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IPC की धारा 9 क्या कहती है? जानिए कानून के तहत एकवचन और बहुवचन का मतलब

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 12 Apr 2024, 12:00 AM | Updated: 12 Apr 2024, 12:00 AM

कानून में रुचि रखने वालों के लिए, हम हर दिन भारतीय दंड संहिता के एक खंड का विवरण और अर्थ समझाते हैं। आज के लेख में हम आपको आईपीसी की धारा 9 की परिभाषा बताएंगे, यह धारा कानून के तहत एकवचन और बहुवचन के बारे में बात करती है। आइये धारा 9 के बारे में विस्तार से जानते हैं।

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IPC की धारा 9 का विवरण


भारतीय दंड संहिता की धारा 9 के अनुसार जब तक कि संदर्भ से तत्प्रतिकूल प्रतीत न हो, एकवचन द्योतक शब्दों के अन्तर्गत बहुवचन आता है, और बहुवचन द्योतक शब्दों के अन्तर्गत एकवचन आता है।

सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील अजय अग्रवाल आईपीसी की धारा 9 की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि, ‘धारा 9 में प्रावधान है कि यदि शब्द का प्रयोग एकवचन में किया जाता है, और यदि कोई विपरीत नहीं है तो उसे अलग तरीके से कहा जाता है। यदि हां, तो इसका प्रयोग एकवचन और बहुवचन के लिए भी किया जा सकता है और इसी प्रकार इसका प्रयोग बहुवचन और एकवचन के लिए भी किया जा सकता है।’ आम भाषा में यह समझना चाहिए कि अगर बात एक व्यक्ति की हो रही है तो वह कई लोगों की हो सकती है। और जो कई लोगों के लिए कहा जा रहा है, वह एक व्यक्ति के लिए भी हो सकता है।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि A नाम का व्यक्ति B नाम के व्यक्ति के खिलाफ मारपीट की शिकायत दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन आता है। लेकिन अगर वह अपनी शिकायत में B नाम के व्यक्ति का परिचय देने में विफल रहता है, तो इस मामले में पुलिस IPC कि धारा 9 के तहत ये मान लेगी कि इस केस में एक से ज्यादा व्यक्ति शामिल थे। लेकिन अगर व्यक्ति A अपनी शिकायत में व्यक्ति B को परिभाषित करता है, तो इस मामले में पुलिस को स्पष्ट रूप से पता चल जाएगा कि मामले में एक व्यक्ति शामिल था या नहीं।

क्या है भारतीय दंड संहिता

भारतीय दंड संहिता भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किए गए विशिष्ट अपराधों को निर्दिष्ट और दंडित करती है। आपको बता दें कि यह बात भारतीय सेना पर लागू नहीं होती है। पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता लागू नहीं होती थी। हालांकि, धारा 370 ख़त्म होने के बाद आईपीसी वहाँ भी लागू हो गया। पहले वहां रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) लागू होती थी।

वहीं, भारतीय दंड संहिता ब्रिटिश काल में लागू की गई थी। आईपीसी की स्थापना 1860 में ब्रिटिश भारत के पहले विधि आयोग के प्रस्ताव पर की गई थी। इसके बाद 1 जनवरी, 1862 को इसे भारतीय दंड संहिता के रूप में अपनाया गया। वर्तमान दंड संहिता, जिसे भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जाना जाता है, से हम सभी परिचित हैं। इसका खाका लॉर्ड मैकाले ने तैयार किया था। समय के साथ इसमें कई बदलाव हुए हैं।

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