Maharani Jindan Kaur: सिख पुरुषों की, उनकी बलिदानो की, उनकी बहादुरी की कहानियां तो आपने बहुत सुनी होगी, लेकिन सिख धर्म केवल सिख पुरुषो की बहादुरी की कहानी नहीं है.. बल्कि इस धर्म में कई बहादुरी शेरनियों ने भी जन्म लिया.. जिन्होंने गुरु साहिबानो की धर्म की रक्षा की लड़ाई की जम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली.. जिन्होंने वीरगति को चुना लेकिन समर्पन को नहीं.. इन वीरांगनाओं ने साबित किया कि क्यों मुगल केवल उनके पुरुषो से ही नहीं बल्कि महिलाओं का सामना करने से भी घबराते थे। अपने इस लेख में हम सिख धर्म की एक ऐसी ही विरांगना के बारे में जानेंगे… जिनकी चालाकी और युद्ध कौशल ने अंग्रेजी हुकुमत के भी छक्के छुड़ा दिये थे.. इतना ही नहीं खुद लॉर्ड डलहौजी ने भी उनकी तारीफ की थी। जिन्होंने मानवता की रक्षा के लिए पुरुषो की तरह बहादुरी दिखाई थी.. जी हां हम बात कर रहे है शेर एक पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी की तीसरी पत्नी महारानी जिंद कौर के बारे में.. जिन्होंने अंग्रेजी हुकुमत को जीत के बाद भी करीब 3 सालों तक पंजाब में पांव नहीं जमाने दिये थे। जानिये क्यों अंग्रेजी हुकुमत भी उनका सामना करने से कतराती थी।
कौन थी महारानी जिंद कौर? Maharani Jindan Kaur
पंजाब के पहले सिख शासक, जिन्होंने पंजाब में सिख सम्राज्य की स्थापना की थी, जिन्होने मात्र 21 साल की उम्र में पंजाब के विस्तार के लिए गद्दी संभालते ही कई युद्ध लड़े थे,, लेकिन क्या आप ये जानते है कि उन्होंने मात्र 10 साल की उम्र में पहली युद्ध लड़ा था। गद्दी संभालने के बाद उन्होंने उत्तर की तरफ मुल्तान, कश्मीर, पेशावर, पश्तून, अमृतसर, और अफगानिस्तान के कई हिस्सों पर युद्ध कौशल से कब्जा कर लिया था। हम सभी जानते है कि जब तक महाराजा रणजीत सिह जीवित थे, तब तक उन्होंने अंग्रेजी हुकुमत को पंजाब की धरती पर पांव तक रखने नहीं दिया था। महाराजा रणजीत सिंह ने सिख खालसा सेना का गठन किया था, जो पंजाब की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे।
महाराजा की बहादुरी का नतीजा ये था कि उनके राज्य के पुरुष ही नहीं महिलाएं भी काफी ताकतवर हुआ करती थी। महाराजा ने महिलाओं औऱ पुरूषो को बराबरी का मौका दिया था.. महाराज रणजीत सिंह ने राज्य विस्तार के लिए ही तीन विवाह किये थे, मेहताब कौर, दातर कौर औऱ फिर सबसे छोटी रानी जिंद कौर.. जिंद कौर जिन्हं रानी जिंदान कौर के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने अपनी कूट नीति के कारण करीब 3 सालो तक अंग्रेजी हुकुमत को पंजाब पर शासन करने से रोके रखा था। जी हां, उनकी बहादुरी औऱ कूटनीति के कारण अंग्रेजी हुकुमत उन्हें पंजाब की मेसालिना” कहकर बुलाती थी।
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महारानी जिंद कौर से क्यों डरते थे – Maharani Jindan Kaur
ये बात 1848 के आसपास की है, भारत में एक नए गर्वनर जनरल लार्ड डलहौजी की नियुक्ति हुई.. तो वो सबसे पहले पंजाब रीजन के बारे में जानना चाहते थे, यहां उन्हें पहली बार भारत की एक ऐसी शसक्त महिला का परिचय मिला.. जिनसे उन्हें बचकर रहने की सलाह दी गई थी। उन्होंने लिखा है- वो वहां मौजूद सभी सैनिकों से भी ज्यादा कीमती है, सारे सैनिक मिलकर जो काम करते वो अपनी चालाकी से अकेले कर सकती है.. ये बोल लार्ड डलहोजी ने महारानी जिंद कौर को लेकर कहे थे। उन्होंने कहा कि वो दो साल तक चुनार के किले में कैद थी, उन्हें उनके पांच साल के बेटे से अलग कर दिया गया, उनकी ताकत कमजोर करने के लिए उनपर कड़ी नजर रखी गई थी लेकिन तभ भी अंग्रेजो को डर था कि महारानी जिंद कौर फिर से सिखों को एकजुट करके अंग्रेजी हुकुमत को टक्कर दे सकती है।
महाराज के तीन उत्तराधिकारियों की हत्या – Maharani Jindan Kaur
बनारस से चौदह मील दक्षिण में गंगा नदी के एक मोड़ के पास, एक चट्टानी पहाड़ी पर बना चुनार का किला.. जहां कैद किये जाने के बाद वो कैद थी.. लेकिन उससे पहले उन्होंने सिख सम्राज्य की रक्षा करने की कोशिश की। ऐसा क्यों था.. और गुलाम होते हुए भी महारानी जिंद कौर से क्यों डरते थे अंग्रेज- तो आपको बताते है.. दरअसल 1839 में जब महाराजा रणजीत सिंह की मौत हुई तब अंग्रेजो को मौक मिला पंजाब पर हमला करने का.. महाराज के तीन उत्तराधिकारियों की हत्या हो गई और चौथे उत्तराधिकारी थे उनके 5 साल के बेटे दलीप सिंह। वो मात्र 20 साल की उम्र में विधवा हो गई थी, लेकिन अपने साम्रज्य के प्रति उनका लगाव ऐसा था कि उन्होंने खालसा सेना को संभालने का फैसला किया। उन्होंने दलीप सिंह को महाराज घोषित कर दिया औऱ वो रीजेंट संरक्षिका बन गई।
हालांकि अपनी ही सेना के गद्दारो के कारण खालसा सेना पहला पहला एंग्लो-सिख युद्ध हार गए थ। लेकिन तब ये तय हुआ कि अंग्रेजी हुकुमत के अधीन रहकर पंजाब राज सकेगा। इसके लिए दिसंबर 1846 में काउंसिल ऑफ़ रीजेंसी’ बनाई गई थी। लेकिन बावजूद इसके महारानी का प्रभाव इतना था कि अंग्रेजी हुकुमत को डर सताने लगा कि कई महारानी बगावत न कर दें.. या फिर से पंजाब से अंग्रेजो को अधिकार न चला जायें। काउंसिल के होते हुए भी महारानी का प्रभाव दरबाव में काफी थी.. नतीजा अंग्रेजो ने महारानी जिंद कौर को चुनार के किले में कैद कर दिया, जहां वो अकेले एक गंदी सी जगह पर रहती थी, और उनके बेटे को इंग्लैड भेज दिया गया।
कैद में भी कभी हार नहीं मानी महारानी ने जिंद कौर ने – Maharani Jindan Kaur
अंग्रेजी हुकूमत के कैद में जाने से पहले उन्होंने 5 साल तक पंजाब की गद्दी एक रिजेंट की तरह संभाली थी। भारत के पहले अंग्रजी गवर्नर-जनरल, लॉर्ड हार्डिंग ने महारानी को रोमन सम्राट क्लॉडियस की तीसरी पत्नी मेसालिना से कंपेयर करते थे। उन्होंने कहा था कि वह इतनी बागी थीं कि उन्हें कंट्रोल नहीं किया जा सकता था। करीब 13 साल तक वो अपने बेटे से अलग रही थी। महारानी ने कैद में भी कभी हार नहीं मानी, एक रात वो अपनी नौकरानी के कपड़े पहन कर किले से सुरक्षाकर्मियो को चकमा देकर निकल गई.. वो गंगा की उफनती लहरो को चीरती हुई करीब 800 मील का सफर तय करके नेपाल पहुंचा थी।
कश्मीर के राजा को पत्र लिख कर बनाई रणनीति – Maharani Jindan Kaur
जो अंग्रजी हुकुमत से आजाद था। अप्रैल 1849 में वो नेपाल के प्राइम मिनिस्टर जंग बहादुर राणा के दरबार पहुंचा और अपनी तीखी और विश्वास भरे लहजे में खुद के रानी होने की पुष्टि की। नेपाल में उन्होंन मानवता के लिए काम किया जिससे प्रभावित होकर लोग उन्हें चंदा कुवंर कहते थे। उन्होंने नेपाल में रह कर भी अंग्रेजो के पसीने छुड़ा दिये थे। उन्होंने 1857 की क्रांति के लिए कश्मीर के राजा को पत्र लिख कर रणनीति तक बताई थी, लेकिन उससे पहले ये पत्र अंग्रजो के हाथ लग गया। वो नेपाल में भी काफी प्रभावी थी, नतीजा नेपाल के राजा जंद बहादुर को वो खटकने लगी..उन्हें काफी कुछ करने से रोका जाता था, वो फिर से नजरबंद हो गई थी.. करीब 11 साल वो वहां रही थी, लेकिन 11 साल बाद उन्हें पत्र मिला कि उन्हें कोलकाता में अपने बेटे से मिलने का मौका मिलेगा। लेकिन तब क उनके बेटे उन्हें भूल चुके थे, और एक अंग्रेजी डॉक्टर के घर पल कर इसाई हो गए थे। वो पूरी तरह से ब्रिटिश की तरह ही रहते थे।
सिख सैनिको को अपने साथ मिलाने के उन्होंने दीलिप सिंह को जिंदा रखा और अपने पास रखा, जिससे सिख सैनिक का विश्वास बना रहे और वो उनकी सेना के लिए लड़े। यहीं हुआ भी। सिखो ने 1857 का विद्रोह दबाने में अहम भूमिका निभाई।वहीं दिलिप सिंह अपनी मां से मिलने के लिए चोरी छिपे भारत आ गए थे, लेकिन तब उन्हें पता चला कि उनकी मां पहले की तरह मजबूत नही है। वो अंधी हो गई थी.. जब अंग्रेजो को लगा कि अब उनसे खतरा नही है तब कि उन्हें अपने बेटे से मिलने दिया गया था। यानि की जब तक उनकी हड्डियो में दम था.. अंग्रेजी हुकुमत भी उनका सामना करने से डरती थी।
16 जनवरी, 1861 को दोनो मां बेटे की मुलाकात हुई थी। उस दौरान सैकड़ो सिख सैनिकों ने महारानी औऱ राजा का अभिवादन किया था। वो अपने बेटे के साथ इंग्लैंड लौट गई थी, लेकिन दलीप सिंह ने ब्रिटिश हुकुमत का साथ छोड़ दिया और वो पोलेंड चले गए। 1863 में महारानी की मौत हो गई थी। लेकिन वो दलीप सिंह के अंदर अंग्रेजो के लिए नफरत पैदा कर गई थी। अगर मौका मिलता तो दलिप जरूर बगावत करके अपनी सत्ता हासिल करते.. मगर ऐसा हो नहीं सका.. बावजूद इसके वो अंतिम महारानी है जिन्होंने अंग्रेजी हुकुमत की रातो की नींद उड़ा दी थी। आपको महारानी जींद की कहानी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।





























