है। पोलिश समाज का एक बड़ा वर्ग इस संगठन को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलिश नागरिकों के खिलाफ हुई हिंसा और नरसंहार से जोड़कर देखता है।
पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नवरोकी ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि UPA को सम्मान देना पोलैंड के लिए स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि यह संगठन हजारों निर्दोष पोलिश नागरिकों की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है और पोलैंड उस इतिहास को भूल नहीं सकता।
इतिहास की वजह से गहरा है विवाद
UPA यानी यूक्रेनी विद्रोही सेना 1940 और 1950 के दशक में सक्रिय रही थी। संगठन का उद्देश्य यूक्रेन की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना था और उसने नाजी जर्मनी तथा सोवियत संघ दोनों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। हालांकि इतिहासकारों और पोलैंड का आरोप है कि इसी दौर में वोलहिनिया और पूर्वी गैलिसिया क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पोलिश नागरिकों की हत्या की गई। इस घटना को लेकर पोलैंड की संसद ने वर्ष 2016 में एक प्रस्ताव पारित कर इसे आधिकारिक तौर पर नरसंहार की श्रेणी में रखा था।
यही कारण है कि जब यूक्रेन ने अपनी सैन्य इकाई को UPA का नाम दिया, तो पोलैंड में इसे इतिहास के घावों को फिर से कुरेदने के रूप में देखा गया।
यूक्रेन ने कहा- यह फैसला पुतिन के लिए तोहफा
विवाद बढ़ने के बाद यूक्रेन की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख किरिलो बुडानोव ने पोलैंड के कदम को शत्रुतापूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में, जब रूस के खिलाफ संघर्ष जारी है, इस तरह के फैसले दोनों देशों के रिश्तों को कमजोर करेंगे और इसका फायदा केवल मॉस्को को मिलेगा। उनके मुताबिक यह कदम रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए एक राजनीतिक उपहार जैसा है।
बुडानोव के अलावा यूक्रेन के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भी पोलैंड से मिले अपने सम्मान और पदक वापस भेजने की घोषणा कर दी है। इससे विवाद और गहरा हो गया है।
पुनर्निर्माण सम्मेलन पर भी मंडराया संकट
यह तनाव ऐसे समय में सामने आया है जब पोलैंड में यूक्रेन के युद्ध के बाद पुनर्निर्माण को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होने वाला है। इस बैठक से यूक्रेन को आर्थिक और राजनीतिक समर्थन की बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन मौजूदा विवाद के बाद आशंका जताई जा रही है कि दोनों देशों के बीच बढ़ी तल्खी इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव लंबा खिंचता है तो इसका असर यूक्रेन को मिलने वाले क्षेत्रीय समर्थन पर भी पड़ सकता है।
पोलैंड के भीतर भी अलग-अलग राय
दिलचस्प बात यह है कि पोलैंड के भीतर भी इस मुद्दे पर एकमत राय नहीं है। प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने विवाद पर चिंता जताते हुए दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। टस्क ने कहा कि इस समय असली चुनौती रूस के खिलाफ चल रहा संघर्ष है और दोनों देशों के नेताओं को आपसी विवाद बढ़ाने के बजाय बड़े मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार यह टकराव केवल रूस को फायदा पहुंचा सकता है और पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी असहजता पैदा कर सकता है।
दोस्ती में आई दरार
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पोलैंड यूक्रेन के सबसे बड़े समर्थकों में से एक रहा है। लाखों यूक्रेनी शरणार्थियों को शरण देने से लेकर सैन्य और मानवीय सहायता तक, पोलैंड ने लगातार कीव का साथ दिया है। लेकिन इतिहास से जुड़े इस विवाद ने दोनों देशों के रिश्तों में नई दरार पैदा कर दी है।





























