क्या आप जानते हैं? 1947 के बाद 1961 में भी हुआ था भारत-पाक के बीच जमीनों का आदान-प्रदान – India Pakistan land Exchange

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 11 मई 2026, 04:15 PM Updated: 11 मई 2026, 04:15 PM
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India Pakistan land Exchange : आज से करीब 79 साल पहले जब भारत को अंग्रेजो की गुलामी से आजादी मिली थी, या ये कहे कि आजादी दी गई थी.. तब किसी ने नहीं सोचा था कि इसकी कीमत केवल भारत का बंटवारा ही नहीं होगा, बल्कि करीब 10 लाख से भी ज्यादा लोगो को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी। करीब 83 हजार महिलाओं को अपनी आबरू खो कर चुकानी पड़ेगी। लेकिन अंग्रेजो ने जिस आनन फानन में बंटवारा किया वो सबूत था कि अंग्रेज कभी नहीं चाहते थे कि दोनो देशो के बीच शांति स्थापित हो। इस बंटवारे में केवल जमीन के ही दो टुकड़े नहीं हुए थे बल्कि एक नया देश बनाने और इसे बसाने के लिए सबसे ज्यादा सिखों की भावनाओं से खेला गया।

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पंजाब का विभाजन तो कर दिया गया लेकिन सिख नेताओ की सिख धरोहरो को बचाये रखने की सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया गया। नानकाना साहिब और करतारपुर साहिब जैसे सिख धर्म के सबसे महत्वपूर्ण स्थलो को जल्दबाजी में पाकिस्ताव को सौंपना ही सबसे बड़ा धोखा था। लेकिन आजादी के समय दोनो तरफ के सिखों और हिंदुओ ने जो झेला, उसे तो कोई बुरे ख्वाब में भी नहीं भुला पायेगा लेकिन क्या आप ये जानते है कि आजादी के बाद भी फिर से 14 सालों के बाद पाकिस्तान के लिए भारत के एक बार और टुकड़े किये गए और इस बार पाकिस्तान को एक जिले के बदले 12 गांवो दे दिये थे, अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि आखिर क्यों 14 सालों के बाद फिर से बांटा गया भारत।

आजादी के समय भारत से पाकिस्तान को क्या मिला

भारत पाकिस्तान के बंटवारे से पहले अंग्रेजी हुकुमत ने तय कर लिया था कि वो 15 अगस्त तक भारत छोड़ कर चले जायेंगे, तब आनन फानन में पाकिस्तान के हिस्से में क्या देना है उस पर चर्चा तेज हुई। मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना ने सीधे तौर पर बंटवारे के लिए बंगाल विभाजन करने वाले सिरिल रेडक्लिफ को पंजाब का बंटवारा करने के लिए बुलाया। रेडक्लिफ को बंटवारे के लिए 6 हफ्ते का समय मिला.. बात पहले से क्लीयर थी, अल्प संख्यक और बहुसंख्यको के आधार पर बंटवारा होगा..वहीं 1941 में जनगणना के अनुसार तय किया गया कि कौन सा इलाका किसे देना है।

पश्चिमी पंजाब और पूर्वी पंजाब को मिला कर करीब 1 लाख 75000 वर्गमील क्षेत्र का विभाजन करना था। जब बंटवारा हुआ तब पंजाब के कुल 29 जिलों में से 16 जिले पाकिस्तान के हिस्से में दे दिये गए जबकि 13 जिले भारत को दिये गये थे। मात्र 5 से 6 हफ्ते में सर सिरिल रेडक्लिफ ने भारत के चार राज्यों पंजाब, राजस्थान, गुजराज और जम्मू कश्मीर के बीच 3323 किलोमीटर की लाइन खींच दी थी.. लेकिन इतना ही काफी नहीं था.. भारत की तरफ पाकिस्तान को बंटवारे में काफी कुछ दिया गया।

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क्या मिला पाकिस्तान को

सिख नेता चाहते थे कि नानकाना साहिब और करतारपुर साहिब जैसे पवित्र सिख धार्मिक स्थल भारत में रहे लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन ने इस अपील पर ध्यान न देते हुए इसे पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया। वहीं इसी के साथ जमीनों, जंगलो, खेत खलिहानों, प्रशासनिक दफ्तर और वहां के रखे सामानो का बंटवारा, नदियों और नहरो का बंटवारा किया गया था। पूर्वी पंजाब से गोपीचंद भार्गव और सवर्ण सिंह और पश्चिमी पंजाब से मुमताज दौलताना और जाहिद हुसैन को सैंट्रल पार्टिशन कमीटी द्वारा गठित पंजाब पार्टिशन कमिटी का सदस्य चुना गया जो ये तय करते कि किस देश को कितनी संपत्ति मिलेगा।

जिसमें सबसे पहले पंजाब यूनिवर्सिटी जो लाहौर में थे, उसे भारत चाहता था कि वो दोनो देशों की सांझा संपत्ति हो लेकिन लाहौर में होने के कारण वो पाकिस्तान को दे दिया गया। क्योंकि पाकिस्तान ने यूनिवर्सिटी सांझा करने से साफ इंकार कर दिया। लाहौर हाइकोर्ट पाकिस्तान को दिया गया। दोनो देशो में तय हो गया था दोनो अपने सचिवालय बनायेंगे। वहीं तय हुआ कि पूर्वी पंजाब को 38% भूमि और 31% राजस्व दिया जायेगा तो वहीं पश्चिमी पंजाब को 55.6% हिससा मिलेगा.. वहीं पश्चिमी पंजाब के सिर पर नहरो का खर्च उठाने की जिम्मेदारी दी गई तो वहीं पूर्वी पंजाब केवल 40 प्रतिशत खर्च उठायेगा।

वहीं सतलुज के नहरो का नियंत्रण भारत को मिला.. लेकिन 1919 की सतलुज संधि के अनुसार समझौता हुआ कि भारत को 20 साल तक सतलुज के पानी के उपयोग के लिए ₹72 लाख,20 हजार रूपय पाकिस्तान को देने होंगे। वहीं तय हुआ कि सतलुज के साथ पूर्वी नदियाँ, रावी और व्यास पर भारत का नियंत्रण होगा तो वहीं पश्चिमी नदियों झेलम, चेनाब और सिंधु पर पाकिस्तान का नियंत्रण होगा।

क्यों किया गया फिर से बंटवारा

भारत पाकिस्तान के बीच सब कुछ बंट गया था लेकिन गुरदास पुर के भारत को मिलने से पाकिस्तान खुश नहीं था..जबकि भारत ने पाकिस्तान को 75 करोड़ रूपय भी दिये थे, सैनिकों और हथियारो का 17.5 प्रतिशत हिस्सा भी.. लेकिन इन सभी के बीच एक इलाका ऐसा था जो भारत के लिए काफी अहम था, ये स्थान था ‘हुसैनीवाला’… हालांकि इसके बदले तत्कालीन प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को अपने 12 गांव दिये थे, लेकिन ‘हुसैनीवाला’ भारत के लिए काफी अहम था ये वहीं स्थान है जहां आजादी के तीन मतवाले भारत मां के सपूत भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव की समाधि हैं।

बंटवारे के बाद हुसैनीवाला गांव पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का हिस्सा था, लेकिन हम सभी जानते है कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में चोरी छिपे फांसी दे दी गई थी जबकि ये फांसी 24 मार्च को होनी थी.. इतना ही नहीं फांसी के बाद अंग्रेजी हुकुमत ने तीनों के शवों को हुसैनीवाला गांव में लाकर छिप कर अंतिम संस्कार करने की कोशिश की थी, लेकिन तब तक गांव वालो को पता चला गया.. तो अंग्रेजी हुकूमत भाग खड़ी हुई.. यहीं पर उनका अंतिम संस्कार करके समाधि बनाई गई।

मगर आजादी के बाद वो पाकिस्तान का हिस्सा बन गया, मगर तीनो शहीदो के परिवार वालों को ये मंजूर नहीं था और उन्होंने पंडित नेहरू से उसे वापिस भारत में लाने की अपील की। जिसके बाद 1961 में नेहरू ने पाकिस्तान से हुसैनीवाला के बदले 12 गांव देने का वादा दिया, जिसे पाकिस्तान मान गया। और इस तरह से फिर से एक बंटवारा हुआ और वो भी हमारे वीर सपूतो की धरोहरो को बचाने के लिए। जिसके लिए सिख हमेशा नेहरू के शुक्रगुजार रहेंगे।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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