Guru Nanak Dev Ji Mecca visit: अगर आपसे ये पूछा जाये कि सिख धर्म के पहले गुरु नानक देव जी के पहले पुरुष और महिला अनुयायी कौन थे तो आपका जवाब क्या होगा.. जी हां, गुरु साहब की पहली महिला अनुयायी उनकी खुद की बड़ी बहन माता नानकी थी, तो वहीं पहले पुरुष अनुयायी थे दाना मिरासी.. दाना मिरासी..जो उनके बचपन के मित्र थे, और मिरासी मुस्लिम परिवार से आते थे.. माता पिता की 7 संतानों में से बची इकलौती संतान.. जिन्होंने इस्लामिक परंपरा को छोड़ कर गुरु साहिब के बताये मार्ग पर चलने का फैसला किया..जब गुरू जी गुरबाणी गाते थे तो दाना मिरासी रबाब बजाते थे।
जो गुरु साहिब के साथ सायें की तरह मृत्यु तक थे। शायद आप दाना मिरासी के नाम से उन्हें न पहचान पा रहे हो, तो आपको उनका वो परिचय देते है जिसे आप जानते है .. जी हां हम बात कर रहे भाई मरदाना की.. जो गुरु साहिब के सिख धर्म के प्रचार प्रसार में उनके साथ थे, ऐसे में जब पहली बार भाई मरदाना एक इच्छा उनके सामने रखी तो गुरू साहिब ने बिना हिचक उस तरफ कूट कर दिया.. लेकिन उस स्थान पर गुरु साहिब ने कुछ ऐसा किया जिसने हजारों अनुयायियो को ये समझाया कि परमात्मा हर दिशा में.. हर चल अचल. निर्जिव सजीव वस्तु में विराजमान है। अपने इस वीडियो में जानेंगे गुरु साहिब की मक्का की यात्रा के बारे में.. जब गुरु ने ईश्वर के कण कण में विद्यमान होने का संदेश दिया था।
जब गुरु साहिब मक्का मदीना की यात्रा पर पहुचे – Guru Nanak Dev Ji Mecca visit
ये बात 1511 के आसपास की है, गुरु साहिब अपने मित्र भाई मरदाना के साथ सिख धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए पूर्व, उत्तर और दक्षिण की यात्रा करके लौटे थे.. इसी बीच भाई मरदाना ने इच्छा जाहिर की कि वो हज के लिए मक्का मदिना जाना चाहते है। भाई मरदाना गुरु साहिब को बेहद प्यारे थे, उनकी आखिरी उदासी अभी भी बची थी.. बस फिर क्या गुरु साहिब ने तय कर लिया कि वो अब उदासी करने के लिए पश्चिम की तरफ जायेंगे.. औऱ वो निकल पड़े मक्का मदीना औऱ बगदाद की यात्रा पर। कई महीनों की यात्रा के बाद वो अरब देश मक्का पहुंचे थे, हालांकि भाई मरदाना भले ही गुरु साहिब के विचारों पर चलते थे लेकिन उन्होंने इस्लाम नहीं छोड़ा था।
इसलिए मक्का पहुंच कर काबा जाकर वहां अरदास करने की इच्छा का गुरु साहिब ने पूरा सम्मान किया और वो स्वयं एक धर्मशाला में रुक गए और भाई मरदाना को काबा के दर्शन के लिए भेज दिया। इसके बाद गुरु साहिब आराम करने के इरादे से धर्मशाला के चबूतरे पर ही काबा की तरफ पैर करके लेट गए। आप शायद ये न जानते हो कि गुरु साहिब ने ही भाई मरदाना को ये नाम दिया था क्योंकि उनके सभी छः भाई बहन कम उम्र में मर गए थे, इसलिए गुरु साहिब ने भाई मरदाना को उनके माता पिता से मांग लिया और उन्हें नाम दिया भाई मरदाना। जिसका पंजाबी में अर्थ होता है मर दा ना। यानी कि न मरने वाला। वो गुरु साहिब से करीब 10 साल बड़े थे, लेकिन वो साये की तरह गुरु साहिब के साथ रहते थे।
काबा के मौलवियों का कराया सच्चाई से सामना – Guru Nanak Dev Ji Mecca visit
कहा जाता है कि गुरु साहिब जिस ओर काबा था उस ओर पैर करके आराम करने लगे.. तभी वहां से गुजरने वाले कुछ मौलवियों ने उन्हें देखा तो वो इसे काबा का अपमान मानकर हंगामा करने लगे.. उन्होंने गुरु साहिब को खरी खोटी सुनाना शुरू कर दिया.. और दिशा बदल कर सोने को कहा। गुरु साहिब लेटे रहे औऱ लेटे लेटे मौलवी से कहा कि वो तो नहीं जानते कि किस दिशा में काबा है.. हां अगर मौलवी को उनके पैरो की दिशा से परेशानी है तो जिस दिशा में ईश्वर न हो उस दिशा में उनके पैर कर दें। मौलवियों ने गुस्से में ऐसा ही किया और गुरु साहिब के पैर दुसरे दिशा में घुमा दिये.. लेकिन तभी उन्होंने देखा कि जैसे जैसे गुरु साहिब के पैर घूम रहे थे काबा भी उसी दिशा में घूम रहा था। जिससे मौलवियों को अहसास हुआ कि गुरु साहिब कोई मामूली इंसान नहीं है.. वो कोई सिद्ध पुरुष है .. जिनका सम्मान खुद काबा भी कर रहा है।
मक्का में भी सिख धर्म के विचारों का प्रचार – Guru Nanak Dev Ji Mecca visit
गुरु साहिब ने वहां लोगो को संदेश दिया कि ईशवर सही मायने में हर दिशा में मौजूद है.. हर कण कण में व्याप्त है। बस फिर क्या था मौलनियों ने गुरु साहिब से उनका परिचय पूछा.. तो गुरु साहिब ने उन्हें बताया कि वो ईश्वर के दूत है, जो लोगो को जातपात, भेदभाव की कुरीतियों से बचा कर एक ओमकार का संदेश देने आये है। उन्होंने संदेश दिया कि हर धर्म में संगत सेवा और सबको एक समझा जाना चाहिए। तभी मानव जीवन का ध्येय पूरा हो सकता है।
सिख धर्म ने हमेशा सिखाया कि हर एक मनुष्य ईश्वर की संतान है और सभी बराबर है। गुरु साहिब ने कट्टर इस्लामिक देश मक्का में भी सिख धर्म की विचारों का प्रचार प्रसार किया.. गुरु साहिब ने कभी भी किसी को सिख धर्म अपनाने के लिए प्रेरित नहीं किया बल्कि वो हमेशा मानवता की सेवा को ही सर्वोपरि मानने के लिए कहते थे। गुरु साहिब की ये सीख हमेशा के लिए अमर हो गई।




























