सेना बंद करे सारे जहां से अच्छा बजाना: DU के कुलपति योगेश सिंह के बयान पर मचा बवाल| DU VC Yogesh Singh

Nandani | Nedrick News Delhi Published: 29 अक्टूबर 2026, 07:49 PM Updated: 29 अक्टूबर 2026, 07:49 PM
Google News
Follow Us on Google News
Prefer Nedrick News
on Google

DU VC Yogesh Singh: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के कुलपति प्रो. योगेश सिंह के एक हालिया बयान ने देश के वैचारिक और अकादमिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। कुलपति ने दो टूक कहा है कि भारतीय सेना को अपने बैंड द्वारा मोहम्मद इकबाल का लिखा मशहूर तराना ‘सारे जहां से अच्छा’ बजाना अब बंद कर देना चाहिए। उनका तर्क है कि भले ही इकबाल ने यह देशभक्ति गीत लिखा था, लेकिन बाद के दिनों में उनके विचार पूरी तरह बदल गए थे और वे देश के बंटवारे यानी पाकिस्तान की मांग के प्रबल समर्थक बन गए थे।

और पढ़ें: बारिश की बूंद-बूंद सहेजने की क्रांति: कैच द रेन से रिचार्ज हुआ 2.43 अरब घन मीटर भूजल, 1.55 करोड़ वॉटर स्ट्रक्चर्स तैयार| Catch the Rain campaign

पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में दिया विवादित बयान| DU VC Yogesh Singh

यह बयान सोमवार, 26 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ प्रचारक आर. हरि की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ़ वंदे मातरम’ के विमोचन समारोह के दौरान सामने आया। इस कार्यक्रम का आयोजन आरएसएस के वैचारिक संगठन ‘प्रज्ञा प्रवाह’ की दिल्ली इकाई ने ‘इंडस स्क्रॉल्स प्रेस’ के सहयोग से किया था। सभा को संबोधित करते हुए कुलपति योगेश सिंह ने समाज के एक वर्ग के दोहरे रवैये पर उंगली उठाई। उन्होंने सवाल किया कि कुछ लोग अल्लामा इकबाल की रचना ‘सारे जहां से अच्छा’ को तो बड़े गर्व और शान से गाते हैं, लेकिन जब ‘वंदे मातरम’ गाने की बारी आती है तो उससे साफ इनकार कर देते हैं। कुलपति ने कहा कि जिस शख्स ने आगे चलकर भारत के विभाजन की जमीन तैयार करने वाले विचारों की वकालत की, उसके लिखे गीत को हमारी सेना के बैंड द्वारा बजाया जाना अब बंद होना चाहिए।

आरिफ मोहम्मद खान ने दर्ज कराई असहमति

मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कुलपति की इस राय से असहमति जताई। उन्होंने संतुलित नजरिया पेश करते हुए कहा कि इंसानी जिंदगी में किसी के भी विचार वक्त के साथ बदल सकते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि इकबाल के जीवन का एक ऐसा दौर भी था जब वे वतन-ए-हिंद से बेपनाह मोहब्बत करते थे और उनकी उसी भावना से यह कालजयी गीत निकला था।

इसके साथ ही पूर्व राज्यपाल ने ‘वंदे मातरम’ के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह केवल एक देशभक्ति गीत नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यतागत पहचान, स्वाधीनता संग्राम और राष्ट्रीय एकता की सामूहिक चेतना का अमर प्रतीक है।

‘वंदे मातरम पर कांग्रेस नहीं ले सकती श्रेय’

कार्यक्रम में मौजूद ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने पिछली सरकारों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि ऐतिहासिक रूप से ‘वंदे मातरम’ के साथ समझौता किया गया और इसे सिर्फ शुरुआती दो पदों तक समेट दिया गया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस राष्ट्रीय गीत का पूरा श्रेय लेने का हकदार नहीं है। नंदकुमार ने 2026 के दौर को इस गीत की वैचारिक वापसी का समय बताया।

गौरतलब है कि मोहम्मद इकबाल ने वर्ष 1904 में ‘तराना-ए-हिंदी’ (सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा) की रचना की थी। आजादी के बाद से ही यह गीत हर भारतीय की जुबान पर रहा है और भारतीय सशस्त्र बलों के बैंड दशकों से इसे अपनी प्रमुख मार्चिंग धुन के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे हैं। ऐसे में कुलपति की इस मांग ने राष्ट्रीय प्रतीकों और इतिहास की प्राथमिकताओं पर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

और पढ़ें: कूनो नेशनल पार्क में 19 महीने के चीते की गोली लगने से मौत: शरीर से निकले 5 छर्रे, केंद्र ने भेजी जांच टीम| Kuno cheetah cub death

Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

Recent News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds