India Japan Relations: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते रणनीतिक समीकरणों के बीच जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची का भारत दौरा काफी अहम माना जा रहा है। हाल के दिनों में चीन को लेकर जापान का रुख पहले से ज्यादा सख्त दिखाई दिया है। ताइवान को लेकर दिए गए उनके बयान के बाद बीजिंग और टोक्यो के बीच तनाव बढ़ा है। ऐसे समय में उनकी भारत यात्रा ने इस सवाल को भी चर्चा में ला दिया है कि क्या भारत भविष्य में जापान की चीन-केंद्रित इंडो-पैसिफिक रणनीति के साथ और करीब आएगा या अपनी मौजूदा संतुलित विदेश नीति पर कायम रहेगा।
जापानी प्रधानमंत्री की इस तीन दिवसीय यात्रा के दौरान भारत और जापान के बीच रक्षा, व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोगैस, ऊर्जा सुरक्षा और उन्नत तकनीक जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि इन समझौतों के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को और मजबूत करना है।
चीन को लेकर जापान का बदला रुख| India Japan Relations
हाल के महीनों में जापान ने चीन को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट रुख अपनाया है। ताइवान की सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री सनाए तकाइची का सार्वजनिक बयान इसी बदलाव का संकेत माना जा रहा है। इसके बाद चीन की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया भी सामने आई। विशेषज्ञों का मानना है कि जापान अब उन देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करना चाहता है जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित हैं। भारत इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
高市総理によるインド訪問の様子です。 pic.twitter.com/Ytoqo5hyPx
— 首相官邸 (@kantei) July 3, 2026
भारत से जापान की क्या उम्मीदें?
टोक्यो स्थित वासेडा यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के असिस्टेंट प्रोफेसर बेन एस्कियोन ने This Week in Asia से बातचीत में कहा कि भारत और जापान दोनों के लिए सुरक्षा और आर्थिक सहयोग प्राथमिकता हैं। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री तकाइची जापान की सुरक्षा नीति में तेजी लाना चाहती हैं और भारत को इस रणनीति का महत्वपूर्ण साझेदार मानती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत किस हद तक जापान के सुरक्षा एजेंडे के साथ कदम मिलाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
एस्कियोन का कहना है कि भारत का रुख अक्सर चीन के साथ उसके संबंधों की स्थिति पर निर्भर करता है। जब भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ता है तो नई दिल्ली अमेरिका और जापान जैसे साझेदारों के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए ज्यादा तैयार दिखाई देती है। वहीं रिश्ते अपेक्षाकृत स्थिर होने पर भारत संतुलित नीति अपनाने की कोशिश करता है।
रणनीतिक साझेदारी पर जोर
नई दिल्ली पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री तकाइची ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनका उद्देश्य भारत-जापान “विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी” को और मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत में आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों पर विशेष चर्चा होगी। साथ ही दोनों देशों के बीच पूरक सहयोग को बढ़ाने और रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई देने पर भी फोकस रहेगा।
सेमीकंडक्टर और नई तकनीक पर बड़ा दांव
भारत और जापान के बीच तकनीकी सहयोग भी तेजी से बढ़ रहा है। जापानी कंपनियां भारत के सेमीकंडक्टर क्षेत्र में बड़े निवेश की तैयारी कर रही हैं। पूर्वोत्तर भारत में प्रस्तावित बड़े सेमीकंडक्टर प्लांट को भी इस साझेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि दोनों देश चिप निर्माण और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। वैश्विक सप्लाई चेन को मजबूत बनाने की दिशा में यह सहयोग अहम माना जा रहा है।
रुपये और येन में व्यापार पर चर्चा
जापानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों के बीच रुपये और येन में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने पर भी चर्चा हो रही है। यदि इस दिशा में प्रगति होती है तो भारत और जापान के बीच कुछ लेनदेन अमेरिकी डॉलर के बजाय अपनी-अपनी मुद्राओं में किए जा सकेंगे। इससे व्यापारिक लागत कम करने और वित्तीय सहयोग बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
क्या भारत जापान की रणनीति का हिस्सा बनेगा?
वासेडा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर तोशिमित्सु शिगेमुरा का मानना है कि जापान की मौजूदा विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य ऐसे साझेदारों का नेटवर्क तैयार करना है जो चीन से जुड़े सुरक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर सहयोग कर सकें। उन्होंने South China Morning Post से बातचीत में कहा कि जापान केवल भारत ही नहीं, बल्कि दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। इन देशों के चीन के साथ समुद्री और क्षेत्रीय विवाद रहे हैं।
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