RJD के सिपाही से बिहार के 24वें CM तक, Samrat Choudhary की पगड़ी वाली कसम आज हुई पूरी

Rajni | Nedrick News Bihar Published: 15 Apr 2026, 09:42 AM | Updated: 15 Apr 2026, 09:42 AM

कल तक राजद के सिपाही, आज बिहार के मुख्यमंत्री! राष्ट्रीय जनता दल से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले Samrat Choudhary ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर इतिहास रच दिया है। बिहार की राजनीति में यह एक ऐतिहासिक मोड़ है, क्योंकि राज्य के इतिहास में पहली बार भाजपा का कोई नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा है।

दशकों से बीजेपी इस पल का इंतजार कर रही थी, पार्टी कई बार सत्ता में तो रही, लेकिन उसका सफर हमेशा ‘डिप्टी’ (उपमुख्यमंत्री) तक ही सीमित रहा। अब नीतीश कुमार के इस्तीफे और उनके राज्यसभा जाने के बाद बिहार की सियासी तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

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कैसे बने सीएम?

बिहार की राजनीति में आज एक नया इतिहास रच दिया गया है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद NDA विधायक दल का नेता चुने गए सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) को राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने आज बुधवार सुबह 11 बजे मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। यह न केवल उनके व्यक्तिगत राजनीतिक करियर का शिखर है, बल्कि बिहार भाजपा के लिए भी सबसे बड़ा ऐतिहासिक पल है, क्योंकि पार्टी राज्य के इतिहास में पहली बार ‘बड़े भाई’ की भूमिका में आकर सीधे तौर पर नेतृत्व (CM पद) संभाल रही है।

राजनीतिक सफर

Samrat Choudhary का यहाँ तक पहुँचने का सफर काफी दिलचस्प रहा है। भाजपा के शीर्ष पदों पर अक्सर RSS बैकग्राउंड वाले नेता दिखते हैं, लेकिन सम्राट चौधरी का न तो आरएसएस से कोई पुराना नाता रहा और न ही उन्होंने भाजपा से राजनीति शुरू की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत लालू प्रसाद यादव की पार्टी RJD से की थी, जहाँ वे सबसे कम उम्र के मंत्री भी बने। इसके बाद उन्होंने JD(U) और HAM जैसी पार्टियों में अपनी जमीन मजबूत की और फिर भाजपा में आए। अपनी आक्रामक शैली और कुशल रणनीति के दम पर वे महज 8-9 साल में पार्टी के सबसे बड़े चेहरे बन गए।

विरासत में मिली राजनीति

सम्राट चौधरी को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार के दिग्गज नेताओं में गिने जाते थे, जो सात बार विधायक और सांसद रहे। पिता की इसी सियासी विरासत को आगे बढ़ाते हुए सम्राट ने 90 के दशक में राजनीति में कदम रखा। अपनी पहचान बनाने की ऐसी भूख थी कि वे 1999 में राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बने। आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचकर उन्होंने अपने पिता की उस विरासत को नए शिखर पर पहुँचा दिया है।

विवाद से मिली पहचान

सम्राट चौधरी के नाम एक अनोखा रिकॉर्ड है वे 1999 में राबड़ी देवी सरकार में बिहार के सबसे कम उम्र के मंत्री बने थे। हालांकि यह उपलब्धि विवादों में घिर गई। उस समय उन पर आरोप लगा कि उनकी उम्र मंत्री बनने के लिए निर्धारित न्यूनतम 25 वर्ष से कम है। तत्कालीन राज्यपाल सूरज भान ने जांच में दस्तावेजों को संदिग्ध पाया और उन्हें कैबिनेट से बर्खास्त करने का आदेश दिया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

दिलचस्प बात यह है कि उस समय उनकी बर्खास्तगी की मांग करने वालों में भाजपा (सुशील मोदी) और समता पार्टी के नेता ही सबसे आगे थे। लेकिन राजनीति का चक्र देखिए, 1999 का वही ‘विवादित चेहरा’ आज 2026 में उसी भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनकर उभरा है। कहते हैं न कि राजनीति में चर्चा कभी बेकार नहीं जाती, उस विवाद ने उन्हें रातों-रात पूरे बिहार में चर्चित कर दिया था।

पार्टी बदलने का बड़ा फैसला

सम्राट चौधरी की राजनीति कभी एक जगह ठहरने वाली नहीं रही। राजद में अपनी पहचान बनाने के बाद, वे बेहतर संभावनाओं की तलाश में JD(U) में शामिल हुए और नीतीश सरकार में भी मंत्री रहे। लेकिन स्वाभिमानी स्वभाव के कारण जल्द ही उनके नीतीश कुमार से मतभेद गहरे हो गए। यही वह मोड़ था जब उन्होंने जेडीयू छोड़ भाजपा का दामन थामा। भाजपा में आते ही उन्हें अपनी आक्रामक राजनीति के लिए सही मंच मिला और वे बहुत कम समय में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर अब मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जा पहुँचे।

बीजेपी में मिला असली मुकाम

2017 में भाजपा में शामिल होना सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) के करियर का सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित हुआ। पार्टी को बिहार में एक ऐसे मजबूत ओबीसी चेहरे की तलाश थी जो आक्रामक भी हो और जिसका अपना जनाधार भी हो। बीजेपी ने उन्हें हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते वे विधान परिषद के सदस्य, प्रदेश अध्यक्ष और फिर नेता प्रतिपक्ष बने। उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि वे पहले उपमुख्यमंत्री और अब बिहार के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री के पद तक पहुँच गए हैं। 8 साल के इस छोटे से सफर ने उन्हें पार्टी का सबसे ताकतवर नेता बना दिया।

नीतीश के खिलाफ खुला मोर्चा

2022 में जब नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने भाजपा का साथ छोड़कर महागठबंधन का दामन थामा, तब Samrat Choudhary ने उनके खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया। उन्होंने सिर पर मुरैठा (पगड़ी) बांधकर यह भीषण कसम खाई कि जब तक वे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से नहीं हटा देते, यह पगड़ी नहीं खोलेंगे। उनका यही बेबाक और आक्रामक अंदाज भाजपा आलाकमान को भा गया और वे बिहार में पार्टी का सबसे भरोसेमंद और लड़ाकू चेहरा बन गए। आज मुख्यमंत्री बनकर उन्होंने न केवल अपनी वह कसम पूरी की, बल्कि बिहार भाजपा के नए युग की शुरुआत भी कर दी।

OBC का नया चेहरा

सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) ने बिहार में भाजपा (BJP) के लिए वह कर दिखाया जो अब तक नामुमकिन माना जाता था। उन्होंने कोइरी-कुशवाहा (कुशवाहा) समाज को न केवल पार्टी से जोड़ा, बल्कि नीतीश कुमार के अभेद्य दुर्ग माने जाने वाले लव-कुश वोट बैंक में भी बड़ी सेंध लगाई। बिहार की करीब 8-9% कुशवाहा आबादी को साधकर उन्होंने भाजपा को एक ऐसा सामाजिक आधार दिया, जिसने उन्हें राज्य में ‘छोटे भाई’ की भूमिका से निकालकर आज ‘मुख्यमंत्री’ की कुर्सी तक पहुँचा दिया है।

डिप्टी सीएम से सीएम तक का सफर

उपमुख्यमंत्री के रूप में Samrat Choudhary ने खुद को एक कुशल प्रशासक और भाजपा (BJP) के सबसे भरोसेमंद चेहरे के रूप में स्थापित किया। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में NDA की प्रचंड जीत (202 सीटों के साथ) के बाद उनका कद लगातार बढ़ता गया। उन्हें लंबे समय से नीतीश कुमार का ‘संभावित उत्तराधिकारी’ माना जा रहा था, और हाल ही में अपनी ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान नीतीश कुमार ने खुद उनके प्रति सार्वजनिक रूप से अपना समर्थन जताकर इसके संकेत दिए थे। आज नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में बागडोर संभालकर उस उत्तराधिकार को आधिकारिक बना दिया है।

आखिरकार मिला मौका

बिहार में दशकों तक ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका निभाने वाली भाजपा को जब अपना मुख्यमंत्री चुनने का ऐतिहासिक मौका मिला, तो सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) का नाम सबसे ऊपर रहा। संगठन पर उनकी मजबूत पकड़, विधायकों के बीच उनकी गहरी स्वीकार्यता और हाईकमान का अटूट भरोसा उनके पक्ष में गया। यह उनकी मेहनत और रणनीति का ही परिणाम है कि आज वे बिहार की सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हैं। 15 अप्रैल 2026 की यह सुबह बिहार भाजपा के लिए उस संकल्प की सिद्धि है, जिसका इंतजार पार्टी कार्यकर्ता वर्षों से कर रहे थे।

Samrat Choudhary का यह सफर एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री तक की वह दास्तां है, जिसमें संघर्ष, सटीक रणनीति और सही समय पर लिए गए साहसी फैसलों की सबसे बड़ी भूमिका रही। कल तक जो नेता ‘मुरैठा’ बांधकर विपक्ष की आवाज बुलंद कर रहे थे, आज उनके कंधों पर बिहार के भविष्य की जिम्मेदारी है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी बिहार को विकास और सुशासन की किस नई दिशा में लेकर जाते हैं।

Rajni

rajni@nedricknews.com

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