Sikh Warriors: ये बात है सन 1839 का। पंजाब में सिख साम्राज्य की स्थापना करने वाले और हमेशा अजय रहने वाले शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी की मात्र 54 साल की उम्र में बीमारी के कारण 27 जून 1839 में मौत हो गई, और पीछे रह गया एक विशाल सिख साम्राज्य जो कि अफगानिस्तान से लेकर कश्मीर और तिब्बत तक फैला हुआ था। लेकिन तब किसी को ये अंदाजा नहीं था कि उनके वफादार भी केवल उनके मरने का ही इंतजार कर रहे थे, महाराजा के निधन के बाद कब से सिख साम्राज्य पर अपनी गिद्ध जैसी नजरें टिका कर बैठे अंग्रेजों को मौका मिला पंजाब को अपने अधीन करने का और महारानी जिंद कौर की लाख कोशिशों के बाद भी वो सिख साम्राज्य का पतन नहीं रोक सकी, तब पहली बार सिख और ब्रिटिश हुकूमत आमने सामने आए थे, जिसे हम सभी प्रथम सिख एंग्लो युद्ध कहते हैं जो साल 1845 में हुआ था, लेकिन इस युद्ध ने सिख रियासत की कमर तोड़ दी थी। अपने इस लेख में हम बात करेंगे 1845 के जब सिख और अंग्रेज आमने सामने आए तो क्या हुआ। और कैसे सिखो को अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी थी।
1799 में लाहौर पर जीत हासिल की
1801 में जब महाराजा रणजीत सिंह को महाराजा की उपाधि मिली थी, उससे पहले ही उन्होंने अपनी ताकत दिखा दी थी, मात्र 12 साल की उम्र में युदध का लड़ना औऱ विजय प्राप्त करना आसान नहीं थी, लेकिन ये कारनामा शेरे ए पंजाब ने कर दिखाया था.. सिख सम्राज्य की स्थापना से पहले ही 1799 में उन्होंने लाहौर पर जीत हासिल कर ली थी। इतना ही नहीं अंग्रेजी हुकुमत का सामना करने के लिए महाराजा ने अपनी सेना को न केवल आधुनिक युद्ध कला सिखाई बल्कि विशेष रूप से फ्रांसीसी और इतावली जनरलो को नियुक्त करके उनकी खालसा सेना को प्रशिक्षण दिलाते थे। जिसके कारण खालसा सेना भारतीय युद्ध कौशल के साथ साथ यूरोपियन युद्ध कौशल में पारंगत हो गई थी, जिसके कारण अंग्रजी हुकुमत को पता था कि अगर उन्होंने खालसा सेना से पंगा लेने की कोशिश की तो उन्हें ही मुंह की खानी पड़ेगी.. इसलिए वो महाराजा के खिलाफ भले ही बैर रखे लेकिन उनके खिलाफ नहीं गए.. मगर उनके निधन के बाद कहानी बदल गई।
5 साल के दलीप सिंह को 1843 में गद्दी पर बिठाया
महाराजा रणजीत सिंह के पहले उत्तराधिकारी और बड़े बेटे खड़क सिंह को साजिश के तहत अयोग्य करार दे दिया गया और राजा नही बनने दिया गया, और उनकी हत्या कर दी गई, फिर उनके बेटे नौनिहाल सिंह की एक हादसे में मौत हो गई,, अब ये हादसा थी या हत्या, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन जब अगले उत्तराधिकारी शेर सिंह के गद्दी पर बैठने का समय आया तो भेदियों ने उनकी भी हत्या कर दी..ऐसे में महाराजा के तीसरी पत्नी के इकलौते 5 साल के बेटे दलीप सिंह को 1843 में गद्दी पर बिठाया गया था, वहीं जिंद कौर खुद एक बेहतरीन शासिका थी इसलिए वो रिजेंट के तौर पर दलीप सिंह का मार्गदर्शन करने लगी। लेकिन एक छोटे से राजकुमार का राजा बनना उस दौरान कुछ दरबारियों को नहीं भाया, जिसमें सिख सिंधानवालिया और हिंदू डोगरा शामिल है।
अजीत सिंह सिंधानवालिया ने शेर सिंह की हत्या की
दरअसल महाराजा के उत्तराधिकारियों के जाने के बाद शेर सिंह को जनवरी 1841 में सिख साम्राज्य का महाराजा बनाया गया, और ध्यान सिंह डोगरा को प्रधानमंत्री बनाया गया था, लेकिन सेना के तेजी हुए विस्तार के कारण सेना की मांगो को शेर सिंह पूरा नहीं कर सकें.. दरअसल जमींदारों और उनके आश्रितों ने भी हथियार उठा लिए थे, जिसे ब्रिटिश पर्यवेक्षकों ने “खतरनाक सैन्य लोकतंत्र” कहकर निंदा की थी, वहीं सेना में बढ़ता अविश्वास के कारण सितंबर 1843 में सेना अधिकारी अजीत सिंह सिंधानवालिया ने शेर सिंह की हत्या कर दी। लेकिन इससे डोगरा समुदाय ने फिर से महारानी जिंद कौर की मदद की और दलीप सिंह राजा घोषित कर दिया। लेकिन उनके लिए सबसे बड़े खतरे पशौरा सिंह की हत्या की साजिश रचने के जुर्म में दलीप सिंह के मामा और तत्कालीन वजीर सिंह की हत्या कर दी गई..जबकि उस वक्त तक सेना पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुकी थी।
लेकिन अंग्रेज भी शांति से नहीं बैठे थे, उन्होंने पंजाब के आसपास विस्तार बढ़ाया, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने फिरोजपुर में एक सैन्य छावनी स्थापित की , जो सतलुज नदी से कुछ ही मील दूर थी, और दोनो सम्राज्य की सीमा थी। अंग्रेजो को शांत करने के लिए पहले ही 1843 में पंजाब के दक्षिण में स्थित सिंध को उन्हें दे दिया गया था, लेकिन अंग्रेजी हुकुमत यहीं नहीं रूकी, उसने पुल बनाने वाली रेलगाड़ियाँ वहां तैनात की, घेराबंदी तोपखाने तैयार किये, जिससे खालसा सेना में तनाव बढ़ गया था।
11 दिसंबर 1845 को पहली बार संघर्ष
महाराजा की मृत्यु के बाद जो सेना बढ़ी वो पूर्ण रूप से प्रशिक्षित नहीं थी, जिसका खामियाजा आगे जाकर भुगतना पड़ा। 1845 में खालसा सेना में लगभग 153,000 नियमित और अनियमित सैनिक थे, लेकिन उनका नेतृत्व करने वाले लाल सिंह और तेज सिंह ने यहां अंग्रेजी हुकुमत के साथ हाथ मिला लिया और सिख सैनिकों के साथ छल कर दिया। इन दोनो ने खालसा सेना की हर गतिविधी को ब्रिटिश हुकुमत को दी, जिससे सेना की हर प्लानिंग का अंग्रेजो को पहले से पता होता था। वहीं ईस्ट इंडिया कंपनी और सिख दरबार के बीच पहले हुए संधि आपनी आरोपो और असंवैधानिक मांगो के कारण टूट गई, जिससे नाराज खालसा सेना ने गुरदासपुर की तरफ कूच कर दिया था। 11 दिसंबर 1845 को पहली बार संघर्ष हुआ जब सिख सेना सतलुज नदी को पार करके मोरन गाँव तक ही जा रहे थे, लेकिन अंग्रेजी हुकुमत उस पर अपना हक मानती थी, और उन्होंने युद्ध की घोषणा कर दी।
प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध
वडनी में राजा अजीत सिंह प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के दौरान सबसे पहले अंग्रेजो के खिलाफ लड़े, लेकिन वो हार गए, 30 दिसंबर को वुडनी के सिख रक्षकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था, फिर बारी आई फिल्लौर की, जहां लोधी किले की बनावट के कारण अजीत सिंह को अंग्रजी हुकूमत को हराने में मदद मिली। लेकिन वहीं दूसरी तरफ मुदरी के युद्ध में जब लाल सिंह और तेज सिंह ने फिरोजपुर में ब्रिटिश चौकी पर हमला करने की कोशिश की तो 18 दिसंबर 1845 की रात को ही अंग्रेजो ने उन्हें हरा दिया.. ये वाकई में हार थी या नहीं.. वो तो उनकी गद्दारी से साफ हो जाता है।
21 दिसंबर को फिरोजपुर में लाल सिंह की चाल के कारण सिख सेना जीतते जीतते रह गई क्योंकि लाल सिंह ने सिख सेना के कुलीन सैनिक, अनियमित घुड़सवार सेना गफ की पैदल सेना और घुड़सवार सेना को मदद के लिए आगे ही नहीं बढ़ने दिया था। जिससे अंगर्जो को यहां जीत मिली, इसके बाद बद्दोवाल का युद्ध 21 जनवरी 1846 को लड़ा गया, इसके बाद वो आगे बढ़ी और अलीवाल की लड़ाई 28 जनवरी 1846 को हुई और रंजुर की इसमें हार हुई। इसके बाद 10 फरवरी 1846 को सोबराओन की लड़ाई लड़ी गई थी, लेकिन तब तक लगातार हार से और सिख कमांडर की उदासीनता से सिख सेना में अविश्वास औऱ ज्यादा भर गया।
यहां सिख सैनिकों का भारी नुकसान हुआ, सिखों के 8,000 से 10,000 सैनिक मारे गए थे औऱ 67 तोपें भी जब्त कर ली थी। इसके बाद 9 मार्च 1846 को लाहौर की संधि की गई, जिसके तहत लाहौर दरबार को 15 मिलियन रुपये हर्जाना भरने को कहा गया, लेकिन अस्थिर हो चुके लाहौर दरबार ने इसमें समर्थता दिखाई तो बदले में कश्मीर, हजारा और ब्यास और सिंधु नदियों के पास के सभी किले, क्षेत्र, अधिकार अंग्रेजी हुकुमत को दे दिये गए। बात साफ है अगर सिख जनरलों ने विश्वासघात न किया होता को सिख सम्राज्य का कभी पतन नहीं होता।




























