अब भ्रष्टाचारियों से परमिशन लेकर होगी जांच? DPDP Act ने बांधे खोजी पत्रकारों के हाथ!

Rajni | Nedrick News Ghaziabad Published: 28 अक्टूबर 2026, 07:29 PM Updated: 28 अक्टूबर 2026, 07:29 PM
Google News
Follow Us on Google News
Prefer Nedrick News
on Google

DPDP Act: सोचिए कैसा होगा जब आपको किसी भ्रष्टाचारी से ही पूछना पड़े कि क्या आप उसके खिलाफ मिले सबूतों और तस्वीरों का इस्तेमाल कर सकते हैं? तो क्या कोई भ्रष्टाचारी खुद अपने खिलाफ सबूत छापने की इजाजत देगा? सुनने में मजाक लग सकता है, लेकिन डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 के कड़े नियमों तहत खोजी पत्रकारों को अब स्टिंग ऑपरेशन या भंडाफोड़ करने से पहले आरोपियों से ही ‘सहमति’ लेनी पड़ सकती है। इस कानून ने देश की खोजी पत्रकारिता के हाथ-पैर बांध दिए हैं। तो चलिए इस लेख के जरिए जानते है क्या है पूरा मामला?

और पढ़ें: 1 नवंबर से लागू होने वाले हैं कड़े नियम, क्या आम जनता की बढ़ने वाली है मुसीबतें! | Pollution Rules

विवाद की असली जड़

दरअसल, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने इस कानून के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया है। मीडिया जगत का आरोप है कि इस अधिनियम में पत्रकारों और मीडिया घरानों को कोई विशेष छूट (Exemption) नहीं दी गई है। कानून के नियमों के मुताबिक, किसी भी नागरिक की निजी जानकारी (जैसे फोटो, वीडियो, नाम या वित्तीय डेटा) को इस्तेमाल करने से पहले उसकी ‘नोटिस और पूर्व सहमति’ (Prior Consent) लेना अनिवार्य होगा। अब सवाल यह है कि क्या कोई अपराधी या भ्रष्ट अधिकारी अपनी चोरी पकड़े जाने के लिए सहमति देगा? जवाब साफ है-अबिल्कुल नहीं!

यानी सीधे शब्दों में कहें, तो एक पत्रकार को अब अपना काम करने या घोटाला उजागर करने से पहले खुद आरोपी से ही परमिशन लेनी पड़ेगी! भले ही सीधे तौर पर ऐसा न लिखा हो, लेकिन इन-डायरेक्टली (अप्रत्यक्ष रूप से) यह एक्ट यही करने के लिए मजबूर कर रहा है। जब कानून कहता है कि किसी की भी निजी जानकारी या फोटो-वीडियो का इस्तेमाल करने के लिए उसकी सहमति जरूरी है, तो इसका मतलब यही हुआ कि आप जिसके खिलाफ सबूत इकट्ठा कर रहे हैं, पहले उसी से मंजूरी मांगिए।

खोजी पत्रकारिता पर चौतरफा वार

इस कानून के आने से मीडिया के काम करने के तरीके पर कई तरह की पाबंदियां लग सकती हैं। खोजी पत्रकारिता हमेशा गुप्त सूत्रों (Hidden Sources) के भरोसे चलती है, लेकिन सहमति की अनिवार्यता के कारण अब सूत्रों की पहचान छिपाना लगभग असंभव हो जाएगा।

इसके अलावा, कानून के तहत लोगों को अपना डेटा या जानकारी पब्लिशर की साइट से हटवाने (Right to Erasure) का अधिकार मिला है। इसका फायदा उठाकर रसूखदार लोग अपने खिलाफ छपी पुरानी खबरों को इंटरनेट से हमेशा के लिए डिलीट करवा सकते हैं। इतना ही नहीं, इस कानून की धारा 44(3) व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे पर पूरी तरह रोक लगाती है। यानी, जो जानकारियां पहले RTI (सूचना का अधिकार) के जरिए निकालकर बड़े-बड़े घोटाले उजागर किए जाते थे, अब उन पर सरकारी पर्दा डाल दिया जाएगा।

देखा जाए तो यह एक्ट आम नागरिकों की प्राइवेसी (गोपनीयता) की रक्षा के लिए बनाया गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई चोर कभी खुद कबूल करता है कि उसने चोरी की है? जाहिर है कि जब तक उसके खिलाफ ठोस सबूत न पेश किए जाएं, वह कभी सच नहीं मानेगा। लेकिन इस नए कानून के बाद, बिना उसकी सहमति के वे सबूत जुटाना ही गैर-कानूनी हो जाएगा!

DPDP Act को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सरकार से जवाब तलब

DNPA, जिसमें देश के 21 बड़े मीडिया हाउस शामिल हैं, का साफ कहना है कि अगर इन नियमों को इसी तरह लागू किया गया तो न्यूज़रूम बंद करने की नौबत आ जाएगी। यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र सरकार (कानून मंत्रालय और MeitY) को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि एक तरफ नागरिकों की प्राइवेसी (गोपनीयता) की रक्षा जरूरी है, तो दूसरी तरफ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की आजादी को भी दबाया नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई के लिए 17 नवंबर, 2026 की तारीख तय की है।

हालांकि कोर्ट का अंतिम फैसला क्या होगा, यह तो अगली सुनवाई में ही साफ होगा। लेकिन जिस तरह के नियम फिलहाल सामने आ रहे हैं, उसे देखकर क्या अब यह मान लिया जाए कि देश में खोजी पत्रकारिता का दौर बेहद मुश्किल और चुनौतीपूर्ण होने वाला है?

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर खतरा?

प्रेस संगठनों का साफ कहना है कि अगर सरकार ने इन कड़े नियमों में ढील नहीं दी, तो स्वतंत्र पत्रकारिता का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। खोजी पत्रकारिता, जो सत्ता और रसूखदारों से तीखे सवाल पूछती है, वह महज एक सरकारी प्रेस रिलीज छापने वाली मशीन बनकर रह जाएगी। अब देखना यह होगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र की इस बुनियादी आजादी को बचाने के लिए कानून में सुधार का आदेश देता है, या फिर भारतीय मीडिया को इन कानूनी जंजीरों के साए में ही काम करना पड़ेगा।

Rajni

rajni@nedricknews.com

Recent News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds