Ajit Ranade News: 12 लाख तक टैक्स फ्री! लेकिन क्या यह सही कदम? दिग्गज अर्थशास्त्री ने क्यों उठाए बड़े सवाल?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 03 फ़रवरी 2025, 05:30 AM Updated: 03 फ़रवरी 2025, 05:30 AM
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Ajit Ranade News: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2025-26 में मध्यम वर्ग को बड़ी राहत देते हुए इनकम टैक्स छूट की सीमा को 12 लाख रुपये तक बढ़ाने की घोषणा की। इस फैसले से 6.3 करोड़ से अधिक करदाताओं को सीधा फायदा मिलेगा, जो भारत के कुल करदाताओं का 80% हैं। हालांकि, जहां एक तरफ यह खबर टैक्सपेयर्स के लिए राहत लेकर आई, वहीं दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों ने सरकार की इस नीति की आलोचना भी की है।

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आर्थिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ अर्थशास्त्री अजीत रानाडे ने इस निर्णय के दीर्घकालिक प्रभावों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का टैक्स बेस बढ़ाने का उद्देश्य और इतनी बड़ी टैक्स छूट देने की नीति एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं।

टैक्स छूट से सरकार के राजस्व पर असर? (Ajit Ranade News)

रानाडे ने अपने एक लेख में बताया कि भारत में 8 करोड़ लोग इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते हैं, लेकिन इनमें से केवल 2.5 करोड़ लोग ही शून्य से अधिक टैक्स का भुगतान करते हैं। बाकी टैक्सपेयर्स छूट और अन्य कर कटौतियों की वजह से टैक्स नहीं भरते। उन्होंने बताया कि नई कर नीति के तहत अब अधिक लोग कर देने के दायरे से बाहर हो जाएंगे।

Ajit Ranade News Budget 2025-26
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इसके अलावा, रानाडे का मानना है कि 12 लाख रुपये की टैक्स छूट अत्यधिक उदार है क्योंकि यह भारत की प्रति व्यक्ति आय का 500% है। उन्होंने दावा किया कि दुनिया के किसी भी देश में इतनी बड़ी कर छूट नहीं दी जाती।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह नीति सरकार के टैक्स नेट को विस्तारित करने के प्रयासों के खिलाफ जाती है? भारत में पहले से ही बहुत कम लोग इनकम टैक्स देते हैं, और इस निर्णय के बाद करदाता आधार और भी संकुचित हो जाएगा, जिससे सरकार के राजस्व पर असर पड़ेगा।

क्या जीएसटी टैक्स प्रणाली का विकल्प हो सकता है?

कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि सरकार इनकम टैक्स को पूरी तरह से खत्म करके मजबूत जीएसटी संग्रह पर ध्यान केंद्रित कर सकती है। हालांकि, रानाडे ने इस विचार को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि जीएसटी एक प्रतिगामी कर (regressive tax) है, जिसका असर गरीब और मध्यम वर्ग पर अमीरों की तुलना में अधिक पड़ता है।

उन्होंने कहा, “जीएसटी की वर्तमान औसत दर 18% है और कुछ वस्तुओं पर यह 28% तक जाती है, जो आम लोगों की जेब पर भारी पड़ती है। यदि सरकार को उपभोग-आधारित कर प्रणाली की ओर बढ़ना है, तो जीएसटी की दरों को 10% तक कम करना चाहिए।”

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उन्होंने आगे तर्क दिया कि जीएसटी कलेक्शन में कोई ‘बंपर ग्रोथ’ नहीं हुई है। पिछले आठ वर्षों में जीएसटी से मिलने वाला राजस्व भारत की नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर से भी धीमी गति से बढ़ा है। इससे यह साबित होता है कि सरकार के राजस्व स्रोत को केवल अप्रत्यक्ष करों पर निर्भर करना एक सही रणनीति नहीं होगी।

भारत में प्रगतिशील टैक्स प्रणाली की जरूरत

रानाडे ने सुझाव दिया कि भारत को एक अधिक प्रगतिशील कर प्रणाली की ओर बढ़ना चाहिए, जिसमें अमीरों पर अधिक कर का बोझ हो। उन्होंने कहा कि कनाडा जैसे देशों में निम्न आय वाले परिवारों को जीएसटी में छूट दी जाती है, ताकि वे इस कर प्रणाली के बोझ से बच सकें।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत में ऐसी योजनाओं को लागू करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इससे कर प्रणाली और अधिक जटिल हो जाएगी।

क्या यह नीति चुनावी रणनीति है?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह इनकम टैक्स में दी गई बड़ी राहत 2026 के लोकसभा चुनावों से पहले मध्यम वर्ग को लुभाने की एक रणनीति हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों के कारण मध्यम वर्ग पर वित्तीय दबाव बढ़ा है। ऐसे में सरकार ने टैक्स छूट बढ़ाकर जनता को राहत देने का प्रयास किया है।

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