चंद्रचूड़ और अमित शाह: भाषा किसी इंसान के ज्ञान का प्रमाण नहीं, तो फिर संसद सारे कानून हिंदी में बनाने को बाध्य क्यों नहीं?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 14 नवम्बर 2022, 05:30 AM Updated: 14 नवम्बर 2022, 05:30 AM
Google News
Follow Us on Google News
Prefer Nedrick News
on Google

देश में भाषा को लेकर चर्चा हमेशा ही बना रहता है। कभी गृह मंत्री के बयानों से से तो कभी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयानों से, तो कभी मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ के बयान से ये भाषा का मुद्दा देश भर के मीडिया की सुर्ख़ियों में बना ही रहता है। प्रधानमंत्री ने गुजरात में शूल ऑफ़ एक्सीलेंस के उद्घाटन समारोह में कहा था कि कोई भी भाषा खासकर इंग्लिश, किसी भी इंसान के ज्ञान का प्रमाण नहीं होती है। इसी विषय पर और हाल ही में मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ के टिप्पणी पर डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने अपनी सोच को हमारे साथ साझा किया है।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक बताते है कि आज दो खबरों ने बरबस मेरा ध्यान खींच लिया। एक तो मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ के बयान ने और दूसरा गृहमंत्री अमित शाह के बयान ने! दोनों ने वही बात कह दी है, जिसे मैं कई दशकों से कहता चला आ रहा हूं लेकिन देश के किसी न्यायाधीश या नेता की हिम्मत नहीं पड़ती कि भाषा के सवाल पर वे इतनी पुख्ता और तर्कसंगत बात कह दें।

Also read- डॉ. वेदप्रताप वैदिक के विचारों में क्या है कश्मीर की सच्ची आजादी? आजाद कश्मीर का कोई प्रधानमंत्री नहीं

इसका कारण नेताओं और नौकरशाहों की बौद्धिक गुलामी

डॉ. वैदिक आगे कहते है कि चंद्रचूड़ ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की संगोष्ठी में बोलते हुए कहा है कि कोई यदि अच्छी अंग्रेजी बोल सकता है तो इसे उसकी योग्यता का प्रमाण नहीं माना जा सकता और उसकी योग्यता इस बात से भी नापी नहीं जा सकती कि वह व्यक्ति कौन से नामी-गिरामी स्कूल या काॅलेज से पढ़कर निकला है। हमारे देश में इसका एकदम उल्टा ही होता है। इसका एकमात्र कारण हमारे नेताओं और नौकरशाहों की बौद्धिक गुलामी है।

चंद्रचूड़ और अमित शाह: भाषा किसी इंसान के ज्ञान का प्रमाण नहीं, तो फिर संसद सारे कानून हिंदी में बनाने को बाध्य क्यों नहीं? — NEDRICK NEWS

अंग्रेजों की लादी हुई औपनिवेशिक व्यवस्था ने भारत की शिक्षा और चिकित्सा दोनों को चौपट कर रखा है। महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डाॅ. रामनोहर लोहिया ने इस राष्ट्रीय कलंक के विरुद्ध क्या-क्या नहीं कहा था? इस औपनिवेशिक और पूंजीवादी मनोवृत्ति के खिलाफ हमारे वामपंथियों ने भी जब-तब बोला और लिखा है लेकिन अब देश के सर्वोच्च न्यायाधीश यह बात बोल रहे हैं तो वे सिर्फ बोलते ही न रह जाएं। इस दिशा में कुछ करके भी दिखाएं।

वोट और नोट तो नेताओं की प्राण-वायु है

वेदप्रताप ने देश की अदालत में उपयोग हो रही भाषाओँ पर सवाल उठाते हुए कहा कि, भारत की सभी अदालतों में भारतीय भाषाओं में फैसले और बहस भी हों, ऐसी घोषणा वे (धनंजय चंद्रचूड़) क्यों नहीं करते? वे संसद को सारे कानून हिंदी में बनाने के लिए बाध्य या प्रेरित क्यों नहीं करते? गृहमंत्री अमित शाह ने इस प्रक्रिया का रास्ता दिखा दिया है। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से कहा है कि वह अपने स्कूल-कालेजों की पढ़ाई तमिल माध्यम से क्यों नहीं करवाती? अब से लगभग 30 साल पहले जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह और मैं, चेन्नई में मुख्यमंत्री करूणानिधि से मिलने गए थे तो उनका पहला सवाल यही था कि ‘आप दोनों यहां क्या हम पर हिंदी थोपने के लिए आए हैं?’ तो हमारा जवाब था, ‘हम आप पर तमिल थोपने आए हैं।’ यही बात अब अमित शाह ने बेहतर और रचनात्मक तरीके से कह दी है। दक्षिण भारत के नेता ‘हिंदी लाओ’ और ‘अंग्रेजी हटाओ’ का विरोध तो कर सकते हैं लेकिन ‘तमिल पढ़ाओ’ का विरोध किस मुंह से करेंगे? यदि करेंगे तो उनके वोट-बैंक में चूना लग जाएगा। वोट और नोट तो नेताओं की प्राण-वायु है। उसके बिना उनका दम घुटने लगता है। चंद्रचूड़ और अमित शाह ने उनकी प्राणवायु को स्वच्छ बना दिया है।

Also read- लिव-इन में खौफनाक कत्ल, प्रेमी ने प्रेमिका के किये 35 टुकड़े, दिल्ली के अलग-अलग कोने में लगाया ठिकाना

vickynedrick@gmail.com

vickynedrick@gmail.com https://nedricknews.com

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds