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नहीं रहे देश के जाने-माने पत्रकार वेद प्रताप वैदिक, यहाँ जानिए उनके बारे में सबकुछ

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 14 Mar 2023, 12:00 AM | Updated: 14 Mar 2023, 12:00 AM

देश के जाने-माने पत्रकार रहे वेद प्रताप वैदिक (Ved Pratap Vaidik) का निधन हो गया है. और उन्होंने 78 साल की उंर में आखिरी साँस ली. रिपोर्ट के अनुसार, 78 साल के वेद प्रताप बाथरूम में फिसल गए थे जिसके बाद उन्हें हॉस्पिटल ले जाया और वहां पर उन्हें डेड घोषित कर दिया गया.  वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक का जन्म 1944 में इंदौर में हुआ था और 1958 में उन्होंने पत्रकारिता को अपना करियर चुना. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी करी और देश के बड़े पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बने. वे नवभारत टाइम्स और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया से भी जुड़े रहे साथ ही वेद प्रताप वैदिक कई भारतीय और विदेशी शोध-संस्थानों और विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेस रहे हैं. वहीं वेद प्रताप वैदिक उस समय चर्चा में आए जब उन्होने पाकिस्तानी आतंकवादी हाफिज सईद से मुलाकात करी .

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पाकिस्तानी आतंकवादी हाफिज सईद से की मुलाकात

वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक साल 2014 में पाकिस्तान गए तब वहां पर  उन्होंने हाफिज सईद से मुलाकात की थी और उनका इंटरव्यू किया था, जो काफी चर्चा में रहा था। इस मुलाकात के बाद भारत लौटे वेद प्रताप ने कहा था, ‘हाफिज सईद ने मुझसे कहा कि अगर पीएम मोदी पाकिस्तान जाते हैं तो वहां उनका जोरदार स्वागत नहीं होगा. 

देशद्रोह का मुकदमा हुआ था दर्ज 

संसद के बारे में दिया था विवादित बयान हाफिज सईद से मुलाकात की वजह से ही वेद प्रताप वैदिक के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने और उन्हें गिरफ्तार करने की मांग उठी थी. इस पर वैदिक ने कहा था, ‘मैं कभी डरा नहीं हूं और न किसी किसी से कोई समझौता किया है. दो सांसदों ने मेरी गिरफ्तारी की मांग की मांग की तो मैंने कहा कि दो नहीं 100 नहीं, 543 सांसद भी ‘सर्वकुमति’ से मेरी गिरफ्तारी का प्रस्ताव पारित करें और कहें कि मुझे फांसी पर चढ़ाओ तो मैं उस पूरी संसद पर थूकता हूं.’

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50 से ज्यादा देशों की कर चुके थे यात्रा

वेद प्रताप वैदिक संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी, रूसी और अंग्रेजी के जानकार थे. वो न सिर्फ भारत के मुद्दों के अलावा विदेशी राजनीति और कूटनीति के विषयों पर भी खूब लिखते थे और इस दौरान उन्होंने 50 से ज्यादा देशों की यात्रा करी. 

इन पुरस्कारों से हो चुके हैं सम्मानित नवाजा गया था

वेद प्रताप वैदिक को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. 1976 में गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार , 1988 में पुरुषोत्तम दास टंडन पुरस्कार, पत्रकारिता के लिए 1990 में हिंदी अकादमी दिल्ली पुरस्कार, इसी साल फिर से राम मनोहर लोहिया पुरस्कार, 1992 में रामधारी सिंह दिनकर पुरस्कार, इसी साल लाला लाजपत राय पुरस्कार, 2003 में विश्व हिंदी सम्मेलन सम्मान सूरीनाम और पिछले ही साल न्यूज़मेकर्स अचीवर्स अवार्ड से सम्मानित किया गया था.

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का आखिरी लेख 

कश्मीर पर भुट्टो की निराशा

“पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने अनजाने ही कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान की नाकामी को उजागर कर दिया है। वे न्यूयार्क में एक प्रेस-काॅफ्रेस को संबोधित कर रहे थे। कश्मीर का स्थायी राग अलापते-अलापते उनके मुंह से निकल गया कि कश्मीर के सवाल को अंजाम देना बहुत ‘‘ऊँची चढ़ाई’’ है। इस बात को बिलावल के नाना जुल्फिकार अली भुट्टो अब से 51 साल पहले ही समझ गए थे, जब 1972 के शिमला समझौते में उन्होंने दो-टूक शब्दों में स्वीकार किया था कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय विवाद है। द्विपक्षीय याने इस विवाद का ताल्लुक सिर्फ भारत और पाकिस्तान से है। इसमें किसी तीसरे राष्ट्र या संयुक्तराष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को टांग अड़ाने की जरूरत नहीं है। यह वही जुल्फिकारअली भुट्टो हैं, जो कहा करते थे कि यदि हमें हजार साल भी लड़ना पड़े तो हम लड़ेंगे और कश्मीर को भारत से लेकर रहेंगे। पाकिस्तान के शोध-संस्थानों और विश्वविद्यालयों में मेरे जब भी भाषण हुए मैंने श्रोताओं से पूछा क्या पाकिस्तान हजार साल में भी कश्मीर को भारत से छुड़ा सकता है? तो सबकी बोलती बंद हो जाती थी। मुझे कई पाकिस्तानी कहते रहे कि कश्मीर हमारे लीडरों के लिए एक जबर्दस्त कश्ती है। जो लीडर इसे जितने जोर से दौड़ाता है, वह अपना चुनाव उतने ही जोर से जीतता है लेकिन पाकिस्तान की आज जो हालत हो गई है, उसमें कश्मीर-जैसा कोई मुद्दा रह ही नहीं गया है। पाकिस्तानी कश्मीरी ही नहीं, बलूच और पठान भी आजादी और अलगाव की मांग कर रहे हैं। पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर न तो संयुक्तराष्ट्र संघ में कोई समर्थन मिल रहा है, और न ही अन्तरराष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में! इधर तुर्की और मलेशिया ने थोड़ी चिल्लपों जरूर मचाई थी लेकिन कश्मीर के सवाल को अब सउदी अरब और संयुक्त अरब अमारात ने भी खूंटी पर टांग रखा है। बिलावल को अफसोस है कि फलस्तीन के मामले पर संयुक्तराष्ट्र संघ और महाशक्तियां कुछ न कुछ पहल करती रहती हैं लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर ये सब चुप्पी खींचे रखते हैं। बिलावल ने भारत के बारे में बोलते हुए गलती से उसे अपना ‘मित्र’ और अपना पड़ौसी भी कह दिया। अफगानिस्तान के बारे में उसने ठीक ही कहा कि यदि अफगानिस्तान छींकता है तो पाकिस्तान को जुकाम हो जाता है। कश्मीर पर कब्जा करने के बदले पाकिस्तान को पहले तालिबानी जुकाम और आर्थिक बुखार की गोलियां खानी चाहिए”

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