‘बहन’ के गहने बेच डॉ अंबेडकर के लिए किताब लाया करते थे पिता रामजी सकपाल

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 13 सितम्बर 2023, 05:30 AM Updated: 13 सितम्बर 2023, 05:30 AM
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Ambedkar Motivational story in Hindi – हम सब जानते है कि बाबा साहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के मऊ गावं में हुआ था. उनके परिवार की जड़े महार जाति से जुडी हुई थी, जिससे उस समय अछूत जाति के रूप से देखा जाता था. आजाद भारत के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव अपने जमाने के सबसे पढ़े लिखे व्यक्तियों में से थे. उन्होंने अपने पूरे जीवन में 32 डिग्री प्राप्त की थी, इसके साथ ही उन्होंने 9 भाषाओँ का ज्ञान भी ग्रहण किया था. बाबा साहेब को पढने लिखने का शौक बचपन से ही है. उन्हें हमेशा किताबों के आस पास देखा जाता था. हम आपको बता दे कि जब बाबा साहेब की मृत्यु हुई थी, तो उनके पास 35 हजार किताबें मिली थी. उन्हें बचपन से ही खेलने कूद का कोई शौक नहीं था, उनका सारा दिन किताबों के आस पास ही गुजर जाता था.

दोस्तों, आईये आज हम आपको बताएंगे कि बाबा साहेब अम्बेडकर को किताबों का इतना शौक क्यों था ? क्यों उनके पिता ने बाबा साहेब के लिए अपनी बहन के गहने बेचने पड़े थे? बाबा साहेब अम्बेडकर उनके पिता की किन बातों को हमेशा याद रखते थे.

और पढ़ें : देश के सबसे पढ़े लिखे शख्स डॉ अंबेडकर श्रीमद्भगवद्‌गीता के घोर आलोचक क्यों थे? 

बाबा साहबे के पिता ब्रिटिश आर्मी में थे

बाबा साहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के मऊ गावं में हुआ था. उनके परिवार की जड़े महार जाति से जुडी हुई थी, जिससे उस समय अछूत जाति के रूप से देखा जाता था. बाबा साहेब के पिता रामजी ब्रिटिश आर्मी में थे. बाबा साहेब, रामजी और भीमाबाई के 14वें संतान थे. उनके 7 संतान तो शिशु अवस्था में मर गए. जिसके चलते बाबा साहबे का पालन पोषण बहुत लाड प्यार से किया गया. बाबा साहेब अपने सारे बहन भाइयों में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे थे. उनके भाई बहनों का पढाई में मन भी नहीं लगता था. इसीलिए बाबा साहेब के पिता का सारा लाड अपने पढ़ाकू बेटें पर लुटाया जाता था. रामजी को खुद कई भाषाओँ का ज्ञान था. उनके रास्ते पर चल कर तो अपने जीवन भर पढाई नहीं छोड़ी.

बाबा साहेब (Ambedkar Motivational story in Hindi) के पिता रामजी संत कबीर के अनुयायी थे, उनके विचारों का पालन करते थे. रामजी शाकाहारी थे और सिगरेट शराब से पहरेज रखते थे. बाबा साहेब के चाचा गोसावी पंथ के सन्यासी थे, उनकी एक बार बाबा साहेब के माता पिता से भेंट हुई थी. तब उन्होंने कहा था कि तुम्हारे घर एक महान व्यक्ति का जन्म होगा, जो मानव कल्याण के लिए काम करेगा.

बहन के गहने बेच अंबेडकर के लिए किताब लाया करते थे रामजी

चांगदेव भवानराव जी ने अपनी किताब “डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर” में लिखा ही की बाबा साहबे ने बताया था कि ‘मेरी बी.ए. की परीक्षा के लिए मेरे पिता जी बहुत परेशान रहते थे’. वह चाहते थे कि मैं खूब पढूं और ब्रिटिशों के लिए आर्मी में नौकरी न करूं. रामजी बाबा साहेब को परीक्षा के समय पढ़ने के लिए सुबह 2 बजे उठा देते थे.

रामजी लगातार अपने बेटे को पढाई के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे. जब भी कभी बाबा साहेब को किसी किताब की जरूरत होती थी, तो उस किताब खरीदने में रामजी कभी कंजूसी नहीं करते थे. रामजी की पेंशन घर के खर्चों और बाबा साहेब की पढाई के लिए काफी नहीं थी. ऐसे में रामजी अपनी बहन के पास पहुंच जाते थे. और अपनी बहन के गहनों को गिरवी रखकर बाबा साहेब के लिए किताब लेकर आते थे. जब पेंशन आती थी तो अपनी बहन के गहनों को गिरवी से छुटवा कर वापिस अपनी बहन को दे देते थे. बाबा साहेब जब तक सेना आवास में रहे, तब तक उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा था, लेकिन बाद में पूरा जीवन जातिगत भेदभाव में निकल गया.

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